प्रकाश मेहरा जो गीतकार होत होत निर्माता निर्देशक बन गए

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prakash-mehra

मायापुरी अंक 50.1975

हजारों गम छुपा रखे हैं मैंने अपने सीने में मगर इक लुत्फ सा आता है अश्कों को पीने में दबारकर जाहिर यह करता हूं खुश हूं बहुत खुश हूं कसम उसकी मजा आता है यूं घुट-घुट के जीने में।

वाह क्या तड़प भरी शायरी है। वाह कैसा ख्याल है घुट-घुट के मरने का। ऐसे शायर को तो फिल्मों में अपना भाग्य आजमाना चाहिए। वह फिल्मों में आयेंगे तो जरूर हंगामा करेंगे। पर किस्मत से वे फिल्मों में आये भी तो फिल्मी शायर होते-होते रह गये और बन गये चोटी के निर्माता निर्देशक। आज भी उन्हें शायरी का बेहद शौक है। जब वे सिगरेट का लम्बा कश खींच कर, आंखे बंद कर थोड़ी देर के लिए सोचते हैं तो उनकी कल्पना गुनगुना उठती है। पर वे अब शब्दों में शायरी नहीं करते दृश्यों पर शायरी करते हैं। उनका नाम है प्रकाश मेहरा।

मैं जब पहली बार प्रकाश मेहरा से मिला तो उनके हाव-भावों से मुझे अंदाज हुआ कि वे लखनऊ के होंगे। लखनवी रेशमी कुर्ता, हाथ में लाल नग से जड़ी अंगूठी, लम्बे कश के साथ सिगरेट पीने का नया अंदाज, आराम करने की नजाकत, व्यस्तता में मादक मुस्कुराहट और पान के बीड़े को चबाने और पान चबाते-चबाते बात करने का स्टाइल सब कुछ ऐसा था लगता था जैसे वे लखनऊ या उसके आस पास के रहने वाले हों। मेरा यह अनुमान सही निकला जब उन्होंने अपनी फिल्मी जीवन यात्रा का वर्णन करते हुए बताया मैं बिजनौर का रहने वाला हूं। मुझे शौक था, मैट्रिक तक आते-आते में शायरी की दुनिया में खोने लगा। मैं फिल्मों में गीतकार के रूप में अपना भाग्य आजमाना चाहता था पर मेरे पिता जी को फिल्मी जीवन सख्त ना पसंद था। मैं जब छोटा था तभी मेरी मां गुजर गई थी। मां की मृत्यु का सदमा पिता जी को इतना गहरा लगा कि उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया। उस स्थिति में घर छोड़कर मुंबई आना इतना आसान नहीं था। इसी बीच एक घटना ने मुजे विद्रोही बना दिया। कौन-सी घटना?

सन 1958 की बात है। मै अपने चंद मित्रों के पास बैठा था। बातों ही बातों में मेरे एक मित्र ने शहीद भगत सिंह का सबसे प्यारा गीत सरफरोशी को तमन्ना अब हमारे दिल में है गा कर सुनाया तो मेरा खून गर्म हो उठा। उस गीत से मुझे ऐसी प्रेरणा मिली कि मैं विद्रोही बन उठा। फिर क्या था। बिजनौर से टिकट कटाया और लखनऊ के लिए चल पड़ा। मैंने फैसला कर लिया था कि लखनऊ से सीधा मैं मुंबई चला जाऊंगा पर बिजनौर से लखनऊ में मेरे फूफा जी रहते थे। लखनऊ स्टेशन पर ज्यों ही मैं उतरा, मेरे फूफा ने मुझे पकड़ लिया। घरवालों के सामने मेरी एक न चली और मुझे ‘गिरफ्तार’ करके बिजनौर वापस लाया गया। घर वालों के और आसपास के बुजुर्गो के उपदेशों के सामने मेरी एक न चली। सरफरोशी की तमन्ना मन की मन रह गई और घुट-घुट कर जीने लगा…

आखिर फिल्मों में आए कैसे?

