‘शादी में जरुर आना.. के बुलावे तक आधी शादी का कारवा गुजर गया है’

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एक लम्बा अरसा गुजर गया, पिछले 46 सालों से मैं कई रूपों में सिनेमा से जुड़ा हुआ हूँ. प्रोजेक्ट तैयार करने में डिस्ट्रीब्यूशन में, प्रोडक्शन में, इक्जिबिशन में, फाइनेंस करने के रूप में, टीवी-प्रोजेक्ट्स डिजाइनिंग (जी टीवी चैनल) और भी बहुत कुछ रूप में। प्रेजेन्टर के रूप में नई फिल्म ‘शादी में जरुर आना’ मेरे कैरियर की ताजा-तरीन पेशकश हैं- जिसमें मेरा जुड़ा होना मेरे कार्यों की फेहरिस्त में एक और टीका लगाने जैसा हो सकता है।

‘मेरे करियर की शुरुआत कहा से हुई, यह सोचना मेरे लिए भी खूबसूरत पल को याद करने जैसा है तब शायद मैं 18-20 साल का था। मेरे शहर जयपुर (राजस्थान) में फिल्म ‘गोरा और काला’ की लोकेशन देखने के लिए। कुछ लोग मुंबई से आए हुए थे। ये लोग थे- राजकुमार कोहली, नरेश कुमार तुली (राजेन्द्र कुमार के भाई) बाबू भाई उदेशी, फाइट मास्टर आदि।

मैं पतंग उड़ाने में लगा हुआ था। ये लोग छत पर मेरे पास आ गए और वे भी पतंग उड़ाने लगे। मैं फिल्में देखने का शौक रखता था, जब मालूम पड़ा कि वे लोग फिल्म के लिए लोकेशन देखने आए हैं। तो मेरी उनसे बात बढ़ी, मैंने उनको कई जगह दिखाई उन्हीं लोकेशनों में सुमेद पैलेस भी था, जो पहली बार शूट हुआ था. उसकी खुली दीवारें और खंडहर फिल्म ‘गोरा और काला’ में हैं। बाद में दस साल बाद उसका कलर हुआ। एक सैन्स के लिए मैंने ही करवाया था।

आज तमाम फिल्मों में वो पैलेस शूट हो चुका है। तब मैं बिना मुंबई आए एक फिल्म कंपनी से जुड़ गया इसे कहते हैं संयोग। फिर मुंबई आया यहाँ नरेश कुमार के यहाँ ऊषा खन्ना के पिताजी प्रोडक्शन देखते थे। उन्होंने मुझे अपने साथ जोड़ लिया और मैं प्रोडक्शन के काम में लग गया। कुछ दिन बाद डिस्ट्रिब्यूशन शुरू किया।

‘दो जासूस’ (राजकपूर-राजेन्द्र कुमार की फिल्म ली। इस फिल्म के लिए दिये गये मेरे पचीस हजार नरेश कुमार ने वापस कर दिया, बोले किसी और को दे चुके हैं। वे ऐसा क्यों किये थे? क्योंकि उनको डर  था फिल्म डूब जाएगी और दोस्तों में वे मेरा नुकसान हो, ऐसा नहीं चाहते थे। तब सिनेमा से जुड़े लोगों की सोच ऐसी थी। आज देखता हूं तो मन दुखी हो जाता है। कहीं से कोई पैसा लाता है, किसी को ब्रेक देन के लिए पैसा लगवाया जाता है। कुछ भी सेटअप बना नहीं होता.. बस, फिल्म शुरु करके पार्टी करके माल अन्दर कर लो। इस सोच के साथ काम होगा तो अच्छा काम कैसे होगा।

‘मैंने 82 फिल्मों का डिस्ट्रिब्यूशन किया है जो रिलीज होने बाली नामचीन फिल्में रहीं हैं। ‘गुलाभी’ ’राम तेरो गंगा मैली’, नागिन’ ‘बेताब’ ‘कृष्ण कन्हैया’ कितने नाम बताऊंगा। जिनमें 32 हिट थी। 22 फिल्में कमीशन में थी। 6 लॉस में थी और दो फिल्में बड़ी डिजॉस्टर थी। थे दो फिल्में ‘रजिया सुल्तान’ और ‘गांधी’। दोनों ही मेरे लिए सम्मान की फिल्में हैं। कहते हैं न कि आदमी मरे तो हाथी की मौत मरे ।

मुझे खुशी है कि मैं इनसे जुड़ा था। उन दिनों के मेरे सभी स्टारों के साथ जुड़े सम्बन्ध हेमा, रेखा.. सभी के साथ सम्मान जनक हैं। कभी किती से मन मुटाव नहीं हुआ। मैंने ‘क्षत्रिय’ फिल्म बनाई जे.पी. दत्ता के साथ। सिर्फ चार दिन में यह प्रोजेक्ट बना था। यह एक मल्टी स्टारर फिल्म थी। तमाम सितारे  इस फिल्म में भरे थे। आज देखता हूं। कि एक प्रोजेक्ट तैयार करने में सालां लग जाते हैं। तभी तो, फिल्म की कमाई का रेशो 10 प्रतिशत है और 90 प्रतिशत लॉस है इसलिए कि विन्डो के पीछे की तैयारी छूट जाती है। एक फिल्म बनने में कितनी एकाग्रता सहयोग और मेहनत विन्डो के पीछे होती है, यह कोई नहीं जानता।

मैं संयोग के बहुत मानता हूं। मेरी जिंन्दगी में संयोग हमेशा बनता गया। दिल्ली एयर पोर्ट पर इंडियन एयर लाइंस की फ्लाईट के लिए खड़ा था। सन 1992 की बात है। वहां राजेन्द्र कुमार ओ पी रल्हन सुभाषचंद्रा जी मिल गए। सुभाष जी ने बताया कि वह दूरदर्शन (तब सिर्फ एक ही चैनल था डीडी) के जैसा कोई इंटरटेनमेंट चैनल लाना चाहते हैं। मैंने कुछ सुझाव दिये बोले ऑफिस आकर मिलो। हम लोग मिले और उनके साथ जुड़कर जी टीवी की सपरेखा बनी। तब जी नाम भी नहीं था। बाद में यह चैनल कितना बढ़ता गया.. इतिहास है।

इन दिनों रिलीज फिल्म शादी में जरूर आना मेरे प्रोडक्शन सोहम रॉकस्टार (सोहम मेरे पोते का नाम है) और दीपक मुकुट (बेटा) ने विनोद बच्चन के साथ मिलकर बनाई है। इस फिल्म की डायरेक्टर रत्ना सिंह ने जब मुझे कहानी सुनाई, मैं हैरान रह गया था। आज नई सोच के साथ परिवारिक कहानी को इतनी अच्छी तरह पेश किया जाना.. वाकई लाजवाब है। सिनेमा बदल रहा है यह सच है। लेकिन बदलाव बेहतरी के साथ ही रहा है तो उसका स्वागत भी होना चाहिए।


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Sharad Rai

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