ये है मेरी पसंद के कलाकार

1 min


kanchan

 

मायापुरी अंक 11.1974

शादी से पूर्व, राखी ने तय किया था कि वह अब फिल्मों में अभिनय नही करेगी। यह निर्णय उनके चहेते दर्शकों को पसंद नही आया।

पिछले दिनों राखी पुन: शूटिंग पर लौटी तो दर्शक ही नही, कई निर्माता-निर्देशकों ने उनके इस निर्णय की सराहना की।

हमारी मुलाकात यों अचानक ही हो गयी तो हमने मतलब की बात कही. शायद उसे फुर्सत थी। कहने लगी, ‘पूछिये, क्या पूछना चाहते है ?’

‘मैं आपकी पसंद जानना चाहता हूं….फिल्म लाइन में आपको कौन-कौन शख्स ज्यादा अच्छे लगे ?’

‘वैसे मेरी पसंद की लिस्ट तो बहुत लंबी हो जायेगी, लेकिन मैं आपको सिर्फ तीन के बारे में बताना चाहूंगी….

‘ठीक है, पहले कलाकार का नाम बताइए ?’

‘मेरी पसंद का पहला कलाकार है दत्तों बाबू..

मैं चौंका, दत्तो बाबू ! ये भला दत्तो बाबू कौन हुए ?’

मुस्कुराते हुए राखी ने बताया, ‘बंगाली में हर शब्द रसगुल्ले की तरह गोल हो जाता है। आप दत्तो बाबू को पंजाबी परांठे की तरह चपटा कर दीजिए। फिर देखिए आपको खुद बखुद नाम मालूम हो जायेगा।

मैंने बंगाली रसगुल्ले ‘दत्तो बाबू’ का पंजाबी परांठे की तरह चपटा करने की दो तीन बार कोशिश की तो मेरे मुंह से अचानक निकल गया, दत्तो बाबू….यानी कि दत्त….ओह आपका मतलब सुनीलदत्त से है ?

‘जी हां !

‘सुनीलदत्त से आपकी मुलाकात कैसे हुई ?’

‘बात बहुत पुरानी है। जाने कहां से उन्होंने मेरा फोटो देख लिया था। उन दिनों वे ‘रेशमा और शेरा’ के निर्माण का प्लान कर रहे थे। उनका सदेंश मुझ तक पहुंचा कि वे मिलना चाहते है। अच्छा, फिर ?’

‘जब मैं उनसे एंव श्रीमती नरगिस दत्त से मिली तो इतनी खुश हुई कि बस पूछिए मत।

क्यों न पूछे ? आपकी खुशी की वजह जरूर रोचक होगी ?’

‘जी हां, दत्तो बाबू की घर ग्रहस्थी बड़ी ही प्यारी है। और खुशहाल भी दत्तो साहब, श्रीमती दत्तो और बच्चे सबके सब इतने अच्छे है कि बस, कुछ कहा भी नही जा सकता। उनमें आपसी समझ है। प्यार है देखने सुनने वालों को भी खुशी होती है ना ?

‘आपका कहना ठीक है लेकिन आप खास बात तो टाल ही गयी ?

’ओ हो, मैं उनसे मिलकर लौटी तो मैं उनकी तीन फिल्मों के लिए अनुबंधित थी।

‘यानी रेशमा और शेरा’ के अलावा दो और फिल्में ?

‘जी हां, वैसे दत्तो बाबू मुझे रेशमा और शेरा’ में रोल देने में संकोच कर रहे थे। ‘भला क्यो ?

‘क्योंकि उन दिनों मैं यानी राखी चार-पांच बड़ी फिल्मों में अभिनय कर रही थी और रेशमा और शेरा का रोल बहुत छोटा था, इसीलिए वे हिचकिचा रहे थे कि राखी को लिया जाये या नही

‘यानी कि कही आपने इंकार कर दिया तो ?

‘जी हां, और मजे की बात देखिये, रोल की बात सुनकर मैं भी खामोश सी हो गयी कि इतना अच्छा और पेचीदा रोल मैं ठीक-ठीक कर भी पांऊगी या नही।

‘लेकिन अब तो आपने साबित कर दिया है कि आप एक कुशल अभिनेत्री है।

‘अजी कहां यह तो बस, चाहने वालों की दुआ क असर है।

‘अच्छा अब मैं आपको एक दिन की बात सुनाती हूं ‘सुनाइये..’

‘एक दिन दत्तो बाबू बड़े खुश-खुश आये, बोले, चलो राखी, रेगिस्तान चलते है. उनका जोश आप देखते, लगता था जैसे स्वीटजरलैंड चलने की बात कर रहे है।

‘लेकिन रेगिस्तान के लिए इतना जोश ! क्या वजह थी ?

