‘मैं तो मज़ाक मज़ाक में एक्ट्रेस बन गई – मौसमी चटर्जी

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मायापुरी अंक 47,1975

नटराज के दरवाजे पर शायद ड्राईवर था मैंने अपना कार्ड उसके हाथ में थमाया।

आप कौन हैं? उसने पूछा।

“आदमी!” मैंने कहा।

उसने अंदर जाकर कार्ड मौसमी को दे दिया (शायद) फिर बाहर आ कर बोला।

“आप जरा ठहरिये”

मैं ठहर गया। फिर बाल्कनी में टहलने लगा। टहलते-टहलते थक गया तो फिर ठहर गया। मेरी देखा-देखी यही काम टेलर मास्टर भी कर रहा था। उसके एक हाथ में साड़िया थीं दूसरे में मर्दानी कमीजें, मेकअप रूम का दरवाजा इस बीच कई बार खुला और बंद हुआ मगर अंदर से मौसमी को बुलाने की आवाज नहीं बल्कि आज के अंग्रेजी म्यूजिक की आवाजें आई। बाहर वाला यूं महसूस करे कि अंदर म्यूजिक के साथ डांस भी चल रहा है।

कुछ देर बाद यह ‘संगीतालय’ बंद हुआ तो बाहर वालों का नंबर आया। पहले नम्बर पर टेलर मास्टर अंदर गया क्योंकि वह ‘क्यू’ में मुझसे पहले खड़ा था।

टेलर मास्टर के बाद ‘भोला भाला’ की यूनिट के कुछ सदस्य आकर लौट गए जो बेचारे सुबह से हीरो राजेश खन्ना की प्रतीक्षा कर रहे थे। ठीक उसी तरह जैसे मैं इस समय मौसमी का इंतजार कर रहा था।

और अब मेरी बारी आई तो बजाये मुझे अंदर बुलाने के खुद बाहर आ गईं। वह अब शूटिंग से वापिस घर लौट रही थीं। ‘भोला भाला’ की सारी यूनिट के साथ मौसमी ने भी काफी इंतजार किया था सुबह दस बजे से शाम के पांच बजे तक। पूरे सात घंटे का लंबा इंतजार आखिर ‘पैकअप’ डायरेक्टर ने नहीं, मौसमी को ही कहना पड़ा पूरे दिन में उनके केवल दो ही शॉट हुए थे।

इसीलिए अब वह वापिस जा रही थी। जब वह मेरे सामने से गुजरी तो मैंने कहना चाहा ‘माई सेल्फ…’

औह सारी! मेरे कुछ कहने से पहले ही मौसमी के मुंह से निकला “कार्ड आपने ही भिजवाया था न?”

और जवाब में मैंने हां कहा तो मौसमी वापिस मेकअप रूम में लौट आई, आइये! उसने कहा और मैं भी मेकअप रूम में आकर बैठ गया। मौसमी मेरे सामने इस प्रकार से बैठ गईं जैसे कि वह मेरा इंटरव्यू ले रही हों। मुझे मौसमी का यह खुला और अच्छा सह्रदयता का व्यवहार बेहद अच्छा लगा।

मैंने अपनी बात की शुरूआत की,

यह बताइये मौसमी जी! आपके नाम को लेकर दो तरह के नामों का झगड़ा चल रहा है, इस में कौन-सा नाम सही है मौसुमी या मौसमी?

