खलनायकी के दौर में एक नया चेहरा- इम्तियाज

1 min


dharmatma-badguys

 

मायापुरी अंक 41,1975

अभी कुछ ही दिनों की बात है मुझें पालम हवाई अड्डे जाना पड़ा अपने काम से फारिग होने पर जब लौटने लगा तो अचानक दृष्टि की उड़ान में एक जाना पहचाना चेहरा आ गया। लगभग सवा छ: फुट लम्बा कद, चौड़ी छाती, आकर्षक व्यक्तित्व, गोरा रंग, और और बड़ी बड़ी मूछें, कटी हुई दाढ़ी और सैक्स में डूबी खूंखार आंखे, कहा देखा था इस नौजवान को दिमाग पर जोर डाल कर मैं सोचने की चेष्टा करने लगा और फिर फिरोज खान की फिल्म ‘धर्मात्मा’ का वह दहशत भरा खूंखार चेहरा साकार हो गया जिसके एक और फिल्म का नायक गोलियों से भरी पिस्तौल के ट्रिंगर पर अंगुली रखे उसे निशाना बनाने को तैयार खड़ा था और दूसरी और मौत को गहरी खाई उसे अपनी कोख में लेने को ललकार रही थी।

‘पालम एयर पोर्ट’ पर हाथ में ‘बीफकेस’ लिए में खड़ा था मुझें लगा यह नौजवान इम्तियाज हैं। मैंने अपने कदम उनकी ओर बढ़ायें और अपना परिचय दिया। इम्तियाज सवा आठ बजे की फ्लाइट से मुंबई जा रहे थे और अभी लगभग चालीस मिनट शेष थे। हम ‘एयरपोर्ट’ पर ही रेस्तरां में पहुंचे और एक टेबल के आमने सामने बैठते हुए मैंने बातों का सिलसिला आरम्भ करते हुए पूछा, ‘इम्तियाज जी फिल्म व्यवसाय में कैसे आना हुआ?

पल भर इम्तियाज चुप रहे और फिर चुप्पी को तोड़ते हुए बोले, फिल्मों से मेरा काफी पुराना संबंध है। मेरे पिता जयंत चरित्र अभिनेता के रूप में वर्षो तक फिल्मोद्योग में छाये रहे और वास्तव में अपने पिता से ही मैंने अभिनय की बारीकियों और तकनीक को समझा बूझा। मैंने कभी स्वप्न में भी नही सोचा था कि कभी खलनायक बनूंगा, हां फिल्में बनाने की इच्छाएं मन में अवश्य थी मुंबई विश्व विद्यालय से ग्रेजुएट होने के बाद एक फिल्म का निर्देशन कार्य हाथ में लिया लेकिन दुर्भाग्य वश फिल्म पूर्ण नही हो सकी। फिल्म आज तक अधूरी डिब्बों में बन्द पड़ी है, मेरे हौसले पस्त हो चुके थे। वैसे निर्देशन क्षेत्र में मैंने चेतन आनंद से प्रशिक्षण लिया है और उनकी फिल्म ‘हंसते जख्म’ में उनका सहायक निर्देशक भी रहा। फिल्मों में निर्देशक बनने आया था लेकिन अभिनेता बन गया। अचानक निर्माता रामसे से भेंट हुई और उन्होंने मुझें अपनी ‘दो गज जमीन के नीचे’ के लिए अनुबंधित कर लिया। यह एक प्रयोगात्मक फिल्म थी अत: बॉक्स ऑफिस पर सफल रही। इस फिल्म के प्रदर्शन के बाद मेरे पास अनेक कई फिल्मों के ऑफर आए।

