जूनियर महमूद बन गये निर्माता

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मायापुरी अंक 47,1975

उस दिन महबूब स्टूडियो में हमने एक विचित्र दृश्य देखा था। कॉमेडी किंग महमूद अपनी तमाम तरह की बीमारी के बावजूद वहां आये और फोटोग्राफरों को बुलाकर खुद झुककर घोड़ा बन गये और जूनियर महमूद से बोले आ मेरी पीठ पर बैठ जा इसके बाद जूनियर महमूद किसी आज्ञाकारी बच्चे की तरह उनकी पीठ पर बैठ गया। फोटोग्राफरों के कैमरे धड़ाधड़ उन्हें कैमरे की आंख में बंद करने लगे। महमूद ने फिर जूनियर को नीचे उतारा और अपने गले से लगाकर गीली आंखों और भर्राई हुई आवाज में बोले आज मेरी खुशी का आखिरी दिन है। इससे ज्यादा बड़ी खुशी मुझे यह है कि तू मेरे वारिस की हैसियत से मेरे बाद मेरे नाम को जिंदा रखेगा।

यह दृश्य फिल्म ‘बाप का बाप’ के मुहूर्त से पहले लिया गया था हमारे दिल में उस समय महमूद के लिए और भी श्रद्धा पैदा हो गई। और महमूद के वारिस जूनियर महमूद के जीवन को पढ़ने की लालसा बढ़ गई। उस दिन जूनियर से लम्बी भेंट संभव नहीं थी। हमने दो चार दिन बाद फोन पर कॉन्ट्रैक्ट किया किंतु सफलता नहीं मिली। आज हम जूनियर महमूद की जीवन झांकी ‘दारा हाउस’ में बैठे देख रहे हैं। आइए आप भी देखिए।

यह जो काली धारी वाली लुंगी में नंगा लड़का बैठा है। इसके मां बाप ने इसका नाम मुहम्मद नईम अख्तर रखा था। घरवाले और मां प्यार से ‘निम्मी’ कहते हैं और फिल्म वाले ‘जूनियर’ और आप इसे जूनियर महमूद के नाम से जानते हैं। हमारे सामने जब वह इस वेश भूषा में आया तो उसे देख कर बड़ा आश्चर्य हुआ। हमने उससे कहा जूनियर कुछ पहन तो लो।

बिन्दास जूनियर बोला अपुन को सब चलेगा।

जूनियर के जहन में एक बच्चे का इमेज बना हुआ है। किंतु उसके नंगे शरीर पर जब हमने सीने पर बाल देखे तो हैरत से पूछ ही बैठे आपकी उम्र क्या होगी?

लगभग 19 वर्ष! जूनियर बोला। 15 नवम्बर 1956 को मुजफ्फर नगर के थाना में पैदा हुआ।

“मुंबई कैसे आना हुआ?” हमने पूछा।

मेरे वालिद ममूद अहमद रेलवे में ड्राइवर हैं और तबादले के कारण ही मुंबई आना पड़ा जूनियर ने कहा।

बच्चों की जो उम्र पढ़ने की होती है। उसमें आप फिल्मों में आ गए। क्या आप बतायेंगे कि फिल्मी जीवन का आरम्भ क्यों हुआ? और यह नाम कैसे और किससे मिला? हमने उसके प्रारम्भिक जीवन के विषय में विस्तार से जानने के लिए पूछा।

मैं स्कूल जाया करता था। किंतु पढ़ने में मन नहीं लगता था। सारा दिन धमाल किया करते थे। कोई दिन ऐसा न आता था जिसमें हमें मार न पड़ती हो। अपुन साला बहुत हरामी था। झगड़ा करना मार-पीट करना यही अपना धंधा था। और खाली समय में स्टेज जैसी जगहों पर फिल्म स्टारों की नकल उतारा करता था। तभी लोगों ने दिमाग में हवा भर दी कि मैं अच्छी एक्टिंग करता हूं। और यही बात मुझे ‘नौनिहाल’ के निर्माता के पास ले गई।