हमारे यहां बंगाल में मौसमी को मौसम कहते हैं बंगाली भाषा में। मौसम से ही मौसुमी बन जाता है लेकिन इधर तो मौसम को मौसम ही कहते हैं इसलिए दोनों ही अपनी जगह ठीक हैं लेकिन मेरे हिसाब से मौसमी इज़ करेक्ट।

बातचीत के दौरान मैंने एक बात बराबर नोट की कि उनकी हिंदी काफी कमजोर है लेकिन मौसमी के पास इसके बदले में जो मजबूत चीज है, उसका नाम है ‘एक्सप्रेशन’ आप यह जानकर हैरान होंगे कि यह ‘एक्सप्रेशन’ (भाव) सिर्फ मौसमी के चेहरे पर ही नहीं उनके हाथों से भी झलक रहा था। जो बात मौसमी भाषा की बाधा के कारण आपसे ‘एक्सप्लेन’ नहीं कर पाती, वह बात वह अपने हाथों से कह देतीं। और हाथों से किसी बात को कहने का अंदाज जिस अभिनेत्री में होता है, वह एक हजार में से एक होती है।

आपने अपनी पहली हिंदी फिल्म ‘अनुराग’ में जो अंधी लड़की की भूमिका निभाई थी उसके लिए प्रेरणा क्या किसी वास्तविक अंधी लड़की से ली थी या फिर पुस्तकों के सहारे ‘अंधो’ को सारी हरकतों को नोट किया था?

‘नहीं’ मैंने ऐसा कुछ नहीं किया। मैंने जो कुछ भी किया ‘अनुराग’ में किया है, वहां मेरा अपना अभिनय है वैसे शक्ति दा (शक्ति सामंत) ने जब मुझे ‘अनुराग’ के लिए साइन किया, तब कहानी में बताया कि मैं इस फिल्म में मैं स्कूल में जाती हूं, डस्टर से बोर्ड साफ करती हूं। धीरे-धीरे पढ़ना सीखती हूं लेकिन मुहूर्त के बाद में पता नहीं क्यों शक्ति दा ने फिल्म ‘अनुराग’ में से स्कूल विस्कूल सब निकाल दिया? मुहूर्त के बाद हमको बोले कि तुमने जैसा काम (एक्टिंग) मुहूर्त शॉट में किया है, अब पूरी फिल्म में करना।

मेरा ख्याल है शक्ति सामंत ने भी निर्देशको के तौर पर महसूस किया होगा कि इस अभिनेत्री को डस्टर पकड़ाने की जरूरत नहीं, वह तो खुद ही टीचर है अभिनय की टीचर जो हाथों से भी अभिनय करने की शक्ति रखती है। मेरे ख्याल से पूरी फिल्मी दुनिया में एक ही निर्देशक, शक्ति सामंत वह शक्तिशाली आंख रखते हैं जिससे मौसमी के हाथों और चेहरे पर अभिनय कला के रंगो को पूरे इंद्रधनुष के साथ प्रस्तुत किया इसलिए शक्ति सामंत ने मौसमी को वह सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका ‘अनुराग’ में दी, ‘अंधी लड़की’ की भूमिका जिसे कुछ दिखाई नहीं देता फिर भी वह सब कुछ देखती है, सब कुछ महसूस करती है! ऐसी भूमिकाएं एक अभिनेत्री के पूरे फिल्मी जीवन में किसी किसी अभिनेत्री को ही भाग्य से प्राप्त होती है और कहना गलत न होगा कि इस मामले में सबसे पहली फिल्म में एक ऐसी खूबसूरत भूमिका मिली जिसमें वह अपने अभिनय को सारी सुंदरता दिखा सकती थी।

इसी भूमिका को एक अंग्रेजी फिल्म ‘वेट अंटिल डार्क’ में विदेशी कलानेत्री आड़ी हैप्पबर्न ने निभाया है और अंधी लड़की की भूमिका में अपने अभिनय के सारे रंग घोल दिए हैं। लगता है पर्दे कि नाडी नही वास्तव में कोई अंधी लड़की है जो सिर्फ आवाजों की भाषा जानती है। जो सिर्फ महसूस कर सकती है, जिसे दियासिलाई की एक जलती हुई तीली की रोशनी की बर्दाश्त नही है। न जाने क्यों मुझे लगता था कि ‘अनुराग’ की अंधी लड़की ने कही आड़ी को तो हिंदी पर्दे पर नही उतार दिया। इसीलिए मैंने पूछा।

क्या आपने आड़ी हैप्पबर्न की वेट अंटिल डार्क देखी थी?

