राजेन्द्र कुमार – सब समय की माया है

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मायापुरी अंक 55,1975

राजेन्द्र जी एक ज़माने में आपको जुबिली कुमार कहां जाता था। लेकिन अब आपकी फिल्में बड़े इंतजार के बाद आती है। इस उतार-चढ़ाव का कारण क्या है?

यह तो विधि का चक्र हैं किसी की दशा कभी भी एक जैसी नहीं रहती पेड़ो पर फूल लगते है, गिर जाते है। दरअसल जब तक आदमी सुख के बाद दुख न भोगे सुख की महत्ता का अहसास नही होता। राजेन्द्र कुमार ने दार्शनिक की तरह कहा एक बात यह भी है कि मैंने सदा चार फिल्मों से अधिक फिल्में एक साथ नही की इसीलिए मेरी फिल्में कम आती है।

आपने अब तक जो फिल्में की है, उन फिल्मों में से आपको अपनी कौन-सी फिल्में सबसे अधिक पसंद है?  मैंने पूछा।

सच पूछिये तो अभी तक ऐसी फिल्म नही आई है। एक कलाकार के जीवन में उसकी सर्वश्रेष्ठ फिल्म कभी नही आती।

वह अपनी हर फिल्म में पिछली फिल्म से बेहतर अभिनय पेश करने की कोशिश करता रहता है। इस बात को पापाजी (पृथ्वीराज कपूर) ने बड़े सुंदर शब्दों में कहा था। तुम में छुपे विधार्थी को सदा जिंदा रखना कभी मरने न देना। राजेन्द्र कुमार ने बड़े पते की बात बताते हुए कहा।

आपने लगभग सभी हीरोइनों के साथ काम किया है क्या आप बतायेंगे कि उनमें आपको अभिनय के हिसाब से सबसे अधिक कौन सी अभिनेत्री श्रेष्ठ नज़र आती थी? मैंने पूछा।

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मीना कुमारी इस हिसाब से सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री थी। उनके साथ काम करने में न केवल आनंद आता था बल्कि उनके साथ काम करने से बहुत कुछ सीखने का अवसर मिलता था। राजेन्द्र कुमार ने अपना विचार प्रकट करते हुए कहा।

मीना कुमारी और अन्य अभिनेत्रियों के साथ आपने काफी भूमिकायें अदा की है। उस मुकाबले में ‘दो जासूस’ की भूमिका निभाते वक्त आपको कैसा प्रतीत हुआ? मैंने पूछा।

हीरोइनों के साथ भूमिकायें निभाना बड़ा मुश्किल काम है। ऐसी भूमिकायें अभिनीत करने से पूर्व पात्र को अच्छी तरह समझना और उसे मन में बसाना पड़ता है। भूमिकायें मुश्किल नही होती है, ‘दो जासूस’ में काम करते समय बड़ा आनंद आया राजेन्द्र कुमार ने उत्तर देते हुए कहा।

आज फिल्मों में आपकी तरह कई कलाकार ऐसे है जो अच्छा अभिनय करने के बाद भी बहुत कम पर्दे पर नज़र आते है। उसका उत्तरदायी कौन है?  कलाकार या निर्माता या जनता ? मैंने पूछा।

मैं समझता हूं, इसके लिए जिम्मेदार कलाकार है। ऐसे कलाकार कला के प्रति आत्म समर्पित होते है। और वह कम से कम फिल्में करते है। इसलिए उनकी फिल्में कम नज़र आती है जैसे दिलीप साहब साल में एक दो ही फिल्म बड़ी मुश्किल से करते है। हमारे वक्त में फिल्में कम बना करती थी परंतु आज साल में पांच सौ फिल्म बनती है। आज के कलाकार पचास-साठ फिल्मों में काम करना उचित समझते है। लेकिन हम आज भी दो तीन फिल्मों से अधिक में काम करना उचित नहीं समझते इतनी अधिक फिल्मों में काम करना कला तथा स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। राजेन्द्र कुमार ने कहा।


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Mayapuri

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