राजेन्द्र कुमार और कबीर बेदी बने डाकू और महात्मा

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Bollywood lacks good young actors, says Kabir Bedi

 

मायापुरी अंक 45,1975

भारतीय फिल्मों के इतिहास में हर पांच दस साल बाद एक दौर ऐसा अवश्य आया है, जब दर्शकों ने डाकू प्रधान फिल्मों को देखने में जरूरत से ज्यादा रूचि दिखाई है। इन दिनों हिन्दी फिल्में एक बार फिर उसी दौर से गुजर रही हैं। ‘कच्चे धागे’‘बिंदिया और बंदूक’‘हीरा’‘कुन्दन’‘पत्थर और पायल’ जैसी कई डाकू प्रधान फिल्मों की अपार सफलता इस बात का खुला प्रमाण हैं।

डाकू प्रधान फिल्मों की सफलता का यह नया दौर ‘मेरा गांव मेरा देश’ की सफलता के बाद ही से शुरू हो गया था। इस फिल्म के चल निकलते ही डाकुओं वाली फिल्मों की एक लाइन-सी लग गई। दर्जनों फिल्में रिलीज़ हो चुकी हैं, और उस पर भी कई फिल्में ऐसी हैं, जो तेजी से बनाई जा रही हैं।

उस रोज जब हम घूमते घामते रूप तारा स्टूडियो पहुंचे, तो पता चला, स्टेज नंबर एक पर निर्माता ए.वी. मोहन की फिल्म ‘डाकू और महात्मा’ का सेट लगा हुआ है। इससे पहले कि हम सेट पर पहुंचते, मोहन जो किसी काम से खुद ही बाहर निकलते दिखाई दिये। जैसे ही हमें देखा, लपक कर करीब आये, दुआ सलाम के बाद हाल वाल पूछा, और फिर सेट पर चलने की दावत दी। अंधे को चाहिए आंखें, और हमें चाहिये शूटिंग

अगले ही पल जब हमने मोहन जी के साथ सेट पर प्रवेश किया तो अपने को डाकू के एक बड़े से अड्डे पर पाया। ईंटो और बड़े-बड़े पत्थरों से मजबूत बनी (केवल नज़र आने वाली) दीवारें अड्डे को कई हिस्सों में बांट रही थी। सामने एक चबूतरे पर एक खाट पड़ी थी, और उस खाट पर डाकू कबीर बेदी जख्मी हालत में बायें पैर के घुटने से मोड़े, और दायें पैर को लंबा किये खाट के सिरहने बैठा था। उसके कंधो पर एक कासा-सा कंबल भी पड़ा हुआ था। खाट के दूसरे सिरे यानी कबीर के पैरों के पास राजेन्द्र कुमार कुछ गंभीर मुद्रा में खामोश बैठा था। उसकी वेशभूषा किसी फौजी से काफी मेल खा रही थी। उसके जूते घुटने तक लंबे थे, और गले मे लाल रूमाल भी बंधा हुआ था। इन दोनों के अलावा अभिनेता, नरेन्द्र नाथ जी भी एक डाकू के रूप में करीब खड़े नजर आये।

हम अभी इन चीजों का जायजा ही ले रहे थे कि मोहन जी ने स्पॉट बॉय से दो कुर्सियां मंगवायी, एक पर हमें बिठाया, और दूसरी पर खुद भी बैठ गये। मोहन जी से जब हमने इस सीन के बारे में पूछा, तो उन्होंने बतायाकि, कबीर बेदी फिल्म में डाकुओं के सरदार बने हुए हैं, राजेन्द्र कुमार भी एक बड़े डाकू हैं, फिर भी दोनों एक दूसरे के दोस्त हैं, और डाके भी एक साथ मिलकर डालते हैं। एक बार जब दोनों एक बैंक पर, पांच लाख रूपये का डाका डाल रहे होते हैं, तो सरदार यानि कबीर बेदी की टांग में पुलिस की गोली लग जाती है राजेन्द्र कुमार रूपयों को एक जगह हिफाजत से छुपा देता है, और दोनों जान बचाकर भाग निकलते हैं।

