कुछ क्षण गुस्सेल धर्म के साथ

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मायापुरी अंक 44,1975

धर्मेन्द्र का जब भी कही नाम आता है तो उनके साथ किसी न किसी हीरोइन का नाम जुड़ा रहता है। सबसे पहले यह चक्कर मीना कुमारी से शुरू हुआ और अब आखिरी नाम हेमा मालिनी का है इस बीच में लीना चंदावरकर, सुचित्रा सेन, सायरा, शर्मिला टैगोर, रेखा आशा सचदेव, वगैरह वगैरह का, उनके नाम के साथ जुड़ते गये, कटते गये। लोग उन्हें गर्म-धर्म कहने लगे हैं। बैड-रूम और धर्मेन्द्र जैसे घुलमिल कर एक हो गए हैं। आज कोई भी पत्रिका उठा लीजिए उसमें अगर धर्मेन्द्र के बारे में कुछ लिखा है तो सिर्फ उनके फिल्मी और सैक्स जीवन के बारे में होगा।

क्या गर्म-धर्म, हेमा मालिनी से शादी करेंगे?

क्या वह अपनी पत्नी से तलाक लेंगे?

क्या वह दूसरी शादी करने के लिए इस्लाम धर्म अपनायेंगे?

इन पत्रिकाओं में न जाने कितने प्रश्न किये जाते हैं और कितनों का उत्तर दिया जाता है। नही कह सकता कि ये बातें झूठी होती हैं सच्चाई का अंश तो उनमें जरूर होता है। यह अलग बात है कि मसाला लगाकर बात कही गई हो जहां आग होती है, वही तो धुंआ होता है।

मैं आज धर्मेन्द्र के एक दूसरे पहलू पर लिखना चाहता हूं। धर्मेन्द्र के जीवन में सैक्स के अलावा एक और पहलू भी है। वह पहलू है एक अच्छे मित्र का एक अच्छे इंसान और मिलनसार और निडर व्यक्ति का मैंने धर्मेन्द्र के साथ एक पिक्चर में काम किया है। मैं उस पिक्चर में सह-निर्देशक था। उस समय मैंने थोड़ा बहुत जाना। कुछ छोटी-मोटी ऐसी दिलचस्प बातें हुईं जिसमें आपको उनके जीवन के दूसरे पहलू का पता चलेगा

मेरी धर्मेन्द्र से पहली बार जान पहचान फिल्म ‘मेरे हमदम मेरे दोस्त’ के समय हुई। इसमें धर्मेन्द्र के अतिरिक्त शर्मिला टैगोर, मुमताज, ओम प्रकाश और रहमान आदि काम कर रहे थे। इस फिल्म की आउटडोर के लिए हम शिमला चले गए। चैल बहुत ही प्यारी जगह है और इसके मालिक, महाराजा पटियाला यदुविन्दर सिंह थे। वे खुद तो वहां नही आ सके लेकिन लड़के को भेज दिया। उन्होंने अपने महल में सारे यूनिट को खाने के लिए निमंत्रण दिया।

उन दिनों शर्मिला टैगोर ने कुछ ही दिन पहले इस्लाम धर्म अपनाया था और शर्मिला से ‘आइशा बेगम’ बन गईं थी। नया नया शौक था इसलिए हर बात में मुस्लिम दिखना चाहती थी। इसलिए वह गरारा कुर्ता पहन कर बात बात में हाये अल्ला कहती हुई हमारे साथ महल पहुंची।

ड्रिंक करने के बाद सब लोग खाने की मेज पर आ बैठे। थोड़ी देर के बाद बढ़िया भुने हुए तन्दूरी मुर्गे मेज पर लाये गये। सब ने एक-एक पीस उठाया और छुरी-कांटे से काट कर खाने की कोशिश करने लगे। धर्मेन्द्र में बनावट बिल्कुल नहीं है। उन्होंने कुछ पल के लिए सब की तरफ देखा, फिर मुर्गे की टांग उठा ली और बोलें, भाई हमें तो यह कांटा छुरी अच्छा नही लगता और फिर मुर्गा तो हाथ में खाने की चीज है, और उन्होंने खाना शुरू कर दिया।

