गरीबों पर रहम करो – रंधीर कपूर

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मायापुरी अंक 49,1975

मैं ‘भंवर’ के सैट पर अंशू से बातें कर रहा था कि डब्बू आता दिखाई दिया। अंशू ने उन्हें देखते ही मुझे अहिस्ता से कहा, देखना यह मुझे देखते ही आंख मारेगा!

वही हुआ जैसे ही डब्बू ने अंशू को देखा कि आंख मारी हम हंस पड़े। अंशू ने हिम्मत कर आंख का जवाब आंख से दिया। डब्बू घबराने की एक्टिंग करते हुए ऐसे घूमा जैसे बेहोश हो जायेगा। डब्बू में कुछ ऐसी बातें हैं जिससे सभी उससे बड़े खुश रहते हैं और वह सर्वप्रिय हैं। दूसरे कोने में अशोक कुमार बैठे हुए थे, वहां जाकर नीचे उनके पांव को हाथ लगाने की एक्टिंग करते हुए कहने लगे, दादा मुनि! रहम करो! हम गरीबों पर रहम करो। अगर सभी पिक्चरें आप करेंगे तो बाकी लोग रोटी कहां से खायेंगे? दो ही तो आदमी हैं जो पिक्चर पे पिक्चर साइन करे चले जा रहे हैं। एक आप और दूसरे शशि कपूर।

क्यों भाई! शशि कपूर के पास कितनी पिक्चरें हैं? दादा मुनि हंसते हुए बोले।

कल तक 91 थी। अभी तक आठ दस बढ़ गई हों तो कुछ कह नहीं सकता।

सभी लोग हंस पड़े डब्बू को शॉट के लिए बुलाया गया। फाइट सीन चल रहा था। उसको रस्सी पकड़ कर नीचे कूदना था। कैमरामैन, जाल मिस्त्री लाइटिंग कर रहे थे। डब्बू बच्चों की तरह उछल कूद मचाता हुआ जल्दी करो जल्दी करो का शोर मचाने लगा। लेकिन जब देखा कि जाल मिस्त्री ऐसे ही लगे रहेंगे तो झट से बोले, अरे आप क्यों लाइट वाइट के चक्कर में पड़े रहते हैं? मिली तीस शिफ्ट में बनी है। उनमें क्या फोटोग्राफी की होगी। लेकिन पिक्चर हिट है।

जाल मिस्त्री बेचारे क्या जवाब देते? लेकिन मैं सोचने लगा डब्बू ने हंसी में भी बात कितने पते की कही है। हमारे यहां पिक्चर किस्मत से चलती है न कि मेहनत से!

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Mayapuri