चुप रहिए दीवारों के भी कान होते है – जीवन

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044-32 Jeevan

 

मायापुरी अंक 44,1975

फिल्म कलाकारों के बेवजा नखरों से और नादिर शाही मूड के शिकार होकर, न जाने कितनी परेशानियों को गले लगा कर, फिल्मी पत्रकार पाठकों की रूचि बने रहते हैं और इन तकलीफों को खामोशी से सहन करना पत्रकारों की आदत-सी बन जाती है। हमारे पाठक गण इस स्थिति से अपरिचित होंगे। मगर हमारे कहने का आशय यह नही कि कलाकार सिर्फ कठिनाईयों से ही पहुंचाते हैं। कई बार कुछ ऐसे कलाकारों से भेंट हो जाती जिनका व्यवहार याद रखने के लायक होता है। फिर भी अधिकतर कलाकार इस बदतमीजी से पेश आते हैं कि पत्रकारिता से तौबा करने को जी चाहता है।

ऐसा ही कुछ अनुभव हमारे मित्र पत्रकार एम.ए. रंगीला को हुआ। बात यों शुरू हुई कि उन्हें चरित्र अभिनेता जीवन का इंटरव्यू करना था। उन्होंने एक शाम फोन किया, तो मालूम हुआ उनकी तबियत खराब है। फिर एक प्रात: फोन मिलाया तो जवाब मिला कि आजकल बहुत व्यस्त और दो-दो शिफ्टो में शूटिंग कर रहे हैं।

रंगीला परेशानी की हालात में चार-पांच दिन बाद पुन: फोन करते हैं तो इस बार जवाब मिलता है कि अभी कुछ दिन ओर प्रतीक्षा कीजिये। चंद दिन और बीते। दोबारा कोशिश की गयी, घर पर मौजूद नहीं थे। अगले दिन स्वंय घर पहुंचे तो किरण कुमार मिले। दुर्भाग्य से फिर मुलाकात नही हो पायी। अगले दिन फिर फोन किया जवाब मिला घण्टे भर बाद यही आ जाइए। 12 बजे पहुंचे तो सो रहे थे मायूसी की हालात में लौट आए। फिर दो बजे फोन किया तो पता चला कि बाथरूम में हैं।

आखिरकार एक दिन रंगीला साहब से मेरी भेंट हुई तो उन्होंने पूरा किस्सा कहकर सुनाया। मैंने कहा,

मैं किरण कुमार से इंटरव्यू करने जा रहा हूं अगर आप उचित समझे तो साथ चलिए, हम उनका भी इंटरव्यू कर लेगें।

वह मेरी बात से सहमत हो गये और एक प्रात हम किरण कुमार के यहां पहुंचे। संयोग से उस दिन किरण कुमार मिले नही और जीवन साहब मिले और उस दिन वे फ्री भी थे। रंगीला ने अपनी शिकायत को अपने खास अंदाज में मुस्कुराते हुए कहा,

आप पत्रकार लोग तो हमारी व्यस्तता से अच्छी तरह वाकिफ हैं।

जी, हां और इसलिए हम लोग आप लोगों की ज्यादतियां बर्दाश्त करते हैं। हमने कहा।

चलिए अब इंटरव्यू हो जाए।

नारायण, नारायण, कीजिए शुरूआत जीवन पुन अपने खास अंदाज में बोले,

मैंने पहला सवाल पूछा,

यह नारदवाली भूमिका क्या आप अब भी करना पसंद करेंगे?

नारायण नारायण कहते हुए जीवन ने जवाब दिया,

आप पसंद की बात करते है मैं इस वक्त भी दो-एक फिल्मों में नारद की भूमिका कर रहा हूं यदि और फिल्में मिलें तो वे भी स्वीकार कर लूंगा मुझें यह भूमिका बहुत पसंद है। और इसीलिए मैं खुशी से यह रोल ले लेता हूं।

एक बात बनाइए, जीवन साहब, मैंने अगला प्रश्न पूछा, आज पुरानी पीढ़ी के लगभग सभी कलाकार पुन: बुलंदी को छू रहे हैं, मगर आप अभी तक अपनी पुरानी साख वापस जमाने में लगभग नाकामयाब रहे हैं इसकी क्या वजह हो सकती है?

आप उन कलाकारों की बात कर रहे हैं जो बीच में कुछ वर्ष के लिए गायब हो गये थे। और अब पुन: स्थापित हुए हैं, लेकिन आप यहां भूल कर रहे हैं। क्योंकि मैं शुरू से जैसा कलाकार रहा हूं। आज तक वही ढर्रा चल रहा है। जितनी फिल्मों में पहले काम करता था, अब भी कर रहा हूं। और फिर उम्र के बहाव के साथ-साथ सब कुछ बदल रहा है। शायद मेरी ढलती उम्र की वजह से आप यह सवाल कर बैठे। वैसे कोई खास बात नही है। आप अगला प्रश्न पूछिये ?

