INTERVIEW: “हमारे पुराने खिलाड़ियों ने तो केवल दाल चावल खा कर हमारे देश का नाम रोशन किया है” – सलमान खान

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लिपिका वर्मा 

सलमान खान अपने बढ़ – बोलेपन के लिए जाने  जाते है -लेकिन हम  आपको बता दे  सलमान दिल के बहुत ही अच्छे बंदे  है। सही मायने  में उन्हें  ,”बीइंग ह्यूमन” की उपाधि देने  में  हमे कोई एतराज नही है। हाल ही में उनकी फ़िल्म, “बजरंगी भाईजान “रिलीज हुई इस फ़िल्म ने ढेर सारी वाह- वाही भी बटोरी थी।  यहाँ तक  कि  यह फ़िल्म पाकिस्तानियों ने भी बहुत पसंद की। इसके बाद उनकी फ़िल्म, “प्रेम रतन धन पायो’ भी अच्छी खासी चली। अब  उनकी फ़िल्म,”सुल्तान” में सलमान ने कुश्ती के दाव पेंच सीखे  हैतो हमने उनसे मिलने की ठानी-सलमान ने पत्रकारों से भेंट कर उनके ढेर सारे सवालों के जवाब भी दिये –

पेश है लिपिका वर्मा के सवाल एवं सलमान के खुले विचारों वाले जवाब-

आपकी फ़िल्म किस पहलवान पर अधारित है ?

मै किसी भी पहलवान को नही जनता हूँ। मेरे पिताजी ने मुझे गामा पहलवान  के बारे में बतलाया था और मैं दारा  सिंह को जनता हूँ। हमारे चाचा और पिताजी ने अखाड़े में जाकर पहलवानी के गुर दिखलाये है। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश एवं अन्य छोटे शहरों में हर कोई कुश्ती किया करता  है अपनी जवानी के वक़्त। यह एक तरह का मार्शल आर्ट्स ही होता है। गामा  पर कोई फ़िल्म नही बनी है। यह फ़िल्म सुल्तान की कहानी है यह एक दलित (अंडरडॉग) है, किस तरह यह  पहलवान गिर के उठता है और इसकी लवर क्या कुछ करती है यही सब कहानी में दिखलाया गया है। बचपन में हम सब भाई – अरबाज, सोहेल और  मै कुश्ती नही अपितु लड़ाई झगड़ा जरूर करते  थे।  सुल्तान की कहानी में -ड्रामा,रोमांस और रोमांच भरपूर है।

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पहलवानी करते समय अपने क्या कुछ सिखा

रिंग में फाइट करना अत्यंत मुश्किल होता है, जब तक आप उनके बराबरी के नही होते है आप उनका मुकाबला नही कर पाओगे मैनें रोज़ सुबह दो ढाई घंटे ट्रेनिंग ली है। शूटिंग के दौरान तो मुझे 6/7 टेक्स करने होते थे औऱ वो भी अलग अलग किंतु ऐसा रियल में नही होता है। और इसके लिए यदि मै सही मायने मे ट्रेनिंग नही लेता तो नकलीपन  साफ नजर आता है । सुबह सबसे पहले मै मिट्टी से जूझता फिर एम.एम.ए करता उसके बाद पंचिंग और बॉक्सिंग किया करता। हर बारी शूटिंग के दौरान कभी वेट बढ़ाना होता तो कभी वेट घटाना होता। काफी मशक्त करनी पड़ी मुझे इस किरदार को निभाते हुए। यह रोल मेरे अबतक की फिल्मी किरदारों  में से बहुत ही मुश्किल रोल रहा। कभी यौवन के सीन्स दिखलाने होते तो कभी फिट अनफिट होने के तो उस हिसाब से ही खान पान करना होता। हर दिन  इतना थक के चूर  हो जाता की सीधे बिस्तर पर जा कर लमलेट् हो जाता।

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आपको ओलंपिक्स के  एम्बेसडर बने उस पर इतना बवाल हुआ क्या कहना चाहेंगे ?

हां बहुत बुरा लगा। लेकिन क्या मै पूछ सकता हूं जिन्होंने सिर्फ कोई सर्टिफिकेट जीता हो तो वही लोग इसके  हकदार  हो सकते है क्या ? आपको बतला दूँ -तैराकी में मैनें भी ढेर सारे सर्टिफिकेट जीते है। दरसल  जितने लोग  स्पोर्ट्स का समर्थन करते है वो उस खेल और  खिलाड़ी को प्रोत्साहित करते है। खेर मै चाहता हूँ कि हर खेल के खिलाड़यों के लिए हर वो सुविधा प्राप्त हो – जो अनिवार्य है। हमारे पुराने खिलाड़ियों ने तो केवल दाल चावल खा कर हमारे देश का नाम रोशन किया है। यह काबिले तारीफ बात  नही है तो और क्या है। यदि हर खिलाड़ी को सही सुविधाये मिले  तो वो बेहतर परफॉर्म कर पाएगा ओलंपिक्स मे, और  सभी ढेर सारे मेडल्स जीत कर हमारे देश का नाम रोशन कर सकते है।

 


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Mayapuri

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