वहां लड़को का चुनाव हो रहा था मेरा भी सेलेक्शन हो गया। और नाम दिया गया मास्टर सुनील! इसके बाद ‘ब्रह्मचारी’ के लिए 10 लड़को का चुनाव किया जाना था। मैं भी वहां पहुंच गया। उस समय चाइल्ड स्टार्स में मास्टर सचिन, मास्टर शाहि, मास्टर अनिल, मास्टर वसीम का बड़ा नाम था इनके सामने मुझे अपनी दाल गलती नजर नहीं आई। एक-एक लड़के को टेस्ट के लिए अंदर बुलाया गया तो देखा कि निर्देशक भप्पी सोनी के साथ रमेश सिप्पी, नरेन्द्र बेदी और सतपाल भी बैठे हुए थे। सतपाल ने मुझे देखते ही रिजेक्ट कर दिया। अपुन ने सोचा कि जाने दो और मुंह लटकाये वापस चले आये। इसके बाद भप्पी जी ने मुझे दुबारा बुलाया और बोले सतपाल इसे भी ले ही लो। यह भी कहीं आगे पीछे खड़ा रहेगा मुझे इस लड़के में कुछ बात नजर आती है। इसके बाद मेरा एग्रीमेंट हुआ। 1500 रूपये मिले।इतने रूपये पाकर अपुन को दिन में चांद तारे नजर आने लगे अपुन बाप इतना माल पहले किधर देखा था। इसी दौरान फेमस स्टूडियो के टैरेस पर रवेल साहब की ओर से दुर्गा पूजा का कार्यक्रम रखा गया था। वहां मैंने वह आइटम पेश किया जो मैं कभी कभी स्टेज पर पेश किया करता था। ‘अमीं काले हाई तो क्या हुआ दिल वाले हाई’ को नकल भप्पी जी ने इतना पसंद किया कि मुझे गले लगा लिया और फिर ‘ब्रह्मचारी’ जिस में मैं एक्सट्रा के रूप में काम कर रहा था। बच्चों का लीडर बन गया। मेरा काम देख कर शम्मी जी मुझे बच्चों का सरदार कहने लगे। भप्पी जी मुझे इतना प्यार करते थे कि में 15-15 दिन उनके घर रहता था और जिधर वह जाते थे उधर ही मैं जाता था। एक तरह से मैं उनका दुमछल्ला बन गया था। हां इसके बाद ‘ब्रह्मचारी’ का महमूद भाई जान के ट्रायल देखा और बहुत खुश हुए और बोले आज से तेरा नाम जूनियर महमूद! इस तरह मैं नईम से सुनील और फिर सुनील से जूनियर महमूद हो गया। जूनियर ने सविस्तार अपने बारे में बताते हुए कहा।

‘ब्रह्मचारी’ तो काफी सफल फिल्म थी। उसके बाद तो फिल्मों की लाइन लग गई होगी? हमने पूछा।

क्या बाप्पू! जूनियर ने टिपिकल मुंबईया लहजे में कहा। इसके बाद अपुन को आंधी के आम की तरह फिल्में मिलने लगी। ‘संघर्ष’ में संजीव के बचपन का रोल किया। एक तरह से यह फिल्म दिलीप साहब की फिल्म थी किंतु उनके साथ काम करने का मौका नहीं मिला। ‘कारवां’ में चाइल्ड स्टार के तौर पर मेरा मेजर रोल था। ‘घर घर की कहानी’ में मेरा काम काफी पसंद किया गया। बचपन में मैंने तांगे वाले मुकरी के बच्चे का रोल किया था। जो लोगों ने काफी पसंद किया। ‘दो बच्चे दस हाथ’ में मेरा ‘जेम्स बांड हीरो’ का रोल था उसमें मैंने बहुत खुल कर काम किया था। महमूद भाई जान ने मुझे जूनियर महमूद बना ही दिया तो मैंने उनके आइटम पर अपना अधिकार मानते हुए ‘तन्हाई’ भाई जान की फिल्म ‘हमजोली’ का एक आइटम दादा, बेटा पोता की कॉपी और उसमें एक इजाफा पोती का और कर दिया। जिसे देख कर भाई जान ने कहा। शाबाश बेटे! ठीक जा रहे हो। यह पोती वाला एडिशन मैं नहीं कर सकता था।

आप चूंकि खुद एक कॉमेडियन हैं इसलिए क्या आप बतायेंगे कि आप इस दौर का सबसे बड़ा कॉमेडियन किसे समझते हैं? हमने पूछा।

महमूद भाई जान आज के सीनियर कॉमेडियन में पहले और आखिरी कॉमेडियन हैं। उनके मुकाबले में अगर कोई अपने आपको खड़ा करे तो मैं उसे सबसे बड़ा बेवकूफ समझूंगा। और जूनियर कॉमेडियन यानी नई पीढ़ी के मसखरों में जगदीप इस क्षेत्र में सबके बाप के बाप है। जूनियर ने अपना विचार प्रगट करते हुए कहा।

आपका अपने बारे में क्या ख्याल है? हमने पूछा,

आज तक मैं यह नहीं समझ पाया कि मुझे कॉमेडियन क्यों करार दिया गया है। मैं तो अपने हर काम को गंभीरता से करने में विश्वास रखता हूं। मुझे दरअसल यह नया चोला निर्माताओं और निर्देशकों ने पहनाया है। वे लोग जब भी मेरे लिये कोई काम निकालते हैं तो यही कहते हैं, यह सीन तो साला जूनियर महमूद ही कर सकता है, जूनियर ने कहा।

मैं की क्या परिभाषा है? हमने पूछा।

पब्लिक तो कॉमेडियन को देख कर हंसती ही है किंतु जिस कॉमेडियन के काम को देखकर कॉमेडियन हंस पड़े वही सबसे बड़ा कॉमेडियन है। जूनियर ने कहा।

आपके विचार में कॉमेडी कितने प्रकार की होती है?

