INTERVIEW: यदि प्रोड्यूसर जिन्दा रहेगा तो हम भी जिन्दा रहेंगे – श्री केतन मारू

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लिपिका  वर्मा

श्री केतन मारू शेमारू एंटरटेनमेंट लिमिटेड के कर्ता धर्ता हैं। लगभग 25 वषो से भी अधिक इंटरटेनमनेट  इंडस्ट्री से जुड़े हैं वो। उनका शुरआती दौर शेमारू बुक एवं वी एच एस रेंटल बिजनेस में हाथ आजमा कर केतन ने कई सारी फिल्में भी बना डाली। उनका फिल्मों का चयन करने का ढंग अलग है -जहां, ‘मनोरमा सिक्स फिट अन्डर’, ‘इश्किया’, ‘डेढ़ इशिक्या’ बनाई तो वही उन्होंने ‘हंटर’ जैसी फिल्मों का निर्माण भी किया. अब उनकी अगली फिल्म ‘मिर्जा – जूलिएट’ बहुत जल्द पर्दे पर सबको लुभाने आ रही हैं। पेश है केतन शेमारू के साथ लिपिका वर्मा की बातचीत के कुछ अंश –

आप इतने  सालो से फिल्मी दुनिया से जड़े हुए है। ..आपका सफर कैसा रहा। .. अपने सफर पर प्रकाश डाले ?

पहले फिल्मों का वितरण बहुत ही अलग ढंग से होता था। कोई भी निर्माता कुछ दिनों की शूटिंग करने के बाद एक ‘वी एच एस’ बना कर किसी भी म्यूजिक कंपनी के पास जाया करता और यदि उन्हें फिल्म की कहानी  समझ आती तो और कुछ दिनों की शूटिंग के पैसे दे कर वो म्यूजिक कंपनी उस निर्माता के साथ जुड़ जाया करती। अब यहाँ से वो निर्माता कुछ और दिनों की शूटिंग कर अपने साथ कुछ डिस्ट्रीब्यूटर्स को भी जोड़ लिया करता। इस प्रकार एक चैनल  बन जाता था। हर कोई एक फिल्म के साथ तह  दिल से जुड़ जाता और उनका रिश्ता बन जाता। लेकिन आज यह सिनेरियो बदल चुका है अब ऐसे फिल्म नहीं बनती है।

आज का दौर कैसा है और इस में क्या खामिया दिखती है आपको?

आज कॉर्पोरेट का जमाना आ गया है। जैसे ही मल्टीप्लेक्स का शुभारभ हुआ तब छोटी फिल्मों के निर्माताओं को ऐसे लगा कि उनकी फिल्में मल्टीप्लेक्स में दिखाई जाएँगी, और उन्हें इसका फायदा होगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पहले टिकट के रेट्स भी कम थे जो बढ़ कर आज 500/- तक हो गए है। फिर उन्हें  ऐसा लगा की लोग इतना ज्यादा  पैसे दे कर क्योंकर टिकट्स खरीदेंगे? लेकिन ऐसा नहीं हुआ। लोग टिकट खरीद रहे है। लेकिन वह सिर्फ कुछ जाने माने – हीरोज की फिल्म ही देखना पसन्द करते हैं। नए लोगों के लिए जनता  पैसे नहीं खर्चना चाहती है। और तो और यू टीवी तो बन्द ही हो गयी है और कुछ हद तक इरोस ने भी अब अपने कदम पीछे कर लिए है। ऐसी स्थिति में निर्माता क्या करेगा ?? यह एक बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह है ??darshan kumar

तो क्या फिल्में बननी बन्द हो जाएगी अब?

नहीं यही एक ऐसा ग्लैमर वल्‍​र्ड से जुड़ा व्यवसाय है जिससे हर आदमी जुड़े रहना चाहता है। एंटरटेनमेंट का यह तगड़ा मोड़ है, सो फिल्में बननी तो बन्द नहीं होगी किन्तु हाँ कितने भी नए फिल्मकार अगर वह अपना पैसा लगते हैं तो उनका सपोर्ट करना जरुरी है। नहीं तो कोई भी फिल्मकार  इस इंडस्ट्री में आने से कुछ तो डरेगा ही।

क्या यही वजह है आप अनेक नए कलाकारों की फिल्मों को रिलीज करते हैं ?

