राखी गुलजार

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हमेशा जिंदगी से लड़ते बीती राखी की ज़िन्दगी

15 अगस्त 1947 ये सिर्फ भारत की आज़ादी का ही दिन नहीं था बल्कि ये भारत की एक ऐसी अदाकारा के जन्म का भी दिन था। जिसके लिए उसका जीवन तो उतना आसान न था पर उसके लिए उसकी हर एक फ़िल्मी भूमिका निभाना मानो बाए हाँथ का खेल था। वो अदाकारा थी राखी गुलज़ार राखी का जन्म बंगाल के एक शहर रानाघाट में हुआ और राखी के परिवार में कोई फिल्मी माहौल नहीं था व उन्होंने शायद कभी सोचा भी नहीं होगा की वो हीरोइन बनेगी। राखी के दो भाई उस दौर में नक्सलवादी हो गए व मां का कोई सहारा न रहा। राखी ने अपनी शुरुआती पढ़ाई एक लोकल स्कूल से की व आगे पढ़ने के लिए  वह कोलकाता मौसी के घर आ गई, परन्तु वहां कुछ बात न बनी और मौसी से लड़ाई के चलते वह संध्या राय के यहाँ चली आई जोकि एक फिल्म डायरेक्टर थीं और जिनसे राखी और राखी की माँ की मुलाकात एक बंगाली फिल्म की शूटिंग के दौरान हुई थी जहाँ वो राखी के काफी करीब आ गई थी इतना करीब की राखी की पढ़ाई और तमाम खर्चे संध्या राय ने  ही उठाए इसी तरह से राखी को एक गॉडमदर जैसी मिल गई।

ये सब तो कुछ भी नहीं था राखी के जीवन में संघर्ष कभी खत्म नहीं हुआ महज़ 15 साल की उम्र में राखी का विवाह अजय विश्वास के साथ हो गया जोकि मुम्बई के फिल्मालय में काम करते थे। राखी को उनके दोस्तों का साथ अपने पति के साथ कभी अच्छा नहीं लगा जोकि अजय विश्वास ये बात न ग्वार गुजरी और उसने राखी को घर से निकाल दिया। एक दिन उन्हें राजश्री प्रोडक्शन के तले बन रही फिल्म “जीवन मृत्यु” में एक छोटा सा रोल मिला जिसे उन्होंने तुरंत स्वीकार कर लिया उन्होंने अपनी पहली फिल्म में ही विधवा का रोल किया जो किसी भी एक्ट्रेस के लिए अपने करियर का अपने हाथों से गला घोटना ही होता पर राखी ने इसकी परवाह न करते हुए ऐसे कई और चैलेंजिंग रोल किये जैसे उनकी दूसरी फिल्म जोकि सुनीलदत्त की फिल्म “रेशमा और शेरा” थी जिसमें राखी को छोटी भूमिका मिली। एक राजस्थानी युवती के रोल में उसकी शादी होती है और परिवार के संघर्ष में उसका पति मारा जाता है। इस तरह शुरुआत की दोनों फिल्मों में उसे विधवा बनना पड़ा। राखी किसी भी रोल को चोट या बड़ा नहीं समझा वह हमेशा यह देखा कि रोल कितना पॉवरफुल है और दर्शक पर उसका कितना प्रभाव होगा।

संयोग से इस फिल्म के रिलीज़ होते ही राखी की शादी गुलज़ार साहब से हो गई जिन्होंने राखी को फिल्मो में काम करने से मन कर दिया। बड़े आश्चर्य की बात है गुलज़ार साहब कभी राखी के टैलेंट को नहीं समझ पाए तभी तो राखी ने अपने दौर के तमाम दिग्गज डायरेक्टर्स के साथ काम किया। रमेश बहल, रमेश तलवार, यश चोपड़ा, ऋषिकेश मुखर्जी, लेकिन गुलजार ने कभी राखी को अपनी फिल्म की हीरोइन नहीं बनाया। व गुलजार साहब व राखी का ये रिश्ता तीन साल तक चला फिर दोनों अलग हो गए। अलग होने का दर्द तो दोनों के मन में होगा पर दोनों ने अपना अकेलापन अपने अपने काम से भर गया।

राखी के करियर की सबसे बड़ी विशेषता है कि वह फिल्मों या रोल के पीछे दूसरी तारिकाओं की तरह कभी नहीं दौड़ी। उन्होंने हमेशा ऐसे रोल किए, जिससे उनकी सही इमेज दर्शकों के दिल-दिमाग में हमेशा दर्ज रह सके इसलिए शायद उनकी कई फिल्म ऐसे ही रोल्स पर आधारित है जैसे “दूसरा आदमी”,”परमा” आदि फिर लंबे इंतज़ार के बाद उनकी पहली सुपरहिट फिल्म “आई शर्मीली” रही उसके बाद राखी ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा और 27 डाउन, बरसात की एक रात, बसेरा, बाजीगर, बेमिसाल, दाग, दूसरा आदमी, हमारे तुम्हारे, जीवन मृत्यु, जुर्माना, कभी कभी, काला पत्थर, करण अर्जुन, कस्मे वादे, मुकद्दर का सिकंदर, पारोमा, राम लखन, रेशमा और शेरा, रुदाली, शक्ति, शर्मीली, सोल्जर, तपस्या, त्रिशूल जैसी फिल्मों में अपने अभिनय के जौहर दर्ज किया। राखी ने लगभग हर स्टार के साथ फिल्म बनाई जिसमें राखी ने अमिताभ बच्चन के साथ 11 फिल्में की हैं। फिल्म “कस्मे वादे” में वह अमिताभ की प्रेमिका हैं तो फिल्म “शक्ति” में मां की भूमिका में हाजिर हैं। रूदाली फिल्म में वह डिम्पल की भी मां बनी हैं। राखी ने हीरो के मां के रोल में कई यादगार भूमिकाएं निभाई हैं जिनमें बाजीगर, करण अर्जुन, सोल्जर के नाम लिए जा सकते हैं। उस दौर में वह सबसे अधिक पारिश्रमिक लेने वाली मां थीं। राखी के जीवन की यादगार फिल्म है यश चोपड़ा की “कभी कभी”। इस फिल्म के रोल को वह उतना ही महत्व देती हैं, जितना मीना कुमारी के करियर में फिल्म “पाकीजा” अथवा वैजयंतीमाला के जीवन में फिल्म मधुमति का है। इस फिल्म से राखी की एक अलग इमेज बनती है। इन्हें नेशनल अवार्ड और पद्म श्री अवार्ड के अलावा कई अवार्डों से नवाज़ जा चुका है। बेटी की शादी के बाद इन्होंने अपने आप को अपने अकेलेपन और सुकून के हवाले कर दिया।


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Mayapuri

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