नहीं मौसमी ने उत्तर दिया, ‘अनुराग’ रिलीज़ होने के काफी देर बाद देखी थी।

मान लीजिए अगर फिल्म की कहानी को हिंदी में फिल्माया जाता और आप होती तो क्या आड़ी से बढ़िया अभिनय कर सकती थी?

कुछ नहीं कहा जा सकता जो चीज हुई ही नहीं उसके बारे में कोई भी डिसीजन कैसे लिया जा सकता है? वैसे तो अंधी लड़की का रोल ही ऐसा होता है कि ऑडियंस (दर्शकवर्ग) को उससे सिम्पथी (सहानुभूति) हो जाती है।

और इसके साथ मौसमी यह भी बता देती है कि ‘अनुराग’ में भी ऐसा ही रोल थी।

फिल्मों में काम करने का शौक आपको क्या शादी से पहले या बचपन से है?

पूछने पर मौसमी ने गंभीरतापूर्वक बताया, मैं तो मज़ाक-मज़ाक में एक्ट्रेस बन गयी ऐसा ही सर्किल में किसी ने कह दिया, हम फिल्म में काम करेंगे। बस उन्होंने साइन कर लिया।

अगर मैं गलत नहीं हूं तो मौसमी की पहली साइन होने वाली फिल्म ‘नैना’ थी जो नायिका के रूप में मौसमी का नाम लेकर अखबारों की सुर्खियों में उतरी थी।

क्या आप ग्लैमर वाली भूमिकाओं नहीं करना चाहती? मैंने मौसमी से पूछा।

ग्लैमर से आपका मतलब कहीं ‘पर्सनलिटी एक्सपोज’ करने से तो नहीं है। ऐसा मैं जरा में पसंद नहीं करती। पोशाकों की आधुनिकता तक का ग्लैमर ही सीमित होना चाहिए। इस सीमा को तोड़ना एक औरत के लिए कतई गलत और खतरनाक होता है।

सही क्या है? पूछने पर मौसमी सीधे फिल्म ‘रजनीगंधा’ का नाम लेती हैं। वे इस फिल्म में नायिका के ग्लैमर को ही ग्लैमर कहती हैं। इसके आगे एक सीमा आ जाती है जिसे फ्लांग कर जान मौसमी के लिए निहायत चित है।

भोला भाला में आप की भूमिका क्या है?

राजेश खन्ना का इस फिल्म में डबल रोल है। एक डाकू का एक भोले भाले इंसान का मैं, इसी भोले भाले की भोली-भाली हूं।

और इसके बाद जब मैं अपने ‘इंटरव्यू’ के पैकअप की घोषणा करता हूं तो मौसमी झट से उठकर खड़ी हो जाती है और एकदम भोले भाले चेहरे से कहती हैं “प्लीज मैं जरा चलूं?” और बिना जवाब के लिए इंतजार किए मौसमी बड़े भोलेपन के साथ मेकअप रूम से बाहर निकल जाती हैं और मैं सोचता हूं कि वास्तव में इस मंजी हुई अभिनेत्री के अंदर बेहद भोली भाली लड़की है।

और शायद इसीलिए मैं चलते समय मौसमी से यह नही पूछ सका कि उसने जो मर्दानी कमीजें मंगवाई थी क्या वे उसके पति रितेश बाबू के लिए थीं? क्योंकि मैं जानता हूं मौसमी जैसी औरत के अंदर जो लड़की है वह एक पति के लिए ही कमीजें मंगवा सकती है। और इसीलिए शुरू में मैंने मौसमी को औरत नहीं कहा बल्कि लड़की कहा है। वास्तव में वही एक ऐसी अभिनेत्री हिंदी फिल्मों में हैं जिसे औरत होने के बाद भी लड़की महसूस किया जाता है।

और यही मौसमी के अभिनय का कमाल है।


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Mayapuri

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