‘बस यही तो खासियत है उनकी, जो मुझे बहुत पसंद है। कश्मीर से तो सभी खूबसूरती कैद कर लाते है, कोई रेगिस्तान से खूबसूरती ढूंढ निकाले, तब मजा है।

‘आप बिल्कुल सही कह रही है। रेशमा और शेरा में सुनीलदत्त ने सचमुच रेगिस्तान की खूबसूरती बहुत खूब फिल्मायी है। पर क्या ये ढूंढ निकालने वाली नजर, उनमें बतौर डायरेक्टर भी है

‘आप भी क्या बात करते है ? जिस शख्स ने राखी को ढूंढ निकाला, उसकी तारीफ तो करनी ही पड़ेगी न ! हकीकत तो यह है कि दत्तो बाबू ने राखी के अंदरूनी कलाकार की तलाश की और मुझसे ही मिला दिया कि यह है राखी ! आज मुझमे जो इतनी हिम्मत नजर आती है, उन्ही की दी हुई है। ‘रेशमा और शेरा’ के उस छोटे से रोल ने मुझमें बहुत आत्म-विश्वास जगाया है, पैदा किया है।

‘रेखा जी ! दत्तो बाबू किस अंदाज से, किस ढंग से निर्देश देते है, इस बारे में कुछ बताएंगी ?

‘पूरा एक दृश्य बताना पड़ेगा खैर सुनिये..सीन यों है. ‘रेशमा और शेरा की राखी बहुत-बहुत रोती है। तड़प-तड़प कर दीवार से फिर पटकती है. चूड़ियां तोड़ती है।

‘सचुमच यह तो बहुत ही ह्रदय विदारक दृश्य था.

आप सुनिये तो, पूरा दृश्य फिल्मा लिया गया। रिकार्डिंग रूम में डबिंग हो रही थी. साइलेंट सीन देख-देख कर मुझे रोना था। ताकि ठीक से रोना-धोना नजर आए। नेचुरल्टी आये. अब भला यों बैठे-बिठाये कैसे रोया जाये. दत्तो बाबू बोले, बहुत जोर से रोना है राखी। मैंने कहा, ‘मगर अब बेबात पर कैसे रोया जायेगा। उस दिन अचानक ही मेरी कोहनी छिल गयी थी। दत्तो बाबू को तुरंत एक उपाय सूझा। तुरंत डबिंग स्टार्ट करने के पहले उन्होंने चुल्लू भर यूं डी कोलोन’ मेरी छिली हुई कोहनी पर डाल दिया, जो टिंचर आयडीन की तरह जलने लगा, बोले अब तो रो सकोगी..और सचमुच मैं बहुत जोर-जोर से रोने लगी रोना इतना नेचरल था कि एक बारगी सबके सब भौचक्के रह गये…

‘वाह क्या स्टाइल है रूलाने का ?

‘अजी शुक्र है खुदा का कि खुदखुशी का सीन नही था, वरना दत्तो बाबू तो रियलटी कर देते कि चढ़ जाओ बेटा सूली पर यानि लटक जाओ…

‘अच्छा तो क्य दत्तो बाबू ऐसा भी कर सकते है?

‘नही-नही, वे तो बहुत ही हंसमुख इंसान है, अरे हां, हंसमुख शब्द पर मुझे एक बात याद आ गयी। ‘वह भी कह डालिए.

‘जी, मुझे शशि कपूर कहते है, मैं एक्टिंग करता हूं। क्या मतलब ?

‘मेरा मतलब शशि कपूर से है। जब भी मिलेंग अपना नाम और काम जरूर बताएंगे। अच्छा-अच्छा।

शुरू-शुरू में मुझे नही मालूम था कि यह उनका स्टाइल है। सैट पर अचानक ही एक दिन आगये, बोले, जी मुझे शशिकपूर कहते है। मैंने दोबारा-तीबारा हाथ जोड़ दिये। शॉट लिया जाने लगा तो ठीक कैमरे के पीछे खड़े हो गये, और लगे मुझे घूरने। मैं मना रही थी कि यह मुसीबत टले, तो कुछ करूं। मगर ये महाशय घरते रहें और आखिरकार शॉट का सत्यानाश करके ही वहां से टले।

‘इसका मतलब वे बड़े मजेदार इंसान है।

‘जी हां, और वक्त के पाबंद भी। उनकी पंकचुअलिटी ने मेरे नाक में दम कर दिया था उन दिनों हम साथ-साथ काम कर रहे थे एक दिन पांच मिनट लेट हो गयी, तो जनाब कमर पर हाथ रखे विलेन की तरह दरवाजे पर खड़े मिले। अपनी कलाई आगे बढ़ाकर बोले, जरा घड़ी देखिये मेम साहब ये वक्त है आपके आने का ? और मैं…अब क्या करूं। जाने दीजिए, लेकिन उनकी एक और बात मुझे बेहद अच्छी लगी। ‘कौन-सी !

‘वह यह कि कोई शॉट अगर मैं ठीक से न कर पाऊं तो बड़ी अदा बोलेंगे, आ गयी झट पाकिस्तान से गठरी बांध के कि मम्मी मैं तो हीरइन बनूंगी। लो अब बनो हीरोइन। मजा तो तब आता था जब जनाब खुद किसी शॉट में अटक जाते थे।

‘अच्छा तब वे क्या करते थे ?

‘उसी अंदाज में अपने लिये भी कहते ‘बड़े चले थे बाप से कह कर, डैडी-डैडी, हम भी हीरो बनेगे, लो अब बनो हीरो शशि जैसा शरारती और कोआपरेटिव नेचर का दूसरा हीरो ढूंढे नही मिलेगा।

‘बहुत खूब, बहुत खूब…

‘अच्छा अब मुझे जाने दीजिए. आपका काम तो हो गया। ओ. के…इसके पूर्व कि मैं कुछ और कहूं राखी जा चुकी थी।


Like it? Share with your friends!

Mayapuri

अपने दोस्तों के साथ शेयर कीजिये