एक्शन कॉमेडी, डायलॉग कॉमेडी और सिच्युएशन कॉमेडी। इनमें सबसे ज्यादा कठिन डायलॉग कॉमेडी होती है। क्योंकि इसमें हंसाने वाले डायलॉग का एक्सप्रेशन चेहरे से जाहिर होने के साथ-साथ भरपूर भी एक्शन करना होता है।

जब कोई कलाकार स्टार बन जाता है तो हर निर्माता चाहता है कि वह उसकी फिल्म में काम करे। लेकिन अक्सर ऐसे मौके पर प्राइस की वजह से मामलात बिगड़ जाया करते हैं। क्या आपके साथ भी ऐसी कोई घटना घटी है?

हां, क्यों नहीं! फिल्म ‘दास्तान’ में बी.आर. चोपड़ा ने अपुन को दिलीप साहब के बचपन का रोल निभाने के लिये बुलाया था। पैसों की बातचीत हुई तो अपुन बोला चोपड़ा साहब अपुन बाहर से 40 हजार लेता है। लेकिन आपकी फिल्म में 25000 रूपये में ही कर दूंगा। यह सुन कर चोपड़ा साहब बोले अरे पांच दिन का काम है हजार रूपये प्रतिदिन के हिसाब से पैसे ले लेना। अपुन ने इतनी बड़ी दुकान, फीका पकवान देखा तो बड़ा सदमा हुआ। फिर भी अपुन बोला, चोपड़ा जी आपने याद किया इसका बहुत-बहुत शुक्रिया। अपुन जरा बड़ा स्टार है। आपके रोल के लिए अपना छोटा भाई ठीक रहेगा। उसको भेजता है, वह अच्छा काम करेगा और यह कह कर अपुन बाहर निकल आया। जूनियर बोला।

आपको निर्माताओं की परेशानियों का इल्म तो होगा ही। फिर आपने निर्माता बनने का निर्णय क्यों कर लिया? हमने पूछा।

अपुन हीरो तो बन नहीं सकता और अब उम्र के हिसाब से न बच्चों में स्थान है न बड़ो में इसलिए इंडस्ट्री में रहने के लिए कुछ न कुछ तो करना ही पड़ता है। सो अपुन निर्माता बन गया। मेरी फिल्म क्राइम कॉमेडी है। एक ट्रेक में विनोद खन्ना और महमूद भाई जान हैं। दूसरे में हरि भाई (संजीव कुमार) और मैं हूं। इस प्रकार दोनों ग्रुप अपने रंग में बाप के बाप हैं। जूनियर ने कहा।

चाइल्ड स्टार के बाद आज जो पॉजिशन प्राप्त की है। उससे क्या आप अपने तौर पर कोई फर्क महसूस करते हैं? हमने उठने से पूर्व पूछा।

अपुन जब बचपन में शरारत करता था तो मेरे बाप मेरी क्या धुनाई करते थे लेकिन आज वह प्यार तो पहले से भी ज्यादा करते हैं लेकिन मुझे कभी कभी ऐसा अहसास होता है कि कहीं यह प्यार इस वजह से तो नहीं है कि आज इस घर में सबसे अधिक कमाने वाला सदस्य हूं?

इसीलिए बाजी दफा मेरे बाप मेरी नामुनासिब बात को भी हंस कर टाल देते हैं। यह सोच कर मैं दुखी हो जाता हूं। हालांकि ऐसी बात नहीं है जूनियर ने भावुक होकर कहा।

आपके जीवन की सब से बड़ी मनोकामना क्या है? हमने आखिरी सवाल किया।

मैं कोई ऐसा काम करना चाहता हूं जो मेरी उम्र के किसी कलाकार ने आज तक न किया हो जूनियर ने कहा।

हम इतने छोटे से कलाकार की इतनी गंभीर बातें सुन कर चकित थे। और इंटरव्यू समाप्त कर चलने ही वाले थे कि जूनियर खुद ही बोला, अरे आपने मेरी आने वाली फिल्मों के नाम तो पूछे ही नहीं? खैर मैं खुद ही बताये देता हूं। मेरी आने वाली फिल्में हैं‘आहट’ जिसमें मैं जया भादुड़ी का नौकर बना हूं। और जया भादुड़ी मेरी ही पसंदीदा हीरोइन नहीं बल्कि मैं भी उनका पसंदीदा कलाकार हूं। ‘लड़की भोली भाली’ ‘दीवानगी’ अर्जुनहिगोंरानी’ की ‘अनाम’ फिल्म ‘डाकू’ और महात्मा ‘असली रूप’’कोई जीता कोई हारा’’गीत गाता चल’ जिसमें पद्मा खन्ना के साथ नौटंकी के हीरो का रोल कर रहा हूं, इनके अलावा दिलीप साहब के साथ ‘वहशी’ करने वाला हूं। जूनियर ने फिल्में गिनते हुए कहा।


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Mayapuri

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