मैट्रिक के बाद छुट्टियां हुई तो मैंने मुंबई आने की इच्छा घर वालों के सामने प्रकट की। मुंबई में हमारे कुछ संबधी थे उस वजह से इजाजत तो मिल गई पर कड़ी शर्त के साथ कि मैं फिल्मी स्टूडियोज से सौ कदम दूर रहूंगा। मैंने सोचा चलो किसी तरह मुंबई तो पहुंचो। बाद में जो होगा सो देखा जायेगा। मैं छुट्टियों के बहाने मुंबई चला आया। मुंबई आते ही सरफरोशी की तमन्ना वाला गीत फिर याद आया और स्टूडियो के चक्कर काटने लगा। मैं सूट-बूट और टाई पहन कर स्टूडियो जाता था ताकि स्टूडियो के चौकीदार मुझे रोक न दें। पर वे कम्बख्त इतने सख्त थे कि उनके सामने बन ठन कर जाने पर भी कोई रौब नहीं पड़ा। सहज बात बनते नहीं देखी तो मैंने कुछ चौकीदारों से जान पहचान कर ली और मैं स्टूडियोज आने-जाने लगा। मैंने सबसे पहले रूपतारा स्टूडियो में एस.यू सुन्नी के निर्देशन में बन रही ‘उडन खटोला’ की शूटिंग्स देखी थी। और उसी दिन से मैंने संकल्प कर लिया कि कुछ भी हो, मैं फिल्मों में गीतकार के रूप में कामयाबी हासिल करके रहूंगा। इसी बीच मेरे संबधियों से मार्फत फिल्म डिवीजन के कैमरा मैन मौर्य से मेरा परिचय हुआ। जब मैंने उन्हें अपने दिल की बात कही तो उन्होंने मुझे अपने कैमरा विभाग में 35 रू. मासिक वेतन पर एप्रेंटिस रखवा दिया। मैं बड़ी लगन से कैमरा की गतिविधियां सीखने लगा। मुझे एप्रेंटिस के बतौर भी काम करते हुए आनंद आया। पर जब मेरी छुट्टियां समाप्त हो गई तो घरवालों ने वापस आने के लिए ताकीद की। घर से पत्र पर पत्र आने लगे के मुझे कॉलेज में पढ़ना है। घर वालो का संदेश पढ़ कर सो नहीं सका और तड़पता रहा। करवटें बदलता रहा। आखिर मैंने फैसला कर लिया कि मैं मुंबई छोड़ कर अब हरगिज वापस नहीं लौटूंगा मेरे इस फैसले पर मेरे घर वाले इतने नाराज हुए कि मैं मुंबई में अकेला बिना किसी सहारे के रह गया। यहां से फिल्मी दुनिया के संघर्षो का नया और रोमांचक दौर शुरू हुआ।

इस तरह हजारों गम छुपा कर रखने वाले प्रकाश मेहरा को फिल्मी जीवन में स्थायी स्थान बनाने के लिए काफी जूझना पड़ा। वे चाहते थे गीत कार बनें और दूसरी और कैमरा की गतिविधियां सीखने पर उनके मन में फोटोग्राफर और निर्देशक बनने की तमन्ना भी जाग उठी थी। इस संघर्ष के दौरान यदि उनके कुछ दोस्त उन की मदद न करते तो शायद उन्हें वापस लौट जाना पड़ता। उन्हीं दोस्तों के कारण उनका परिचय विस्तृत होता गया और उन्हें लगा कि उनके सपने अवश्य ही साकार होंगे। उनके एक मित्र थे विष्णु मल्होत्रा जिन्होंने उन का परिचय निर्माता-निर्देशक विनोद देसाई से करा दिया। इस परिचय के कुछ ही दिनों बाद वे विनोद देसाई के पास सहायक निर्देशक के बतौर नियुक्त हो गए। उनके लिए सुनहरी दुनिया में प्रवेश पाने और अपनी आकांक्षाओं को फलीभूत करने के लिए सुनहरा द्वार मिल गया जिसे फिल्मी भाषा में ब्रेक कहते हैं। फिल्मों में जिसे ब्रेक मिल जाता है वही अपना स्थान बना लेता है। प्रकाश मेहरा ने भी यह ब्रेक पा कर अपना स्थान बना लिया।

मै्ंने पूछा सहायक निर्देशक बन जाने पर आपके गीतों का क्या हुआ?

प्रकाश मेहरा ने मुस्कुरा कर कहा गीतों की जिंदगी अधिक नही चल सकी। सहायक निर्देशक रहते हुए मैंने विनोद देसाई की फिल्में देव कन्या’ और ‘पूर्णिमा’ में कुछ गीत भी लिखे। कुछ गीत प्रसिद्ध भी हुए। पर बाद में मैंने महसूस किया कि सहायक निर्देशक के बतौर कार्य करते हुए, फिल्म निर्देशन की बारीकियों को सीखते हुए फिल्मी गीत लिखना इतना आसान नहीं है।

सहायक निर्देशक बतौर अनेक फिल्मों में कार्य करते हुए प्रकाश मेहरा ने अपनी मार्केट बना ली। उनके साथी, उनके शुभचिंतक कहने लगें कि यदि उन्हें स्वतंत्र निर्देशन मिल जाय तो वे अपनी प्रतिभा की गहरी छाप अंकित कर सकते हैं।

