यादों के दायरे पृथ्वीराज कपूर

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sikandar_prithviraj

 

मायापुरी अंक 11.1974

आम फिल्म स्टार बन जाना कोई बड़ी बात नही रही है। इन्स्टीट्यूट और स्टेज से सीधे लोग रजत पट पर चमकने लगते है और फिल्म हिट होते ही रातो-रात काया पलट हो जाती है किन्तु पहले के जमाने मे बड़े पापड़ बेलने पड़ते थे। उस वक्त कोई संस्था उन्हें अपना खून पसीना बहा कर सख्तियां झेलकर दिन-रात एक करने पड़ते थे। इसीलिए (स्ट्रगल) संघर्ष की आग में तप कर उन्होंने जो स्थान बनाया वह देरपा सिद्ध हुआ। इसीलिए कितने ही नये सितारों के आने पर भी वे लोग चांद की तरह चमक रहे है। जब कि कुछ नए सितारे तो जुगनू की तरह चमक कर शीघ्र ही लुप्त हो गए।

यह बात उन दिनों की है जबकि बम्बई में अधिक स्टूडियो नही थे और न ही इतनी फिल्में बनती थी कृष्णा कोहिनूर, इम्पीरियल के अतिरिक्त चंद एक स्टूडियो थे। उन्ही दिनों एक सुन्दर हट्ठा-कट्ठा, लम्बा-चौड़ा, नौजवान अभिनेता बनने की तमन्ना लिए स्टूडियोज के बन्द दरवाजों पर दस्तक दे रहा था। बड़ा संघर्ष किया। कुछ लोगों से भेंट भी की किन्तु किसी ने काम न दिया।

एक दिन वह साहस बटोर कर सेठ अदेशर ईरानी के इम्पीरियल स्टूडियो में जा घुसा। उससे पूर्व एक और नवयुवक भी अपना भाग्य आजमाने वहां पहुंचा था। पहले सेठ जी ने उसे बुलाकर इन्टरव्यू किया। कुछ देर बाद वह पहले वाला नवयुवक अपना मुंह लटकायें हुए वापस आ गया। उसके बाद इस नौजवान का बुलावा आया। सेठ जी ने पूछा

“क्यों आये हो ?

“जी वह अगर आप मुझे एक्टिंग का चांस दे सकें तो नौजवान ने रुक-रुक कर आशय बयान किया।

“क्या तुमने बाहर बोर्ड नही पढ़ा ? सेठ अदेशर ईरानी ने उसकी पूरी बात सुनने से पूर्व ही बात काट कर कहां “जाओ यहां कोई जगह नही है। सेठ ने रुखाई से कहा।

“सेठ जी आप काम मत दीजिए लेकिन मुझे एक मशवरा दे दीजिये। नौजवान ने गिड़गिड़ाते हुए प्रार्थना की। सेठ जी ने दुनिया देखी थी समझ गए कि यह क्या सलाह मांगने वाला है। उन्होंने गर्दन ऊपर उठाई। उसके साहस पर सेठ जी मुस्कुराये और बोले, “मश्वरे की बजाए अगर मैं तुम्हें काम दे दूं तो क्या तुम बिना वेतन के एक्स्ट्रा के तौर पर काम करना पसन्द करोगे ?

नौजवान एक्स्ट्रा का मतलब जानता था। यह सूनकर उसका चेहरा खिल उठा वह बोला, क्यों नही, क्यों नही। जरूर करूंगा, जरूर करूंगा।” यह कहकर सेठ जी के पैर छूकर उसने आशीर्वाद मांगा।

अगर तुम्हारा यह जज्बा कायम रहा तो आगे चलकर न जाने कितना नाम कमाओगे। इसके बाद वह नौजवान उस स्टूडियो का अपना मुलाजिम हो गया। एक दिन अचानक निर्देशक बी. पी शर्मा ने उस नौजवान से कहा। जाओ मैकअप करके तैयार हो जाओ। मुझे तुम्हारे कुछ शॉट लेने है।”

यह पहला स्क्रीन टैस्ट था। नौजवान उसमें उतीर्ण हो गया। यह देखकर सेठ जी ने उसे अपने कैबिन में बुलाया और बोले, “यह लो तुम्हारा एग्रीमेंट तुम्हें 75 रुपये महीना वेतने मिला करेगा। बधाई हो, तुम्हें हीरो चुन लिया गया है।

वह फिल्म (जिसके लिए नौजवान को हीरो चुना गया था) ‘सिनेमा गर्ल थी और वह नौजवान था पृथ्वीराज कपूर ! जिसके बारे में सेठ अदेशर ईरानी की भविष्य वाणी सच्ची सिद्ध हुई। जिस नौजवान को No Vacancy का बोर्ड दिखाया गया था। वह अपने पीछे फिल्म की एक हिस्ट्री छोड़ गया है


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Mayapuri

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