राजेन्द्र कुमार-सफलता असफलता के घेरे में

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मायापुरी अंक 45,1975

पाली हिल पर अपने समय के सिल्वर जुबली स्टार राजेन्द्र कुमार से उनके बंगले पर भेंट हो गई। हमने पुन: मुलाकात हो जाने पर बधाई देते हुए कहा, सुना हैसुनीलदत्त की तरह आपने भी अनगिनत फिल्में साइन कर ली हैं। क्या यह सच है?

मैंने अपने पूरे करियर में कभी ज्यादा फिल्में साइन नहीं की मैंने सदा एक सिद्धांत के अंतर्गत काम किया है। और अब भी कर रहा हूं। मैंने कभी भी फिल्मों या अपने आप से अन्याय नही किया। और इसीलिए आज तक फिल्मों में काम कर रहा हूं। राजेन्द्र कुमार ने बताया।

कहते हैं आपने सबसे पहले सिल्वर जुबली फिल्में दी हैं। आप बता सकते हैं इतनी सारी फिल्मों की सफलता में किस चीज ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है? हमने पूछा।

मेरी फिल्मों की सफलता में कहानियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है जब कभी भी कोई मेरे पास अच्छी कहानी लेकर आया है, मैंने न केवल कहानी सुनी है बल्कि पसंद आने पर तुंरत बनाने की भी सलाह दी है ‘दिल एक मंदिर’ के निर्माता निर्देशक श्रीधर ने मुझे कहानी सुनाई थी मेरे मशवरे पर उन्होंने पहले वह तमिल में नई कास्ट लेकर एक माह में पूरी की और जब रिलीज हुई तो उन्होंने तमाम पिछले रिकॉर्ड तोड़ दिये थे। राजेन्द्र कुमार ने बताया।

क्या कभी ऐसा भी हुआ है कि कोई कहानी आपने पसंद की हो और निर्माता ने उसे बनाने में असमर्थता जताई हो। हमने पूछा।

जैसा कि मैंने आपको बताया कि मैं कहानी के मामले में बड़ा सतर्क रहता आया हूं इसके बावजूद मुझे दो कहानियां हाथ न आने का बड़ा अफसोस है। एक फिल्म ‘आनंद’ की कहानी जो मैं स्वंय बनाना चाहता था किंतु नरेश कुमार ने उसे जोखिम वाली कहानी मान कर फिल्माने ना दिया। वरना यह कहानी मैं 1963 में वहीदा रहमान और ऋषिकेश मुखर्जी के साथ बनाने वाला था। दूसरी एक कहानी गुजराती फिल्म ‘मेंहदी रंग लाग्यो’ जिस वक्त मैंने वह फिल्म की थी गुजराती फिल्मों का दौर खत्म हो गया था मुझे फिल्म की कहानी पसंद थी इसीलिए उसमें काम किया था। वह कहानी मैंने रवेल साहब के यहां उन दिनों सुनी थी जबकि मैं उनका सहायक था। उस कहानी को मैं हिन्दी में फिल्माना चाहा था किंतु एक ओर निर्माता वही कहानी सुनीलदत्त, वहीदा रहमान और निर्देश टी.प्रकाश राव के साथ बना रहा था किंतु किन्ही करणवश वह बन न सकी। मैंने कहानी लेनी चाही तो उन्ने चार लाख रूपये मांगे जोकि वह अपनी फिल्म पर खर्च कर चुके थे। इतने महंगे दाम वह कहानी खरीदता तो कौन खरीदता!

इस तरह वह बात मंढे न चढ़ सकी। राजेन्द्र कुमार ने बताया।

सुना है आप रोमांटिक हीरो की बजाए कैरेक्टर रोल करने में अधिक रूचि ले रहे हैं, क्या यह सच है?

आज मुझे इंडस्ट्री में आये पूरे बीस साल हो गये हैं। हमारे दर्शक भी आज जवान हो गए हैंकल जो हमें लड़कियों का पीछा करते, गाना गाता देखते थे आज भी वह हमें उसी तरह गाता देंखेगे तो क्या सोचेंगे? मुझे खुद अच्छा नहीं लगता। इसीलिए मैं खाली रोमांटिक रोल स्वीकार नही कर रहा हूं। अब प्रेमी, नही बड़े भाई की भूमिका निभाने का दौर आ गया है। और अब रोमांस को नहीं दर्शक काम को देखते हैं। अच्छी कहानी और अच्छा रोल मिल जाए तो हमारा नहीं दर्शकों का भी जी खुश हो जाता है। ‘आवारा राजू’ में ऐसा ही रोल है, मगर बदला और ‘डाकू’‘बलिदान’ में डाकू की भूमिका निभा रहा हूं। ऐसे विभिन्न प्रकार के रोल अन्य फिल्मों में भी कर रहा हूं। राजेन्द्र कुमार ने बताया।


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Mayapuri

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