आप नयी पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी के कलाकारों में क्या फर्क अनुभव करते हैं?

सही मायने में किसी भी चीज की तुलना नही करनी चाहिए फिर भी मैं आपको बताये देता हूं, जो मैंने महसूस किया है। हमारे जमाने में हम एक ही कम्पनी के नौकर यानि कलाकार होते थे, जबकि आज का कलाकार पूरी तरह आजाद होता है। उस जमाने में हमारे साथी अपनी बात पर अडिग रहते थे। वे चिकनी-चुपड़ी बातें नही करते थे। डुप्लीकेट आचरण से भी कोसों दूर रहते थे। जबकि आज जो चाहे मर्जी होती है कहते सुनते हैं आज जो लम्बे बालों और लम्बी कलमों के साथ-साथ बैल-बॉटम का फैशन चल निकला है, हमारे ज़माने में भी बिल मोरिया और राजा सेंडो भी लम्बे बाल, कलमें और ढीले ढाले लखनवी गारदे टाइप कपड़े आदि पहनते थे। हमारे वक्त में गुल हमीद, चंद्र मोहन जागीरदार, मजहर खां और पृथ्वी राज कपूर अभिनय की जिन बलुंदियों को छू कर दर्शकों के दिल में जो स्थान बनाया था, वह आज का कोई भी कलाकार अभी तक तो नही बना पाया है। आगे की प्रभु इच्छा।

कुछ पल रूक कर आगे जीवन बोलें,

इन कलाकारो के अलावा हम आज तक मोती लाल, अशोक कुमार शांत आप्टे, ललिता पवार, दुर्गा खोटे, रमोला और जमुना का प्रभावशाली अभिनय न तो आज तक

भूल पाये हैं और न ही इन जैसे कलाकारों का जन्म ही हो पाया है। हमारी नयी पीढ़ी अभी अभिनय का मतलब नही समझ पा रही है। उन्हें सिर्फ नाम और दाम से काम है। और शायद यही वजह है कि यह पीढ़ी बहुत पिछड़ गयी है।

कहानी को दृष्टि से हमारी फिल्मों का विकास कहां तक हुआ है?

वैसे हमारे वक्त में अभिनय के साथ-साथ कहानियों पर अधिक ज़ोर दिया था, मगर अब वक्त के बहाव के साथ सब कुछ बदलता गया। हम अलग-अलग खूबसूरत स्थानों पर शूटिंग करने लगे हैं। पहले कहानी को सीधे-सपाट रूप में पेश किया जाता था, मगर अब हमारी कहानी लखनऊ की भूलभूलैया के सामान हो गयी है। हां कुछ तरक्की भी इस दौर में हुई है। भी हो सकती है, बशर्ते हम लोग परिश्रम की ओर ध्यान दें

इस दौर में दो कलाकार सर्वाधिक लोकप्रिय हैं, राजेश खन्ना और संजीव कुमार आप इनके अभिनय से कहां तक प्रभावित हैं? मैंने प्रश्नों के क्रम में एक और सवाल किया।

जीवन ने गहरी सांस लेते हुए उत्तर दिया,

सिर्फ राजेश और संजीव ही नही इस दौर के और भी कई कलाकार अच्छा अभिनय करने लगे हैं और अगर उनमें यही लगन और उत्साह बना रहा तो दर्शक इन्हें भी मोती लाल और चंद्रमोहन जैसे नामी कलाकारों की श्रेणी में रहने में कोई शर्म महसूस नही करेंगे।

आप फिल्मों में कितने वर्षो से हैं?

लगभग चालीस वर्ष पूरे हो चुके हैं।

इन वर्षो में कोई मज़ेदार घटना हुई हो तो हम सुनना चाहेंगे?

कुछ पल थमकर याददाश्त पर ज़ोर देते हुए जीवन बोलें,

यह तो बहुत मुश्किल है। यकायक कोई घटना सुनाना अपने बस की बात नही। भई यह तो वही बात हुई, जैसे मैं आपसे कह दूं कि आप मुझे दो मिनट में बिरयानी और गरम गरम हलवा बनाकर दे दे। क्या यह सम्भव है?

सम्भव तो नही, लेकिन कोशिश तो की जा सकती है। मैंने रोचक घटना सुनने की गरज से कहा, लेकिन जीवन साहब बोलें,

आप मुझे इस बार छोड़िये, फिर कभी नही।

लेकिन हम भी जिद पर अड़े रहे। पुन: अपनी बात दोहराई,

सिर्फ एक वाक्य की ही तो बात है..

