देश प्रेम का जज्बा दर्शाती ‘राज़ी’

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हम अक्सर नेताओं, पुलिस तथा भ्रष्टाचार आदि को लेकर बड़ी-बड़ी बातें करते रहते हैं, लेकिन हमारे बीच एक ऐसी भी कौम है जो इन सबसे बेपरवाह हो सिर्फ अपने देश को लेकर सोचती है और उसके लिये मौत को भी गले लगाने से पीछे नहीं हटती। ऐसे ही एक देश के प्रति वफादार कश्मीरी परिवार की सच्ची कहानी पर आधारित निर्देशक मेघना गुलजार की फिल्म ‘राजी’ इसी सप्ताह रिलीज हुई है।

फिल्म की कहानी

कहानी 1971 की है, जब भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव चल रहा था। उसी दौरान कश्मीरी बिजनेसमैन हिदायत यानि रजत कपूर जो व्यापार के सिलसिले में पाकिस्तान जाते रहते थे। पाकिस्तान आर्मी में उनकी ब्रिगेडियर परवेज सयैद यानि शिशिर शर्मा से बढ़िया दोस्ती थी। असल में हिदायत भारतीय खुफिया एजेंट थे जो ब्रिगेडियर के जरिये पाकिस्तान की खबरें भारत को मुहैया करवाते थे। देश भक्ति के तहत उनके पिता ने भी देश की आजादी के लिये जंग लड़ी थी। एक दिन हिदायत को पता चलता है कि उन्हें ऐसी बीमारी हो गई है जिसके चलते वे कुछ ही दिनों के मेहमान है। देश में दुश्मन मुल्क के साथ जंग के हालात बन रहे थे लिहाजा उन्हें डर सता रहा था कि ऐसे में उनके बाद पाकिस्तान से खुफिया खबरें कौन ला पायेगा। देश भक्त हिदायत इसके लिये अपनी बीस साल की बेटी सहमत को इस काम के लिये चुनते हैं, जो दिल्ली में रहते हुये अपनी पढ़ाई पूरी कर रही है। सहमत अपने परिवार की रवायत को आगे बढाने के लिये जासूसी जैसे काम का कोई तजुर्बा न होते हुये भी उस काम के लिये तुरन्त राजी हो जाती है। देश की खुफिया ऐजेन्सी के स्टेशन हैड खालिद मीर यानि जयदीप अहलावत से सहमत एक महीने की कड़ी ट्रेनिंग लेती है। उसके बाद हिदायत पाकिस्तानी ब्रिगेडियर परवेज के बेटे इकबाल – जो पाकिस्तानी आर्मी में मेजर है- से सहमत का निकाह कर देते है। पाकिस्तान आने के बाद नाजुक सी सहमत कुशलता से वहां की खबरें इंडिया भेजने लगती है। ब्रिगेडियर के पारिवारिक के प्रति वफादार नौकर यानि आरिफ जकारिया को सहमत पर शुरू से ही शक है लिहाजा एक दिन वो उसे रंगे हाथों पकड़ लेता है। इसके बाद सहमत नौकर को जीप से कुचल कर मार देती है। इसके बाद उसका निशाना बनता है इकबाल का फौजी बड़ा भाई जो उसके लिये खतरा बनता जा रहा था। अंत में सहमत अपना भेद खुलने के बाद किस अंजाम तक पहुंचती है। इसके लिये फिल्म देखना जरूरी है।

शानदार डायरेक्शन

सच्ची घटना पर बनी फिल्म तलवार के बाद मेघना गुलजार एक और सच्ची घटना पर आधारित फिल्म लेकर हाजिर है और पहले की तरह सफल साबित हुई है। इस बार उन्होंने आलिया को एक जासूस के तौर पर बहुत प्रभावशाली ढंग से पर्दे पर उतारा है। उनकी कहानी के लिये की गई बेहतरीन रिसर्च पर्दे पर दिखाई देती है। उस वक्त का माहौल, वेश भूषा, पाकिस्तान और इंडिया के हालात तथा दोनों तरफ के किरदारों का प्रभावी ढंग से चयन किया है। फिल्म का पहला भाग सुस्त है लेकिन वो कहानी को सलीके से कहने के लिये हो सकता है, लेकिन दूसरे भाग में दर्शक फिल्म के किरदारों से पूरी तरह जुड़ जाता है और कितनी ही बार घटनाओं से प्रेरित हो रोमांचित हो उठता है। फिल्म की कसी पटकथा और संवाद और लोकेशनें उसे वास्तविकता के नजदीक ले जाते हैं। शंकर एहसान लॉय के संगीत के तहत ऐ वतन तथा दिलबरों जैसे गीत दर्शनीय बने पड़े हैं। 

इसमें कोई दो राय नहीं कि छोटी सी उम्र में आलिया भट्ट एक बड़ी और बेहतरीन अभिनेत्री साबित हो चुकी है। उसने अपने परिवार की जासूसी रवायत को आगे बढ़ाने वाली जासूस बेटी की भूमिका को इतनी खूबसूरती से निभाया है कि दर्शक शुरू से ही उसके साथ जुड़ा महसूस करता है तथा लास्ट में उसके इमोशनल दृश्यों को देखते हुये उसके साथ साथ भावुक हो उठता है। पाकिस्तानी मेजर और आलिया के पति की भूमिका में विकी कोशल पूरे नंबरों से पास करार दिये जाते हैं। मुख्य किरदार में आलिया के होते हुये भी उसने अपनी उपस्थिति को बेहतर ढंग से दर्शाया है। पाकिस्तानी ब्रिगेडियर परवेज के रोल में शिशिर शर्मा, आलिया के पिता बने रजत कपूर तथा भारतीय खुफिया एजेंसी के हैड के रूप में जयदीप अहलावत तथा नौकर बने आरिफ जकारिया आदि सभी कलाकार फिल्म के मजबूत स्तंभ साबित हुये हैं।

आलिया भट्ट के प्रशंसक उसे एक नई भूमिका में देखते हुये उससे एक बार फिर  प्रभावित होने वाले हैं।

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Shyam Sharma

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