राजकपूर और रुसी मेहमान-नवाज़

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मायापुरी अंक, 57, 1975

निर्माता, निर्देशक एवं अभिनेता राजकपूर जितने हिंदुस्तान में पसंद किये जाते हैं शायद उससे भी ज्यादा रूस में इऩ्हें पसंद किया जाता है इनकी प्रसिद्धी का इस बात से पता चल जाता है कि आज से कई वर्षों पहले फिल्म ‘अवारा’ का प्रदर्शन रूस में किया गया था जिसका एक गाना ‘अवारा हूं’ आज भी घर-घऱ में पसंद किया जाता है एक दफा की बात है कि राजकपूर सर्दियों के मौसम मे रूस गये हुए थे जहां पर एक व्यक्तिगत मेहमान के निमंत्रण पर वह चाय इत्यादि पीने की उपरांत अपने दोस्त के साथ कार से वापस होटल जा रहे थे सर्दी का मौसम था चारों और बर्फ पड़ रही थी कि अचानक मोटर ने काम करना बंद कर दिया। बड़ी कोशिश की गई कि किसी प्रकार से मोटर स्टार्ट हो जाए लेकिन सब बेकार गई ठंड के कारण कम्पकपी लगने लगी थी अचानक राजकपूर ने देखा कि एक कार दूर से बत्तियां जलाकर आ रही है उसको नज़दीक पहुंचने पर रूकने का सकेंत दिया और वह रूक गई बहुत कोशिश की राजकपूर ने तरह-तरह के प्रतीकों से उन्हें समझाने की कोशिश की क्योंकि वह रूसी भाषा ही जानते थे जबकि राजकपूर हिंदी या अंग्रेजी जानते थे लेकिन लाख प्रयत्न करने के बावजूद वह समझ नहीं सके कि हम उन्हें क्या कह रहे है और क्या चाहते है तभी उऩ में से एक ने पुकारा ‘राजकपूर’ और इन्हें पकड़कर उऩ्होंने अपनी कार में घसीट लिया वह दूसरी दिशा की ओर जा रहे थे जिधर हमें नही जाना था। राजकपूर ने बड़ी कोशिश की ये बताने की कि हम क्या चाहते हैं? और हम उस तरह नही जा रहे है लेकिन उन्होंने इनकी एक न सुनी तब कार का मालिक इन्हें अपने घर ले गया और पूरी मेहमान नवाज़ी की और बड़ी श्रृद्धा के साथ आवभगत की रात काफी बीत चुकी थी और मास्को नगर में हम होटल से दूर थे। काफी देर के बाद राजकपूर और दोस्त अपने होटल पहुंचे आज जब भी इस रूसी मेहमान नवाज़ी का राजकपूर को ध्यान आता है तो स्मृति के पुराने बंधनों में खो जातें है।


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Mayapuri

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