ऐसी बात नहीं है हम कोई दिग्गज नहीं है इस मामले में। लेकिन हाँ, यह जरूर है कि मैं  यदि किसी छोटी बजट की फिल्म से जुड़ता  हूं तो -निश्चित ही उसकी कहानी पहले सुनता हूँ। और यदि मुझे कहानी में कुछ दम लगे तो मैं  ऐसे फिल्मकारों को साथ देता हूँ। मैंने  हंटर, इश्किया, ओमकारा और डेढ़ इश्किया जैसी फिल्मों का निर्माण भी किया है।

यह फिल्ममिर्जा जूलिएटसे कैसे जुड़े और कितने दिन में आप ने बतौर निर्माता ग्रीन सिग्नल दिया होगा?

केवल तीन ही दिन में हम इस फिल्म को करने के लिए तैयार हो गये थे। क्योंकि इसकी कहानी भी सोनी -महिवाल , रोमियो जूलिएट इत्यादि प्रेम कथा जैसी ही है। किन्तु जमीं से जुड़ी हुई बहुत सारी चीजे इस ‘मिर्जा जूलिएट’ की  कहानी  में निर्देशक राजेश राम सिंह ….ने लिखी है। कहानी से सबको  यह जरूर लगेगा कि – वो अपनी रियल लाइफ से जुड़ी कुछ तो यादें  है जो पर्दे पर  देख रहे  हैं। यह एक ऐसी  रोमांटिक कहानी है जो  अॉडियंस को रोमांचित भी कर देगी। उन्हें यह फिल्म  बेहद पसन्द आएगी ऐसी हमें उम्मीद है , यही  वजह थी – हमे स्क्रिप्ट बेहद पसन्द आयी। मुझे आज भी याद है  जब हमारे यहाँ से लोग ‘वी एच एस’ लेकर फिल्म देखते और जब उसे लौटने आते तो हम उनसे जरूर यह बात भी पूछते कि फलां फिल्म में उन्हें क्या पसन्द आया। सो इतने वषों‍र् से यह हमारे लिए एक डाटा की तरह काम करता है। हम हमेशा कोशिश करते हैं कि दर्शकों  को  जो पसन्द आता है उस कहानी को  ही पर्दे पर लाये हम।Darshan-Kumaar

नये स्टार  कास्ट को लेकर फिल्म बना रहे हैं तो फिल्म से कितनी उम्मीदें है आपको?

यह बात हम जानते हैं कि- आजकल अॉक्यूपेंसी चार्जेज और तो और ए सी के चार्जेज और ट्रेलर इत्यादि रिलीज  करने का खामियाजा भी  भरना होता  फिल्म खुद ही डिस्ट्रीब्यूट भी कर रहे है , सो सब सोच समझ कर ही हमने इस फिल्म में अपना हाथ डाला है। क्योंकि स्टारकास्ट नयी है तो हमने 500  थिएटर्स बुक किये हैं। हमारा ऐसा मनना है कि यदि नए लोगों को चांस नहीं दिया जायेगा तो इस इंडस्ट्री  में कोई नहीं आना चाहेगा। वैसे भी कई मर्तबा घर बेच कर फिल्में बनाते हैं लोग जिन्हें रूचि होती है फिल्मों में। बतौर प्रोडूसर उन्हें बहुत नुकसान हो जाता है। हम इस फिल्म को प्रेजेंट और डिस्ट्रीब्यूट भी कर रहे हैं। आजकल छोटी फिल्मों को अॉडियन्स या तो टेलीविजन पर देख लेती है या फिर अपने मोबाइल पर बहुत ज्यादा हुए तो पाइरेसी द्वारा ही फिल्म देखने का लुफ्त उठा लेती है। हमारे लिए रिस्क फैक्टर बहुत ज्यादा है लेकिन सोच समझ कर किसी फिल्म को चुनते हैं।

किसी नए प्रोडूसर से क्या अपने टर्म्स पर एग्रीमेंट करते हैं?

जी नहीं। हम दोनों की विन विन सिचुएशन को मय नजर रख कर ही एग्रीमेंट करते हैं। हमारा यह मानना है- यदि प्रोडूसर जिन्दा रहेगा तो हम भी जिन्दा रहेंगे !! आप को एक बात बता दूँ हमसे जो भी जुड़ा है वह हमेशा हमारे साथ जुड़ा रहता है। इस इंडस्ट्री में रिश्तों के ही मायने हैं। अब निर्देशक विशाल भारद्वाज को ही ले ले -जब भी वह कोई फिल्म बनाते हैं तो सबसे पहले हमसे पूछते हैं। …. और उसके बाद ही कही और जाते हैं। यह रिश्ते ही है जो हमें इंडस्ट्री में बनाये रखे हैं।

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