लेकिन आपने खलनायक की भूमिकाएं ही क्यों स्वीकार की और थोड़े समय में ही खलनायकों की भीड़ को पीछे धकेलते हुए अपना विशिष्ठ स्थान बना लिया? मैंने अगला प्रश्न किया तो उत्तर में वह बोले, फिल्म व्यवसाय में मैं अभी नया हूं और मुझें बहुत कुछ सीखना है। जहां हर अभिनेता अथवा अभिनेत्री दूसरे को उखाड़ फैंक कर आगे बढ़ना चाहते हैं। मैं समझता हूं, मेरा व्यक्तित्व केवल खलनायक के अनुरूप ही है और इसी इरादे से मैं खलनायकी के अखाड़े में उतर आया। मैं खलनायक की परिभाषा बदलना चाहता हूं बिल्कुल अलग अलग एक विशेष प्रकार का मौलिक स्वनिर्मित खलनायक बनना चाहता हूं। भारतीय फिल्मों का खलनायक एक विशेष परिधि में कैद हो चुका है। खलनायक के पर्दे पर आते ही दर्शको को मालूम हो जाता है कि वह क्या प्रस्तुत करने वाला है कैसे कैसे शॉट दिखाने जा रहा है उसके मारने पीटने और घूंसे बाजी आदि से दर्शक पूर्व परिचित होते हैं। मैं इस मार्के का खलनायक नही बनना चाहता। सैट पर आने से पूर्व मैं अपनी भूमिका को बार बार तब तक पढ़ता हूं जब तक कि मैं उसे अपने अंदर उतार नही कर लेता, इम्तियाज आत्म विश्वास के साथ बोल रहे थे। उनकी बातों में विशेष आकर्षण था। रौबोली आवाज़ मैं सामने वाले को अपनी ओर आकर्षित कर लेने की क्षमता थी। उनके तम तमाये चेहरे को देख कर लगता जैसे बहुत भारी तूफान आने वाला है जो रोके नही रुके गा। उनके रौबीले स्वर में तेज सी कोई अदृश्य वस्तु थी। उनका सचमुच वह आफताब बन कर चमकेगा।

इम्तियाज का जन्म 15 अक्टूबर 1942 के दिन हुआ। अभिनय में उन्हें बचपन से ही शौक रहा है और दस वर्ष तक वे स्कूल एवं कॉलेज में स्टेज पर छाया रहे। अभिनय के अतिरिक्त फोटोग्राफी और कविताएं लिखना इम्तियाज की विशेष रूचियां हैं। फिल्म ‘दो गज जमीन के नीचे’ के बाद इम्तियाज ने कुछ अन्य फिल्मों जैसे नासिर हुसैन की ‘यादों की बारात’ टी.एम. बिहारी की ‘राजा काका’ समीर गांगुली की ‘जग्गू’ फिरोज खान की ‘धर्मात्मा’ और ‘अपराधी’ में खलनायक की भूमिकांए अभिनीत की हैं। इस समय इम्तियाज ढेर सारी फिल्मों के लिए अनुबंधित हैं, और उनकी निर्माणधीन बहुचर्चित फिल्में हैं उनके अपने द्वारा ही निर्देशित फिल्म ‘चोर स्वामी’ रामसे को चौख ए. रामशीर की ‘दियार ए मदीना’ आर जी ठाकुर की ‘महाबदमाश’ रमेश बहल की ‘निकम्मा’ के. परवेज की ‘सबूत’ होमो वाडिया की ‘तूफान और बिजली’‘प्रतिकार’ और ‘अंधेरा’ हैं।

फिल्मों में बढ़ते सैक्स के बारे में इम्तियाज का कहना है कि नई लहर के नाम पर इन दिनों फिल्म इंडस्ट्री में नग्न लहर चल पड़ी है और पर्दे पर प्रस्तुत होने वाली यह बढ़ती हुई नग्नता देश को युवा पीढ़ी के मस्तिष्क पर विषैला प्रभाव डाल रही है। जनता को कामुकता पूर्ण फिल्मों का नशा सा हो गया है और कलात्मक फिल्में वह हज्म़ नही कर पाते फिल्मों में परिवर्तन तभी संभव होगा जब देश को जनता और सरकार मिलकर कोई प्रभावशाली कदम उठायें। सवा आठ की फ्लाइट से इम्तियाज को विदा कर मैं उनके उज्जवल भविष्य के बारे में सोचता हुआ एयरपोर्ट से बाहर आया।


Like it? Share with your friends!

Mayapuri

अपने दोस्तों के साथ शेयर कीजिये