रंजीता

1 min


रंजीता के जन्मदिन पर उनको बहुत बहुत शुभकामनाए

47 फिल्मो में अपने अभिनय के जोहर दिखा चुकी व 1976 की सुपरहिट “लैला मजनू” फिल्म की 60 साल की हो चुकी हीरोइन रंजीता कौर का जन्म आज के ही दिन यानि 22 सितम्बर 1956 को पंजाब में हुआ ।इनकी शादी राज मसन्द से हुई व इनका एक बेटा भी है जिसका नाम स्काई है ।रंजीता ने अब बॉलीवुड से पूरी तरह सन्यास ले लिया है और अपने परिवार के साथ नोरफ़ॉल्क , वर्जिनिया, यूएस में रहती हैं।

रंजीता ने अपने फ़िल्मी करियर की शुरुआत “फिल्म और टेलीविजन इंस्टीट्यूट” से पास आउट होकर सीधे अपनी पहली फिल्म ऋषि कपूर के साथ की “लैला मजनू” जो खुद भी अपनी पहली ही फिल्म बॉबी से स्टार हो गए थे।रंजीता की खुशकिस्मती से “लैला मजनूँ” के संगीत ने धूम मचा दी। दो धाकड़ संगीतकार मदनमोहन और जयदेव ने मिलकर जो धुनें दीं और साहिर ने जो इन धुनों को जादू बख्शा, उसने फिल्म को सफल बनाया। साथ ही इस फिल्म ने हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री को एक और हीरोइन दी, जिसने आगे चलकर राजश्री की “अँखियों के झरोखों से” और फिर मिथुन चक्रवर्ती के साथ “तराना” जैसी फिल्में की। कहा जाता है की रंजीता ने या तो ज्यादातर कम बजट की फिल्में की या फिर “राजपूत” जैसी मल्टीस्टारर फिल्में। उनकी अधिकांश फिल्मों का संगीत पक्ष बहुत मजबूत होता था, इसका उन्हें भी फायदा मिला लेकिन इनके करियर के खत्म होने की असली वजह थी, अस्सी के दशक में कुछ मिथुन चक्रवर्ती के साथ कथित संबंधों के चलते, कुछ अपनी तुनकमिजाजी के किस्सों के कारण और कुछ हद तक नए दौर के अनुसार अंग प्रदर्शन करने से इंकार के कारण उनका करियर पिछड़ने लगा।

रंजीता ने “लैला मजनूँ” की सफलता के आधार पर उन्हें बीआर चोपड़ा की संजीव कुमार और विद्या सिन्हा अभिनीत कुछ अलग टेस्ट की फिल्म “पति, पत्नी और वो” में काम मिला। यह एक हल्की-फुल्की कॉमेडी फिल्म थी, जिसमें रंजीता ने पत्नी की बीमारी के किस्से गढ़ने वाले बॉस से हमदर्दी रखने वाली ऐसी युवती का रोल किया, जो अनजाने में पति-पत्नी के बीच तनाव की वजह बन जाती है।इसके बाद रंजीता ने सचिन के साथ राजश्री प्रोडक्शन की “अँखियों के झरोखों से” की, जो जबरदस्त हिट रही। एक अँगरेजी उपन्यास पर आधारित इस सीधी-सरल प्रेमकथा में रंजीता ने कैंसर से ग्रस्त युवती का रोल कर अपनी सादगी व अंडरस्टेटमेंट से दर्शकों को प्रभावित किया। फिर मिथुन चक्रवर्ती के साथ राजश्री प्रोडक्शन की ही “तराना” में उन्होंने प्रशंसा पाई।

उस दौर में हर हीरोइन का सपना होता था अमिताभ बच्चन के साथ काम करना। रंजीता के लिए यह सपना पूरा हुआ “सत्ते पे सत्ता” के साथ। इसमें कलाकारों की भीड़ में उनका एक छोटी मगर अहम्‌ रोल था, वह भी “दूसरे” अमिताभ बच्चन (अमिताभ का इसमें डबल रोल था) के अपोजिट। विजय आनंद निर्देशित मल्टीस्टारर “राजपूत” में वे विनोद खन्ना के अपोजिट हीरोइन बनीं। अमोल पालेकर के साथ उन्होंने “दामाद” और “मेरी बीवी की शादी” जैसी कॉमेडी फिल्में कीं, तो दीपक पाराशर व राज बब्बर के साथ “आप तो ऐसे न थे” जैसे प्रेम त्रिकोण में काम किया। रंजीता के खाते में कोई मेगा हिट फिल्म नहीं हो, लेकिन छोटी-छोटी मासूम-सी फिल्मों में अभिनय कर रंजीता ने हिन्दी फिल्मों की परियों में अपना नाम दर्ज करा लिया है। इस दौरान उन्होंने सचिन से लेकर अमिताभ बच्चन तक और मिथुन चक्रवर्ती से लेकर विनोद खन्ना तक अपने दौर के सभी बड़े सितारों के साथ काम किया।

रंजीता का एक गलत फैसला उनके करीर को हमेशा के लिए अँधेरे की और ले गया जैसे  “तेरी कसम” में युवा दिलों की धड़कन कुमार गौरव की दीदी का रोल करके उन्होंने एक तरह से हीरोइन के रूप में अपने करियर को अलविदा कह दिया। बाद में वे एक-दो टीवी सीरियलों में भी दिखाई दीं, लेकिन जल्दी ही उन्होंने उससे किनारा कर लिया।

रंजीता ने  कई फिल्मे की चोट ही सही पैर प्रभावशाली रोल किये जिनमे से कुछ के लिए उन्हें पुरस्कार भी दिए गए  जैसे  “अँखियों के झरोखों से” के लिए बेस्ट एक्ट्रेस, “पति, पत्नी और वो” तथा 1982 की फिल्म “तेरी कसम” के लिए बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस के तौर पर फिल्म फेयर पुरस्कारों के लिए नामांकित हुई थीं, लेकिन उन्हें एक बार भी पुरस्कार नहीं मिल पाया।

SHARE

Mayapuri