मूवी रिव्यू: मनोरंजन के सारे गुर दर्शाता ‘रईस’

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रेटिंग***

राहुल ढोलकिया द्धारा निर्देशित ‘रईस’ गुजरात के अस्सी के दशक के शराब के स्मगलर अब्दुल लतीफ से प्रेरित कहानी है जो एक दिन इतना पावरफुल बन जाता है कि बाद में सिस्टम तक को चैलेंज दे बैठता है। बेशक फिल्म स्मगलर अब्दुल लतीफ से प्रेरित है लेकिन उसकी बायोपिक नहीं। फिल्म को रीयलिस्टिक अप्रोच के साथ बढ़िया तरह से कमर्शल ट्च वाली इस फिल्म का सारांश कुछ इस तरह है।srk-raees-

रईस यानि शाहरूख खान गुजरात का एक ऐसा किरदार है जिसके लिये कोई धंधा छोटा नहीं होता और धंधे से बड़ा कोई धर्म नहीं होता लेकिन उससे किसी का कोई बुरा न हो। अपनी मां से मिली इस सीख को वो ताउम्र याद रखता है। बचपन में पहले वो देशी शराब की सप्लाई का काम करता है इसके बाद वो इंगलिश शराब की सप्लाई के लिये अतुल कुलकर्णी के पास काम करने लगता है। धीरे धीरे वो इस काम के सारे गुर सीख जाता है, फिर अपने बचपन के दोस्त मौहम्मद जीशान अयूब के साथ खुद का धंधा शुरू कर देता है और एक दिन गुजरात में अवैध शराब का सबसे बड़ा स्मगलर बन जाता है बावजूद इसके वो इस बात का पूरा ख्याल रखता है कि उसके मौहल्ले वालों को उसकी वजह से जरा भी तकलीफ न हो। वैसे भी वो उनके लिये कुछ न कुछ करता ही रहता है। पुलिस डिपार्टमेन्ट में ईमानदार आई पी एस ऑफिसर मजमूदार यानि नवाजुद्धीन सिद्धिकी किसी भी अपराधी को लेकर अपने से बड़े ऑफिसर या नेता तक से कोई समझौता नहीं करता इसीलिये उसका तबादला होता रहता है। एक बार उसका तबादला रईस के इलाके में हो जाता है। इसके बाद दोनों के बीच चूहे बिल्ली का खेल शुरू हो जाता है। यहां रईस एक बार फिर मजमूदार का तबादला करवा देता है लेकिन मजमूदार दूर रहकर भी रईस पर नजर रखे हुये है। एक बार रईस एक अपोजिशन के नेता से भिड़ जाता है जिसके तहत उसे जेल जाना पड़ता है। बाद में रईस का हितैशी चीफ मिनीस्टर का अपोजिशन के नेता से टाइअप हो जाता है। इसके जवाब में रईस चुनाव में खड़ा हो भारी मतों से जीत जाता है, इस तरह वो एक तरह से सिस्टम से भिड़ जाता है,बाद में जिसका खमियाजा उसे अपनी मौत से चुकाना पड़ता है।mahira-shahrukh-

निर्देशक राहुल ढोलकिया इससे पहले परजानिया और लम्हा आदि फिल्में बना चुके हैं। इस फिल्म में उन्हांने वास्तविकता और कमर्शल वैल्यू का पूरा ध्यान रखते हुये फिल्म को पूरी तरह मनोरंजक बनाये रखा है। यहां तक शाहरूख खान जैसे स्टार का स्टारडम किरदार पर हॉवी नहीं होने दिया, इस काम में शाहरूख ने भी उनका साथ दिया। फिल्म का दूसरा अहम किरदार सादिक यानि मौहम्मद जीशान है जो  अपनी उपस्थिति से शाहरूख के किरदार को और मजबूत बनाता है लेकिन जीशान जैसे बेहतरीन एक्टर को और मौके दिये जाने चाहिये थे। इसी प्रकार रईस और मजमूदार के बीच की भिड़त देखने के लिये दर्शक उत्साहित रहता है लेकिन ये सब देखने के लिये उसे ज्यादा मौके नहीं मिल पाते। फिल्म में अस्सी के दशक के माहौल को बनाये रखा है इसलिये दर्शक अपने आपको उसी दशक में महसूस करता है। फिल्म की कास्टिंग एक हद तक परफेक्ट है। फिल्म का कैमरावर्क कहानी को और वास्तविकता प्रदान करता है। इसके अलावा स्मगलर, पुलिस और सिस्टम की पोल राहुल ढंग से नहीं खोल पाते। सुना है कि गुजराती स्मगलर अब्दुल लतीफ पूरी तरह से ग्रे किरदार था यहां तक गुजरात में हुये बम विस्फोट में उसका पूरा हाथ था लेकिन फिल्म में उसे सच्चा, गरीबों का मसीहा और मां की बात याद रखने वाला नेकदिल इंसान दिखाया गया है।laila-main-

बैकग्राउंड म्यूजिक फिल्म का वजन बढ़ाता है वहीं लैला ओ लैला गाने के अलावा बाकी गीत कहानी रफ्तार में अवरोध पैदा करते हैं।

शाहरुख एक बेहतरीन स्टार एक्टर है इस बार उन्होंने अपने किरदार पर अपने आपको हॉवी नहीं होने दिया यानि वे ज्यादातर अपने किरदार में घुसे दिखाई देते हैं। मौहम्मद जीशान अयूब ने उनके साथी के तौर पर बढ़िया अभिनय किया है, उन्हें और मौका दिया जा सकता था। माहिरा खान को मिसकास्ट कहा जा सकता है क्योंकि फिल्म में उसका कोई योगदान नहीं। नवाजुद्धीन ने एक बार फिर साबित किया है कि वे एक ऐसे अभिनेता हैं जो अपने किरदार को बेहतर और दिलचस्प बनाने के लिये किसी भी हद तक जा सकते हैं, यहां भी वे अपने दिलचस्प अंदाज में सवांद बोलते हुये दर्शकों का भरपूर मनोरजंन करते हैं। डॉन मूसा के रोल में नरेन्द्र झा खूब जमे हैं तथा अतुल कुलकर्णी अवैध शरब व्यापारी के किरदार में ध्यान आकर्षित करने में सफल है। सनी लियोनी का आइटम सांग दिलकश है।


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Mayapuri

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