फिल्मफेयर पुरस्कार विजेता गीतकार – संतोष आनंद

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santosh

 

मायापुरी अंक 49,1975

शाम के आठ बजते-बजते मैं कवि सम्मेलन जो शामली शूगर मिल के कर्मचारियों द्वारा आयोजित किया गया था और इसमें अन्य कवियों के साथ-साथ फिल्मी-गीतकार संतोष आनंद भी आये। संतोष आनंद के दो गीतों को इस वर्ष ‘फिल्म फेयर पुरस्कार’ से पुरस्कृत किया गया है। दोनों गीत फिल्म ‘रोटी कपड़ा और मकान’ के हैं। मैं न भूलूंगा…. गीत के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ गीतकार का पुरस्कार फिल्मफेयर भी मिला है तथा और नही, बस और नही.. गीत पर गायक महेन्द्र कपूर को ‘सर्वश्रेष्ठ गायक’ के रूप में पुरस्कृत किया गया है। मैं संतोष आनंद जी का इंटरव्यू लेने के उद्देश्य से वहां पहुंचा था।

मैंने उनसे पहला प्रश्न किया आपको कविता गीत लिखने की प्रेरणा व रूचि कहां से और कब से उत्पन्न हुई?

कुछ सोचते हुए बोले, कहां से और कब का तो हमको भी पता नहीं, बस लिखने लगे हां, शायद इंटर में पढ़ते थे, हम उस समय।

इसके बाद मैंने दूसरा प्रश्न उनके सामने पढ़ दिया, आप साहित्यिक क्षेत्र में किन कवियों से प्रभावित हुए हैं, और क्यों?

मैंने सोचा था कि संतोष आनंद जी इस प्रकार का सरल-सा उत्तर दे देंगे कि मुझे फलां कवि ने प्रभावित किया है या मैं फलां को अपना आदर्श मानता हूं किंतु जब मैंने उनके चेहरे के बदलते भावों को देखा, तो मुझे मेरा अनुमान विखंडित होता-सा लगा और सचमुच उनका उत्तर मेरी आशा के सर्वथा विपरीत रहा। वह बोले मैं अपने आप से ही प्रभावित हुआ हूं, क्योंकि मेरा रास्ता, मेरी डगर, मेरे लिखने-पढ़ने का ढंग, यह सब मैंने अपने आप ही बनाया है। फिर कुछ रूक कर बोले, जहां तक कवियों का प्रश्न है, कोई भी पूर्ण नहीं है। अनकही बातें सब जगह रह जाती हैं। मैं मौलिकता का हामी हूं। अपनी जमीन तोड़कर अपना मकान खड़ा करने की मेरी शुरू से ही कोशिश रही है। उनके गजब के आत्मविश्वास को देखकर मैं बड़ा प्रभावित हुआ।

संतोष आनंद अन्य महानगरों के साथ-साथ मुंबई में भी कवि सम्मेलनों में जाते थे और अपनी उच्च स्तर की कविताओं व पाठन शैली की विशिष्टता के बल पर काफी जमते थे। मनोज कुमार ने इन्हें कवि-सम्मेलन के मंच पर ही सुना और संतोष, मनोज को जंच गए। मनोज की ‘पूरब और पश्चिम पूरी हो चुकी थी, लेकिन उन्होंने नई सिच्युएशन डाल कर संतोष आनंद से एक गीत लिखवा कर उसमें रखने को सोची। यह सूचना कल्याण जी ने तब दी, जब वह मुंबई में एक कवि-सम्मेलन में गए हुए थे। संयोग से मनोज कुमार उन दिनों मुंबई से बाहर थे, इसलिए उनसे बात न हो सकी।

कुछ माह बाद मनोज कुमार राज कपूर की बहुचर्चित फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ की शूटिंग के सिलसिले में दिल्ली आए। शूटिंग जैमिनी सर्कस मे चल रही थी। मनोज के एक दोस्त हरी भारद्वाज ने उन्हें संतोष आनंद की कुछ रूबाइयां सुनाई। मनोज ने अगले दिन इन्हें अपने होटल मे बुला लिया और वहां इनकी कविताओं का जो दौर प्रारम्भ हुआ, वह सात घण्टे तक लगातार चलता रहा।

कुछ सप्ताह बाद मनोज कुमार ने इन्हें श्री टी.पी. झुनझुनवाला के माध्यम से उनको मुंबई बुलवाया और अपनी पूर्ण हो गई फिल्म ‘पूरब और पश्चिम’ में तैयार की गई ‘स्पेशल सिच्युएशन’ के लिए इनसे गीत लिखवाया। इन्होनें जो गीत लिखा, वह था, पुरवा सुहानी आई रे.. यह गीत काफी लोकप्रिय हुआ।

इसके बाद मनोज कुमार की अगली फिल्म ‘शोर’ के लिए इन्होंने दो गीत लिखे जरा सा उसको छुआ तो… तथा दूसरा फिल्म का थीम सॉन्ग ‘एक प्यार का नग़मा है..’