अड्डे पर पहुंचने के बाद वैद्य जी बताते हैं कि गोली का जहर टांग में फैल चुका है, इसलिए उसे टांग कटवानी पड़ेगी। यह सीन उसके बाद ही शुरू होता है। जो कि अब फिल्माया जाने वाला है।

मोहन जी के सीन समझाने तक अगले सीन की तैयारियां पूर्ण हो चुकी थीं। निर्देशक ने कलाकारों को आवश्यक बातें बतायीं और ‘फुल लाइट’‘फैन आन’ जैसी आवाजों और क्लैपर बाय क्लैप बोर्ड बजा कर सीन नंबर बोलने के बाद सीन कुछ यूं शुरू हुआ।

राजेन्द्र कुमार कबीर बेदी के कंधे हाथ रखते हुए पहले तुम ठीक तो हो जाओ।

नरेन्द्र नाथ जो कुछ फासले पर खड़े थे दो कदम आगे बढ़ कर राजेन्द्र कुमार की ओर देखते हुए कहते हैं रुपये की खुश्बू दूर-दूर तक फैलती है दिलावर सरदार ठीक ही कहते हैं, कहीं ऐसा ना हो, रूपया कोई और ही ले जाये।

राजेन्द्र कुमार आत्म विश्वास और गंभीरता के साथ कहते हैं, रूपया ऐसी जगह है, जहां से कोई नही ले जा सकता।

कबीर बेदी उत्सुकता तथा बेचैनी के साथ कहते हैं, फिर भी तुम रुपया ले जाओ दिलावर भगवा (नरेन्द्र कुमार) तुम इनके साथ जाओ

कट, निर्देशक ने कहा, और फौरन लाइट बंद करवाके फैन आन करा दिये गये, शॉट पांच छ: बार रिटेक के बाद ओ.के हो सका उसके बाद अगले शॉट की व्यवस्था की जाने लगी। तब तक मोहन जी ने हमारे लिए चाय की व्यवस्था कर दी थी।

चाय की चुस्कियां लेते समय जब हमारी नजर दोबारा उस शॉट पर पहुंची, जहां अभी-अभी शॉट लिया गया था। देखा, कबीर बेदी खाट से नीचे पैर लटकाये बिल्कुल सही हालत में बैठे, निर्देशक के संग अगले सीन के बारे में मशवरा कर रहे थे। तभी नरेन्द्र नाथ ने, जो कि करीब ही खड़े थे, जेब से सिगरेट का केश निकाला एक सिगरेट निकाल कर अपने मुंह से लगाई और फिर सिगरेट केस वाला हाथ कबीर की ओर बढ़ा दिया। मगर कबीर ने बड़ी सख्ती के साथ सिगरेट लेने से मना कर दिया और उतनी ही सख्त आवाज़ में बोले, पहले शॉट समझ लो फिर सिगरेट पियेंगे। मगर जब निर्देशक ने खुद ही उन्हें आज्ञा दी तो उन्होंने नरेन्द्र से सिगरेट ले ली।

काम के प्रति कबीर की ईमानदारी ने हमें चकित दिया। यह बात हमने अन्य कलाकारों में बहुत कम पायी है।

शायद कबीर की बढ़ती हुई सफलता का मुख्य कारण काम के प्रति उसकी यही ईमानदारी ही हो।

चाय खत्म करके हमने शूटिंग देखना भी खत्म किया और मोहन जी से इजाज़त लेकर बाहर चले आये। पाठकों राधा मोहन आर्टस की इस ‘डाकू और महात्मा’ में कबीर बेदी के अलावा, मुख्य पात्रों में राजेन्द्र कुमार के साथ रीना रॉय भी काम कर रही हैं। निर्माता ए.वी. मोहन यह चित्र जल्द ही पूर्ण करके आपके सम्मुख पेश करना चाहते हैं।

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Mayapuri