राज कपूर,एम्बेसडर कार और के.ए.अब्बास

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अली पीटर जॉन

ऐसा लगता था कि यह एक टीम है जो एक दूसरे के लिए ही बनी है. हर इंसान दूसरे इंसान को बहुत अच्छे तरीके से समझता था,चाहे उनके बीच कोई मतभेद ही क्यों ना हो. सब ने एक दूसरे के मुड ऐर नखरों को संभालने में मास्टर कर रखा था. राज कपूर के.ए. अब्बास को अपनी आंतरिक आवाज कहते थे और क्.ए..अब्बास ने भी “आवारा ” और ” श्री 420 ” जैसी फिल्में लिख कर आरके स्टूडियोज को बनने में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

राज़ कपूर ने बाकी लेखकों को भी आजमाया जैसे ‘जिस देश में गंगा बहती है’ के लिए अर्जुन देव रश्क और ‘संगम’ के लिए इंदर राज आनंद. पर उन्होंने खुद कहा कि उन्हें किसी और लेखक के काम से उतनी संतुष्टि नहीं मिलती जितनी के. ए. अब्बास के काम से मिलती है.
यही कारण था कि जब वो अपने जीवन की सबसे महत्वपूर्ण फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ बनाने की सोच रहे थे तो उन्होंने के.ए.अब्बास को ही फिर से लिखने की जिम्मेदारी सौंपी. यह फिल्म एक तरह से उनके जीवन पर आधारित थी. राज कपूर को पता था कि कोई और लेखक उनके जीवनी लिखने में न्याय नहीं कर सकता जितना के. ए. अब्बास कर सकते हैं क्योंकि वो राज कपूर के जीवन के बारे में सब कुछ जानते थे. उन दोनों का रिश्ता तो इतना गहरा था कि राज कपूर के व्यक्तिगत रूम में सिर्फ दो तस्वीरें टंगी थी जिसमें से एक तस्वीर में के.अ.अब्बास और राज कपूर साथ में बैठे हुए थे और दूसरी तस्वीर में के.ए.अब्बास द्वारा राज कपूर के लिए लिखी गई कविता थी.

इतिहास गवाह है कि ‘मेरा नाम जोकर’ बुरी तरीके से फ्लॉप हो गई. जिसकी वजह से राज कपूर को अपनी सारी संपत्ती बेचनी पड़ी यहां तक कि उन्होंने अपना घर और स्टूडियो भी गिरवी रख दिया. वो बिल्कुल टूट चुके थे और पूरे दिन शराब के नशे में रहने लगे थे. एक सुबह जब उन्हें होश आया तो पहला नाम जो उनके दिमाग में सबसे पहले आया,वो थे अब्बास जो उनको इस परेशानी से निकाल सकते थे.

वो अब्बास के ऑफिस गये जो कि पांचवी मंजिल पर थी और वहां कोई लिफ्ट नहीं थी. दोपहर का वक्त था और राज कपूर नशे की हालत में इस कदर थे कि उनके मैनेजर मिस्टर बिबरा और उनके एक मित्र को उनको पकड़ कर पाँचवी मंजिल तक ले जाना पड़ा. ऑफिस बिल्कुल किसी फैक्ट्री की तरह दिख रही थी. ना तो वहां कोई वहाँ फिल्म से संबंधित चीजें थी ना ही कोई ऐशो आराम की चीज थी.

राज कपूर को देखते ही अब्बास ने उन्हें ऑफिस से निकल जाने को कहा क्योंकि उन्हें बिल्कुल बर्दाश्त नहीं था कि कोई उनके ऑफिस में नशे की हालत में आये. पर जब उन्होंने अपने दोस्त को हाथ जोड़े, आंखों में आंसू लिए अपने सामने खड़ा पाया तो उनको दया आ गई और उन्होंने राज कपूर से सामने कुर्सी पर बैठने को कहा.

