मूवी रिव्यु: हौसलों को उड़ान देती ‘पंगा’

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रेटिंग****

निल बटा सन्नाटा, बरेली की बर्फी जैसी सफल फिल्मों के बाद निर्देशिका अश्विनी अय्यर तिवारी ने इस बार फिल्म ‘पंगा’ में एक ऐसी मां को प्रस्तुत किया है जो अपनी दबी हुई प्रतिभा को उजागर करने के लिये अपने आप से ‘पंगा’ लेती है।

कहानी

जया निगम यानि कंगना रनौत अपने पति प्रशांत यानि जस्सी गिल और अपने सात वर्षीय बेटे आदि यानि यज्ञ भसीन के साथ भोपाल में रहती है। जहां उसका पति रेलवे में इंजीनियर है, वही वो भी रेलवे में बुकिंग कलर्क है। दरअसल जया दस साल पहले कबड्डी में नेशनल लेबल की प्लेयर और कैप्टन रह चुकी है। लेकिन बाद में पति और बेटे की जिम्मेदारियों के बीच कबड्डी की खिलाड़ी कहीं खो कर रह गई। एक दिन जया का बेटा बत्तीस वर्श की हो चुकी अपनी मां को कबड्डी में कमबैक करने के लिये प्रेरित करता है । उसकी खुषी के लिये तो पति पत्नि कमबैक करने का नाटक करते हैं लेकिन इस बीच न जाने कब जया के भीतर सोया हुआ खिलाड़ी जाग उठता है, लिहाजा अब वो गंभीरता से कबड्डी से दौबारा जुड़ना चाहती है। उसकी इस इच्छा का सम्मान करते हुये प्रषांत और बेटा आदि उसे फुल सपोर्ट करते हैं बाद में जया की मां नीना गुप्ता तथा कबड्डी कोच और उसकी हमसफर प्लेयर बिंदास रिचा चड्ढा भी उसकी मदद करने के लिये आ जाती है। इस प्रकार सबके सहयोग और अपनी दड़इच्छा के चलते जया अपना आसमान छूने में सफल हो जाती है।

अवलोकन

अश्विनी की एक खासियत रही है कि वो ओरत को उसके परिवेश और आसपास के माहौल की कमाल की रचना करती हैं। इस बार भी उन्होंने कल की नेशनल खिलाड़ी और आज अपने अपको भूल कर पति और बेटे की जिम्मेदारियों का बोझ उठाते हुये अपने छोटे से संसार में खुश गृहणी दिखाया है। जिसकी दुनिया अब अपने पति और बेटे के इर्द गिर्द ही सिमटी हुई है। निर्देशक अपनी कहानी की महिला पात्रों के सशक्तीकरण की बात करती हैं लेकिन कहीं उन्हें प्रिची नहीं होने देती। फिल्म के संवाद काफी दिलचस्प और चुटीले हैं जैसे मैं एक मां हूं और मां के कोई सपने नहीं होते या हर बार ओरत से ही क्यों पूछा जाता है कि उसे उसका करियर स्टॉप करने के लिये उसके पति या घरवालों ने उसे मजबूर किया, ये उसकी अपनी इच्छा भी तो हो सकती है। फिल्म का बेशक बहुत ही नियंत्रित हैं लेकिन उसे और ट्रिम किया जा सकता था। पहला भाग थोड़ा लंबा लगता हैं लेकिन दूसरे भाग में तो पूरे वेग से भागता दिखाई देता है। बेहतरीन सिनेमाटोग्राफी के तहत भोपाल और वहां के माहौल तथा परिवार के क्रियाकलापों को बारीकी से दिखाया गया है। फिल्म का संगीत कहानी के अनुरूप है।

अभिनय

कंगना रनौत कितनी समर्थवान अभिनेत्री है ये देखना है तो उसकी ये फिल्म देख लीजीये। उसने एक गृहणी एक मां एक पत्नि तथा एक खिलाड़ी, इन सभी रूपों को इतनी कुशलता और सहजता से जिया है कि उसका हर रूप देखते बनता है। कई सीन में उसकी विवशता एक टीस बन कर सीधे द्र्शक के दिल में चुभती है। रिचा चड्डा एक बिहारी खिलाड़ी के तौर पर राहत का काम करती दिखाई देती है। उसका बिहारी एक्सेंट कॉमेडी पैदा करता है। कंगना और उसके सीन जब भी आते हैं दर्शकों में हंसीं का माहौल पैदा हो जाता है। नीना गुप्ता की सहयोगी भूमिका लाजलवाब रही। पति की भूमिका में जस्सी गिल शुरू से अंत तक सहज बने अच्छे लगते हैं। बेटे की भूमिका में यज्ञ भसीन का मासूम अभिनय सभी का मन मौह लेता है, खासकर उसके द्धारा बोले गये वन लाइनर मुस्कराने पर मजबूर करते रहते हैं।

क्यों देखें

‘पंगा’ एक ऐसी फिल्म है जो ओरतों के होंसलो को जगाती हैं उनमें ताकत भरती है। लिहाजा ऐसी फिल्म हर किसी को देखनी चाहिये।

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Shyam Sharma

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