पहला गीत तो आया गया हो गया, किंतु दूसरा गीत लोगों को इतना पसंद आया कि जब एक बार बजना शुरू हुआ, तो लगातार बजता ही चला गया। संतोष आनंद रातों रात प्रसिद्ध हो गए। जिस प्रकार महान गीतकार स्व. शैलेन्द्र अपनी पहली फिल्म ‘बरसात’ से ही लोकप्रिय हो गए थे, उसी प्रकार संतोष आनंद अपनी पहली तो नहीं, हां दूसरी फिल्म से लोकप्रियता के शिखर पर जा चढ़े और, अब मनोज कुमार की ही नवीनतम फिल्म ‘रोटी कपड़ा और मकान’ की ही नवीनतम फिल्म ‘रोटी कपड़ा और मकान’ में लिखे इनके दोनों गीतों ने इन्हें एकाएक प्रथम श्रेणी के गीतकारों में ला खड़ा किया है।

फिल्मों में आने से संबंधित इस प्रश्न को छोड़कर मैं अगला प्रश्न पूछ बैठा आप पत्र-पत्रिकाएं व फिल्में, दोनों में किसके लिए लिखने को प्राथमिकता देंगे?

उन्होंने सहज भाव से उत्तर दे दिया दोनों का अपना अपना स्थान है। प्राथमिकता तो मैं जिंदगी को भी नहीं देता। पत्र-पत्रिका और फिल्म में भेद करके बात करना मेरे लिए बड़ा कठिन है।

इसके बाद मैंने एक और प्रश्न सामने कर दिया अच्छा वह बतालाइए कि जब आपके गीत रेडियो पर व सिनेमा के पर्दे पर बजते हैं और हजारों श्रोताओं द्वारा पसंद किए जाते हैं, तो यह देख सुन कर आपको कैसा लगता है?

संतोष आनंद ने प्रश्न के सस्तेपन को मन ही मन आंकते हुए उत्तर दिया जैसा श्रोताओं का लगता है, वैसा मुझे भी लगता है।

मैंने विभिन्नता की दृष्टि ने इसी कम में बाल की खाल निकालने की सोची और पूछा थोड़ा फर्क तो होता ही होगा?

कोई नहीं। उनका सीधा-सा उत्तर था।

अभी तक आपने फिल्मों के लिए जो गीत लिखे हैं, वो अधिकांशत: गंभीर शैली के हैं। क्या आगे भी आप इसी प्रकार के ‘सीरियस’ गीत ही लिख रहे हैं और लिखेंगे या?

उन्होंने मुझे समझाते हुए बतलाया देखो, फिल्मी गीत की अपनी एक तकनीक है। उसमें परिस्थिति, स्थान और चरित्र की जरूरत को देखते हुए गीत लिखना होता है। भविष्य में अन्य प्रकार की शैली के गीतों को लिखने के संबंध में वह बोले ऐसा करने में कोई संकोच नहीं। हां, छाप छोड़ना मैं अपना अधिकार समझता हूं।

मैंने अगला प्रश्न किया। प्रश्न था अक्सर होता है कि कभी-कभी फिल्मों में धुन पहले तैयार कर ली जाती हैं और गीत बाद में लिखा जाता है तथा कभी इसका उल्टा आपके पास अब तक क्या हुआ है?

संतोष आनंद जी बोले दोनों प्रकार से हुआ है। वैसे, अधिकतर मैंने पहले गीत लिखे हैं।

इसी संदर्भ में मैंने आगे पूछा वैसे आप क्या पसंद करेंगे? मतलब, गीत पहले लिखा जाए और फिर धुन बनाई जाए पर धुन पहले ही तैयार कर ली जाए, तब उस धुन पर गीत लिखा जाए?

इस प्रश्न का कोई सीधा उत्तर वह न दे सके, बस इतना ही बोले समयानुकुल बात होगी।

मैं इस प्रश्न की गहराई को देखते हुए फिल्मी गीतकारों की अनिश्चयात्मक स्थिति को अनुभव कर रहा था, इसलिए मैंने कोई विशेष ‘नोटिस’ नहीं लिया, मैंने पूछा आजकल आप साहित्यिक क्षेत्र में क्या कर कर रहे हैं, मसलन काव्य संग्रह आदि?

भविष्य में किन-किन फिल्मों में आपके गीत आ रहे हैं?

उन्होंने कहा मैं यहां भी अपनी उसी आदत की बात दोहराऊंगा वस्तुत: मैं एडवांस में कुछ भी नहीं बता सकता न फिल्म के विषय में, न इल्म के विषय में संतोष आनंद जी ने तो कुछ नहीं बतलाया, किंतु जैसा कि अन्य स्त्रोता से मालूम हुआ है, उनके अनुसार इनके पास पांच छ: नई फिल्में हैं।


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Mayapuri

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