आखिरकार जीवन साहब ने समर्पण करते हुए कहा,

चलिए आप भी क्या याद रखेंगे। बहुत पुराना किस्सा सुना रहा हूं। लगभग 38-39 साल पुराना किस्सा है। मैं 1934 में फिल्मों में आया। दो-तीन फिल्मों में काम कर चुका था। एक फिल्म में खलनायक था। एक सीन फिल्माया जाना था। और मुझे हीरोइन से जबरदस्ती लिपटना था। चिपटना था। दबाना था यानी खलनायकी के दांव-पेंच दिखाने थे। डायरेक्टर ने मुझें निर्देश दिया कि भई इस तरह जबरदस्ती करने वाले सीन का रियल करो मैंने कहा, ठीक है, लेकिन आप हीरोइन से भी तो पूछ लीजिये। तुरंत हीरोइन अंग्रेजी में हमें कहा, I don’t mind after all this is romantic scene. यह सुनकर मैं सख्ते में आ गया, क्योंकि हीरोइन को सीन में डरना था, और जब सीन फिल्माया जाने लगा तो में काफी परेशान हो गया, क्योंकि हीरोइन ऐसे शॉट दे रही थी, मानो मेरी प्रेमिका ही हो। खैर किसी तरह सीन कम्पलीट हुआ।

किस्सा जब खत्म हुआ तो मैंने कहा,

जीवन साहब जवानी के दिनों में कभी आपने रोमांस-वोमांस..

रोमांस की बात सुनते ही हमारी बात बीच में काटते हुए जीवन साहब बोलें,

चुप रहिए, दीवारों के भी कान होते हैं।

तभी रंगीला ने मेरी ओर देखते हुए कहा,

क्यों बुढ़ांपे में इनकी कब्र खोद रहे हो?

सुनकर आगे रंगीला ने एक और प्रश्न पूछा,

लोग कहते हैं आपके बेटे किरण कुमार कहते हैं आपके बेटे किरण कुमार को एक अदाकर के तौर पर जितना नाम नही मिला, उससे ज्यादा चर्चे उसके रोमांस और दूसरी बातों के होते रहते हैं, इसके बारे में आपके क्या ख्याला है?

कुछ पल जीवन साहब चुप रहे, फिर बोलें,

यह फिल्म इंडस्ट्री है, फिल्म अदाकारों की एक मामूली-सी हरकत को भी लोग बढ़ा-चढ़ा कर पेश करने की कोशिश करते हैं। यह एक बड़ी ट्रेजडी है। वैसे हर मर्द की जिंदगी में कुछ न कुछ तो चलता ही रहता है और जो यह नयी पीढ़ी है, इनमें जवानी का जोश कुछ ज्यादा ही है। ये लोग आजाद ख्याल के मलिक हैं। इसलिए इनके बारे में कुछ ज्यादा कहना उचित नही समझता। जहां तक एक्टिंग का ताल्लुक है, लोग यह जानते हैं कि पूना इंस्टीट्यूट में सबसे बेहतरीन अदाकार माने गये थे। अब यह दुर्भाग्य है कि अभी तक उन्हें कोई भी अच्छी भूमिका नहीं मिली जिसमें वह अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर सकें।

इसी प्रश्न में रंगीला ने अगला प्रश्न जोड़ा,

किरण कुमार आज जहां तक भी पहुंचे हैं, उसमें आपका कितना हाथ है, और उसे आप कहां तक सफल देखना चाहते हैं?

जीवन बोलें,

किरन कुमार की तरक्की में मेरा उतना ही हाथ है, जितना कि एक बाप का अपने बेटे के प्रति होना चाहिए। और हर बाप यह चाहता है कि उसका बेटा तरक्की की ऊंची सी ऊंची मंजिल तक जा पहुंचे।

हमने एक और सवाल आखिर में पूछ ही लिया,

आपके और बेटे में कैसा व्यवहार है, वह अपनी मर्जी का कितना ख्याल रखता है और आप उसका कितना ध्यान रखते हैं?

हमारा रिश्ता बाप-बेटे का है और और बाप-बेटे में हमेशा बहुत ज्यादा प्यार रहता है। वह मुझें एक्टर बनने के बाद भी मुझें उतना ही सम्मान देते हैं, जितना कि उन्हें देना चाहिए वर्ना आजकल की नयी पीढ़ी अपने माता-पिता को कुछ नहीं समझती। बस मेरा बहुत ज्यादा ख्याल रखता है और मैं भी उसकी हर परेशानी, हर तकलीफ को स्वंय झेल कर उसे मुख पहुंचाने का प्रयत्न करता हूं। और भगवान से प्रार्थना करता हूं वह हमेशा खुश रहे।

और हम भगवान से प्रार्थना करते हैं कि भविष्य में आप हर पत्रकार से सदव्यवहार करें और उन्हें बहुत जल्द इंटरव्यू का समय दे। यह कह रंगीला और मैं उठ खड़े हुए। इसके पहले कि जीवन साहब कुछ कहें हम दरवाज़े की ओर बढ़ चुके थे।

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Mayapuri