राज कपूर कहने लगे कि, “बर्बाद हो गया हूं, मुझे मालूम है, सिर्फ तुम मुझे और आर के स्टूडियोज़ को बचा सकते हो. मेरे पास और कोई रास्ता नहीं है, मेरा बेटा है चिंटू जिसको मैं हीरो बनाना चाहता हूं और एक नहीं लड़की को लेने का सोच रहा हूं. लेकिन ये सब तब होगा जब तुम मेरे लिए कहानी लिखोगे.” यह मीटिंग तब खत्म हुई जब अब्बास ने उन्हें तीन दिन के भीतर एक स्क्रिप्ट की रफ कॉपी देने का वादा किया. राज कपूर तीसरे दिन ऑफिस गए. अब्बास ने मौके की गंभीरता को समझते हुए बॉबी की पूरी स्क्रिप्ट तीन दिनों में ही लिख कर राज कपूर के हाथों सौंप दी. राज कपूर जब उनके पैर छूने के लिए बढ़ें तो अब्बास ने अपने चिर परिचित अंदाज में कहा कि, “मैं भगवान नहीं हूं . मैंने मेरा काम कर दिया है.अब तुम और तुम्हारा भगवान ही जाने.”
अगले 6 महीने तक मुंबई और गोवा में फिल्म की शूटिंग हुई जिसमें दो युवा कलाकार और बहुत से सीनियर कलाकार जैसे प्रेमनाथ, प्राण, प्रेम चोपड़ा और अरुणा ईरानी थे.


राज जिन्होंने अपनी पहली सभी फिल्मों में शंकर जयकिशन, शैलेंद्र और हसरत जयपुरी के साथ काम किया था उन्होंने अपनी इस के लिए इस टीम को हटाकर एक नई टीम के साथ काम करना चाहा और वो टीम थी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल,आनंद बख्शी और युवा गायक शैलेंद्र सिंह की, जिन्होंने फिल्म में ऋषि कपूर के सभी गानों में अपनी आवाज दी थी.
फिल्म बहुत बड़ी हिट साबित हुई और आर.के. स्टूडियोज़ की कीर्ती वापिस स्थापित हो गई.

राज कपूर शोमैन के रूप में वापस आ चुके थे और खुशियां मनाने की वजह की तो लाइन लग चुकी थी. राज कपूर ने इस खुशी के मौके पर यह निर्णय लिया कि टीम के सभी मेंबर्स को एक नई अंबैस्डर कार और बाकी लोगों को बाइक और हरक्यूलिस साइकिल उपहार के रूप में देंगे.

अब समय आया था जब अब्बास को उनका उपहार देना था. राज कपूर अपनी उजली एम्बेसडर में बैठकर जुहू की तरफ निकल गए और उपहार के रूप में दी जाने वाली नई एम्बेसडर उनके कार के पीछे आ रही थी. राज ऑफिस पहुंचे और अब्बास से नीचे आने को कहा और अब्बास ने चीखते हुए कहा कि, “तुम्हारी बेवकूफियों के लिए मेरे पास वक्त नहीं है.” राज कपूर ने कहा कि बस 1 मिनट नीचे आए. राज कपूर ने उन्हें गाड़ी की चाबी देते हुए ड्राइवर जिसका नाम आशफाक था उसकी तरफ इशारा करते हुए कहा कि, “आज से यह आपका ड्राइवर रहेगा और इस गाड़ी के पेट्रोल का खर्च और अशफाक की सैलरी,सब मैं दूंगा पर सिर्फ एक शर्त पर कि आप इस कार को कभी नहीं बेचेंगे.” क्योंकि राज कपूर को पता था कि अब्बास अपनी फिल्में बनाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं,कोई भी वादा तोड़ सकते हैं,कुछ भी बेच सकते हैं.

अब्बास के पास उस कार को बेचने के कई मौके आए पर उन्होंने अपने वादे को पूरा करते हुए उस कार को नहीं बेचा. मैंने उस कार को अंतिम बार अब्बास जी के निधन पर देखा था जब वो बिल्कुल खराब हो चुकी थी.

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