कई बाधाओं को तोड़ती फ़िल्म ‘पंचलैट’

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भारतीय फ़िल्म जगत में, ख़ासकर हिंदी फ़िल्म उद्योग में बहुत सारी ऐसी चीज़ें हैं, जिन्हें लेकर फ़िल्म बनाना जोखिम भरा काम माना जाता है। अगर फ़िल्म की कहानी साहित्य पर आधारित हो! साहित्य भी हिंदी साहित्य का हो और उसमें आंचलिकता का पुट हो। एक ऐसी फ़िल्म जिसकी पृष्ठभूमि उत्तर भारत का कोई गाँव हो और कहानी भी आज से साठ साल पहले कही हो! एक ऐसी कहानी जो स्कूल-कॉलेज के कोर्स में पढ़ाई जाती हो! इन सारी बातों में आम फ़िल्मकारों को जोख़िम नज़र आता है।

कई बाधाओं को तोड़ती है फिल्म

साहित्य से किसी को परहेज़ नहीं, लेकिन ज़्यादातर साहित्य आधारित फ़िल्में अंग्रेज़ी साहित्य पर बनीं या चेतन भगत जैसे आधुनिक कथाकारों के उपन्यासों पर । लेकिन 17 नवम्बर को सारे हिंदुस्तान में रिलीज़ होने वाली हिंदी फ़ीचर फ़िल्म “पंचलैट” ऐसी कई सारी निषेधात्मक बाधाओं को तोड़ती है ।

यह फ़िल्म आधारित है श्री फणीश्वर नाथ रेणु की इसी शीर्षक वाली एक कालजयी रचना पर, जिसने लाखों – करोड़ों पढ़ने वालों के मन को छुआ है । “पंचलैट” फ़िल्म की पृष्ठभूमि है – आज से साठ साल पहले का एक गाँव, जहाँ तथाकथित आधुनिकता नहीं पहुँच पाई थी । पंचलैट की ज़ुबान है वह भाषा जिसमें ज़्यादातर उत्तर भारत आपस में संवाद करता है ।

मूल कथ्य के साथ कोई छेड़-छाड़ नहीं

इस कहानी को पर्दे पर उतारने का जिम्मा उठाया है निर्देशक प्रेम प्रकाश मोदी ने । प्रेम प्रकाश मोदी ने अपने इस प्रयास के बारे में बात करते हुए बताया कि – “किसी भी साहित्यिक रचना पर फ़िल्म बनाते समय उस मूल कहानी में कुछ ना कुछ जोड़ना-घटाना पड़ता है । इस फ़िल्म के कथानक में भी कुछ चीज़ें जोड़ी गई हैं लेकिन वह रेणु जी के रचना-संसार का ही प्रतिरूप हैं । कहानी के मूल कथ्य के साथ कोई छेड़-छाड़ किए बिना हमने जो फ़िल्म बनाई है, वह दर्शकों को वैसा ही अनुभव देगी, जैसा उन्हें रेणु जी की रचनाएँ पढ़ते समय मिलता था ।“

संगीत फिल्म का महत्वपूर्ण हिस्सा

इस फ़िल्म में यशपाल शर्मा, राजेश शर्मा, ब्रिजेन्द्र काला, अमितोष नागपाल, अनुराधा आदि जैसे मँजे हुए कलाकारों ने काम किया है । संगीत भी इस फ़िल्म का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो श्रोताओं को एक अलग दुनिया में ले जाएगा और उस अंचल की खुशबू भी बिखेरेगा । गानों के अलावा पार्श्व संगीत में ज़रूर आंचलिकता और आधुनिकता का सुंदर सामंजस्य है ।

इस फ़िल्म की कहानी की शुरुआत सन 1954 के बिहार के एक गाँव में होती है । इस गाँव मे  आठ अलग अलग जातियों के टोले शांति और सद्भाव से रहते हैं । महतो टोली को छोड़कर सभी टोलों के पास पेट्रोमेक्स लाईट है, जिसका इस्तेमाल उनकी अपनी अपनी पंचायतों में होता है, और इसीलिए इसे पंचलाइट कहते हैं ।

इस कारण अक्सर महतो टोली के लोगों को दूसरे टोलों के सामने हीन होने का अहसास होता है । वह अपना पंचलाइट खरीदने की सोचते हैं और इस कारण सभी से चंदा भी लेते हैं । बाहर के गाँव से आकर इस गाँव में बसा गोधन उनके लिए ज़्यादा चंदा देने वाला आसान शिकार है । लेकिन वह उन्हें खुश करने के लिए चंदा देने से इन्कार कर देता है ।

वह ‘आवारा’ नाम की फ़िल्म से काफ़ी प्रभावित है और इस गाँव में रहने वाली मुनरी को सुनाने के लिए उसी फ़िल्म के गाने गाता रहता है, जिसे सुनकर मुनरी की माँ गुलरी चिढ़ती रहती है । वह गुस्सा होकर पंचायत में शिकायत कर देती है और गोधन को जाति बिरादरी से बाहर कर कर दिया जाता हैं । लेकिन कहानी में एक रोचक मोड़ आता है जब पंचायत के लोग पंचलाइट खरीद कर लाते हैं और पाते हैं कि किसी को भी उसे जलाना नहीं आता ।

वे उपहास के डर से दूसरे टोले से किसी को नहीं बुला सकते । अंतत काफ़ी नाटकीय स्थितियों के बाद वह गोधन को वापस बुलाने का फ़ैसला करते हैं और उसे माफ़ कर देते हैं । गोधन आकर पंचलाइट जला देता है । पंचलाइट के उजाले में सारा अंधकार दूर हो जाता है । बाहर का भी और सभी के दिलों का भी ।

यह कहानी पूरी मासूमियत के साथ सबसे जुड़ने की कहानी है । यह कहानी पूरी सादगी से मन की जटिलताओं को हटाने की कहानी है ।

“पंचलैट” के आने से उस गाँव की, वहाँ के लोगों के बीच की बहुत सारी बाधाएं टूट जाती है, वैसे ही इस तरह की फ़िल्म से भी व्यवसायिक और सार्थक मनोरंजक फ़िल्मों के बीच की बहुत सारी बाधाएँ ख़त्म हो जाएँगी – ऐसा फ़िल्म के निर्देशक का विश्वास है ।


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Mayapuri

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