INTERVIEW: ‘‘भूरी’ देख हैरानी होगी कि क्या नया निर्देशक इतनी बेहतरीन फिल्म बना सकता है’’ – रघुवीर यादव

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मैसी साब, सलाम बांबे, बैंडिड क्वीन, वाटर,दिशा, धारावी,पपीहा, सूरज का सातवाां घोड़ा, फिराक,लगान आदि ऐसी न जाने कितनी फिल्मों में रघुवीर यादव अपने अभिनय की खुश्बू बिखेर चुके हैं । इसके अलावा उन्होंने अपनी बेहतरीन अदाकारी से टीवी पर मुंगेरी लाल के हसीन सपने,यात्रा, मुल्ला नसरूद्दीन तथा चाचा चौधरी जैसे बेहतरीन धारावाहिकों को भी प्रसिद्ध किया। बहुमुखी प्रतिभा संपन्न रघुवीर बहुत उम्दा सिंगर भी हैं । उनकी आवाज का इस्तेमाल मैसी साब, रूदाली,आसमान से गिरा, ओ डार्लिगं ये है इंडिया, समर, संडे,रामजी लंदन वाले,डरना मना है, दिल्ली 6, तथा (टाइटल सांग चाचा चौधरी टीवी शो) और पीपली लाइव आदि फिल्मों में किया गया । इस सप्ताह उनकी एक और रीयेलस्टिक फिल्म ‘ भूरी’ रिलीज हो रही है । फिल्म के अलावा कुछ अन्य सवालों को लेकर रघुवीर यादव से एक बातचीत ।

फिल्म ‘भूरी’ क्या है ?

फिल्म में बताया गया है कि अधेड़ उम्र में शादी करने के क्या परिणाम होते हैं जब आपकी उम्र से छोटी और खूबसूरत लड़की से आपका विवाह हो जाता है । उसके बाद किस तरह वो लोगों की वासनामयी नजरों का केन्द्र बन कर रह जाती है । फिल्म में ये भी बताने की कोशिश की गई है, कि इस तरह आज भी गांव खेड़ों में नारी का शोषण होता है।raghuvir

इस तरह के शोषण का कौन जिम्मेदार कौन है ?

गंाव में आज भी दंबग किस्म के जमींदार या उसी तरह के लोग गरीब और कमजोर आदमी को दबाने से बाज नहीं आते और अगर कोई खूबसूरत ओरत हो तो फिर उसका तो भगवान ही मालिक होता है । यहां भी कुछ ऐसा ही है ।

कहानी और आपनी भूमिका के बार में क्या कहना है ?

जैसा कि मैने बताया कि यूपी के एक गांव में एक ईटों के भट्टे पर गांव के गरीब गुरबा लोग काम करते हैं, उन्हीं में मैं भी हूं, जिसकी अधेड़ उम्र में शादी होती है । उसके बाद उसकी जवान खूबसूरत बीवी पर गांव के जमींदार मोहन जोशी, भट्टा मैनेजर मुकेश तिवारी, पुजारी सीताराम पांचाल तथा गांव के बनिये मनोज जोशी आदि दंबग लोगों की बुरी नजर पड़ जाती है । बाद में एक शडयंत्र के तहत वे मुझ पर एड्स का मरीज होने का इल्जाम लगा कर गांव से बाहर रहने के लिये मजबूर कर देते हैं । इसके बाद मेरी बीवी के साथ ऐसा कुछ होता है कि वो पूरे गांव वालों के साथ हमबिस्तर होने पर मजबूर हो जाती है । कुछ दिन बाद गांव के लोग अचानक मरना शुरू हो जाते हैं। जांच करने पर पता चलता है कि मेरे सिवा पूरे गांव को एड्स है। इस तरह एक नारी अपने पर हुये जुल्माें का पूरे गांव से बदला लेती है ।

किसी फिल्म में क्या कुछ देखते हैं ?

देखिये सच तो ये है कि जब मैं किसी फिल्म की कहानी सुनता हूं ,शुरूआत में तो मुझे सिर्फ मेरा किरदार ही नजर आता है । थियेटर का आदमी होने के नाते बाद मैं जब कहानी के दूसरे किरदारों पर नजर डालता हूं तो एक उत्सुकता रहती है कि ये रोल कौन करेगा या वो रोल कौन निभाने वाला है । दरअसल ये डर लगा रहता है कि अगर सामने कोई अच्छा एक्टर न हुआ तो क्या होगा और अगर बहुत अच्छा एक्टर होगा तो क्या होगा । दूसरे जब भी मैं गांव खेड़ों से जुड़ी फिल्में करता हूं तो मैं उसी फितरत का हो जाता हूं ।raghuvir yadav, mopasa film bhouri

किसी नये निर्देशक के आपका क्या बर्ताव होता है ?

मैं कभी पुराना या नया नहीं देखता क्योंकि कभी कभी एक नया डायरेक्टर बहुत पुराना सब्जेक्ट ले आता है, तब वहां मैं अपने तर्जूबे का इस्तेमाल करता हूं । जंहा तक नये डायरेक्टर के बात की जाये तो वो काम करेगा तभी पुराना होगा ।मैं जब किसी नये शख्स के साथ काम करता हूं तो उसके साथ पूरी तरह से ताल मेल बना लेता हूूं बस इसके बाद सब सही होता चला जाता है । इस फिल्म की बात कर लीजीये, इसके निर्देशक की ये पहली फिल्म है लेकिन जब आप फिल्म देखेगें तो आपको हैरानी होगी कि क्या एक नया निर्देशक इतनी बढि़या फिल्म बना सकता है ।

कमर्शल फिल्मों में किस हद तक इन्वॉल्व हैं ?

सही बात ये है कि मैं ज्यादा इन्वॉल्व नहीं हूं । दरअसल पिछले दिनों ये कर्मशल शब्द हमारे कल्चर, हमारे आर्ट को इतना दख़्ल दे रहा था कि उसकी वजह से अच्छे सिनेमा में थोड़ी गिरावट आयी और इसका दोष आसानी से दर्शक के सिर मढ दिया जाता है । भैया तुम जो दिखाओगे दर्शक तो वही देखेगा फिर वो जिम्मेदार कैसे हो गया । अब दर्शक इतना समझदार हो गया है कि आप उस पर कुछ भी नहीं थोप सकते । उसे जो अच्छा लगेगा वो देखेेगा,नहीं लगा तो फौरन उसे नकार देगा ।mapasa, raghuvir

ऊंचे कैलिवर के कलाकार होने के बावजूद बड़े बैनर्स का आपके साथ स्वार्थपूर्ण रवैया रहा है । इस बारे में आपका क्या कहना है ?

बेशक दर्द तो होता है लेकिन मुझे इस बात का मलाल नहीं है, हो सकता है कल कुछ ऐसा हो जाये कि आपको अपने सवाल का जवाब मिल जाये । वैसे जिन बड़े बैनर्स की बात की जाती है अच्छा हैं मैं उनसे नहीं जुड़ा हुआ क्योंकि मैं अपनी फितरत नहीं बदल सकता । एक एक्टर की जो छटपटाहट होती है वो ताउर्म बनी रहती है । मेरे लिये उस छटपटाहट से छुटकारा पाने का साधन थियेटर है जिससे मैं लगातार जुड़ा हूं ।

इन दिनों क्या कोई नाटक चल रहा है ?

जी हां । नाटक का नाम है ‘ प्यानो’ । इस नाटक के मुख्यता तीन किरदार हैं । मैं, मेरी पत्नि रौशनी और मेरा बेटा अबीर ।


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Mayapuri

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