सन 1968 में उन्हें मंगतराम फिल्म्स के बैनर तले ‘हंसीना मान जायेगी’ फिल्म का स्वतन्त्र रूप से निर्देशन करने का मौका मिला। और उस पहली फिल्म के साथ ही वे सफल निर्देशकों की श्रेणी में आ गये। और ‘जंजीर’ के प्रदर्शन के बाद तो उनकी गणना श्रेष्ठतम निर्देशको में की जाने लगी। ‘जंजीर’ की सफलता ने नया रिकॉर्ड कायम किया और उसके साथ अभिताभ बच्चन का पुनर्जन्म हुआ और साथ में उदय हुआ फिल्म लेखक सलीम जावेद का कहते हैं ‘जंजीर’ से हिंदी फिल्मों में रहस्य रोमांच और थ्रिल पैदा करने वाली फिल्मों का नया युग शुरू हुआ है। ‘जंजीर’ के बाद ही उनकी दूसरी हिट फिल्म थी ‘हाथ की सफाई’ इन दोनों फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस खिड़की पर रिकॉर्ड कायम किये और प्रकाश मेहरा हिट फिल्मों के निर्देशक कहलाने लगे।

फिल्म निर्देशन की चर्चा करते हुए प्रकाश मेहरा ने बताया कि मैं स्व. गुरूदत्त और राज कपूर को अपना गुरू मानता हू्। मुझे उनके साथ कार्य करने का सौभाग्य तो नहीं मिला पर मैंने उनकी फिल्में देख-देखकर उनके निर्देशन से प्रेरणाएं ली हैं। आज भी फिल्म निर्देशन के क्षेत्र में उनके द्वारा प्राप्त उपलब्धियों को मैं अपने निर्देशन की मंजिले मानता हूं।

प्रकाश मेहरा ने अपनी अगली फिल्मों की चर्चा करते हुए बताया कि मैं इस वक्त, शांति सागर की ‘आखिरी डाकू’ का निर्देशन कर रहा हूं जिसके प्रमुख कलाकार हैं रणधीर, विनोद खन्ना और रेखा दूसरी फिल्में हैं चौधरी एंटरप्राइजेज कृत ‘हेराफेरी’ जिसमें अमिताभ बच्चन, विनोद खन्ना और सायरा बानो हैं। जे. एस. फिल्म कृत ‘खलीफा’ में रणधीर कपूर, प्राण और रेखा हैं। संगम आर्ट इंटरनेशनल कृत चोरों का राजा, मैं लगभग बना चुका हूं जिसके कलाकार हैं नवीन निश्चल, प्राण और सायरा दो तीन और भी फिल्में है कुछ फिल्में ऐसी है जिनकी तैयारियां ही रही हैं।

तैयारियों का क्या मतलब?

मैं उस वक्त किसी फिल्म की शूटिंग नहीं करता जब तक कि उसकी पटकथा प्रत्येक शॉट के अनुसार तैयार नहीं हो जाती। मैं जल्द से जल्द फिल्में बनाने के पक्ष में हूं।

पर आपकी फिल्में तो काफी विलम्ब से बनती है।

यह दोष मेरा नही काफी निर्माता अपना इंतजाम नही पाते तो कभी बड़े कलाकारों की शूटिंग्स डेट्स नहीं मिलती तो आप नये कलाकारों को लेकर फिल्में बनाने का सुझाव अपने निर्माताओं को क्यों नहीं देते?

यह उनकी बिजनेस की बात है। बड़े कलाकार सिक्कों की तरह चलते हैं। नये कलाकारों की फिल्मों के लिए वितरक नहीं मिलते।

आपकी दृष्टि में वे उपाय क्या हैं?

थियटरों का निर्माण देश में जितने अधिक थियेटर बनेंगे उतना ही लाभ फिल्म उद्योग को होगा। बड़े और छोटे दोनों प्रकार के थियेटरों का निर्माण होना चाहिए फिल्म वाले स्वयं इस दिशा में कुछ कर सकें तो फिर कहना क्या, सोने में सुहागा।

आप निर्माता भी बने हैं। उसके रूप में आपका अनुभव क्या है?

निर्माता की समस्याएं निर्देशक की समस्याएं नहीं हो सकती, निर्माता व्यवसाय का मालिक है और निर्देशक फिल्म बनाने का दोनों। के दायरे अलग-अलग हैं फिर भी यदि निर्माता निर्देशक बन जाता है या निर्देशक निर्माता बन जाता है या निर्देशक निर्माता बन जाता है तो दोनों के हितों में टकराहट नहीं होगी बल्कि सारे कार्य में सामंजस्य हो जायेगा।

पर आपकी फिल्म ‘हिमालय से ऊंचा’ तो नहीं चली?

मैं उसका निर्देशक नही हूं दूसरी बात यह है कि फिल्मों की सफलता और असफलता कई मुद्दों पर निर्भर करती है जिसके लिए एक को दोषी नहीं ठहराया जा सकता ‘हिमालय से ऊंचा’ एक नये ढंग की फिल्म थी और यह वह आम फिल्मों से अलग थी यदि वह कामयाब होती तो इस तरह की फिल्मों


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Mayapuri

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