युवराज कुछ देर के लिए रुक गये। फिर छुरी-कांटा टेबल पर रख दिया। उनके साथ सबने वैसा ही किया और सब हाथ से खाने लगें। शर्मिला ने जब देखा कि वह अकेली रह गई है तो वह भी मजबूर-सी होकर हाथ से खाने लगीं। लेकिन थोड़ी देर के बाद उन्हें भी मज़ा आने लगा धर्मेन्द्र एक अच्छा एक्टर होते हुए खेल के चैम्पियन भी हैं। वह खेल है गिल्ली-डण्डा। बादल घिर आने के कारण आउटडोर में शूटिंग रुक गई। बैठे-बैठे जब सब बोर हो गए फैसला हुआ कोई गेम खेली जाये, यूनिट में ज्यादातर पंजाबी थे। फैसला गिली-डण्डा पर हुआ। दो टीम बनाई गईं। एक की कप्तान शर्मिला थी दूसरी की मुमताज। गेम खूब जमी लेकिन चैम्पियन धर्मेन्द्र ही रहे। उनकी जब भारी आती थी तो उन्हें आउट करना असम्भव सा हो जाता था। बचपन का यह खेल खेल कर ऐसा लगा जैसे वापिस बचपन में पहुंच गये हों।

धर्मेन्द्र लड़कियों के मामले में किस्मत के कितने धनी हैं, यह मुझे उस समय मालूम हुआ जब घटना मेरे ऊपर ही बीती। कारदार स्टूडियो में शूटिंग हो रही थी शॉट खत्म हुआ तो मैं किसी काम से बाहर आया तो देखा कि दरबान ने एक लड़के को रोक रखा है। पता चला है कि वह अपनी दो बहनों से साथ शूटिंग देखना चाहते हैं। जैसे ही मेरी निगाह सामने खड़ी दो लड़कियों पर पड़ी तो मैं ठगा-सा रह गया। एक नही दो-दो चांद धरती पर कहां उतर आये? ईरानी लड़कियां थी लेकिन बला की खूब सूरत। हमारी इंडस्ट्री में कोई हीरोइन भी इतनी सुन्दर न होगी।

मैं उन्हें अंदर ले गया, कुर्सियों पेश की, कोका कोला मंगवाया उन्होंने कहा कि धर्मेन्द्र से मिलना चाहती हैं तो मैंने बड़ी शान से कहा,

अभी लीजिए, वह तो हमारे बड़े भाई की तरह हैं, और मैंने उनकी नमस्ते आगे पहुचाई, देर तक वे बैठी रहीं और उनसे घुलमिल-सा गया शाम को अगले दिन फिर आने का वायदा करके चली गईं और मैं रात भर उनके सपने देखता रहा।

अगले दिन मैं स्टूडियो में पहुंचा तो क्या देखता हूं कि स्टेज के बाहर वह दोनों धर्मेन्द्र के साथ बैंठी मिठाई वाले से मिठाई खा रही हैं। मुझें देखकर दोनों ने छोटी-सी हैलो और आंखे नीची कर लीं धर्मेन्द्र मुझे देखकर बोले,

जोगेन्द्र ! रसगुल्ले खाओगे?

जी नही शुक्रिया! वह तो सिर्फ आपकी किस्मत में है.. मैंने जलभुन कर कहा और अन्दर चला गया। थोड़ी देर के बाद वह तीनों मेकअप रूम में चले गये।

अगर धर्मेन्द्र स्त्री जाति में बहुत ही प्रिय रहे हैं तो उसकी वजह यह है कि वह उनकी बहुत ही इज्जत करते हैं। किसी भी औरत से बात करते समय बड़े सम्मान से पेश आयेंगे। कभी भी किसी की खिल्ली नही उड़ाते। एक गुजराती लड़की धर्मेन्द्र को मिलने आया करती थी। अब लोग जानते थे एक दिन शूटिंग हो रही थी। ओम प्रकाश के अलावा कोई पचास के लगभग जूनियर आर्टिस्ट थे। वह लड़की सैट पर आ गयी।

ओम प्रकाश की मज़ाक करने की आदत है। इसलिए धर्मेन्द्र को छोड़ने के लिए पंजाबी में कहा

औ चल ओए मुंडिया, तेरी कुड़ी आ गई ए।”

ओम जी प्लीज.. गुस्से में धर्म ने बात अधूरी छोड़ दी उसे अच्छा नही लगा इतने लोगों के सामने उस लड़की का मजाक उड़ाया जाये। बाद में ओम प्रकाश भी बहुत पछताये।

निर्देशक रघुनाथ झलानो की फिल्म ‘मन को आंखे’ की शूटिंग कश्मीर में हो रही थी। धर्मेन्द्र और वहीदा रहमान भाग ले रहे थे। मैं धर्मेन्द्र के भाई अजीत और उनकी बुआ के लड़के वीरेन्द्र के साथ, घूमने के लिए वहां पहुंच गये।

एक दिन हम लड़के लोग शूटिंग पर न जाकर कहीं और घूमने चले गये तो श्री नगर के कॉलेज के लड़के शूटिंग देखने पहुंच गये। उन्होंने वहीदा रहमान को छोड़ना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे अश्लील गालियां देने लगे। धर्मेन्द्र को बड़ा गुस्सा आया। उनके मना करने पर जब वह न रूके तो उन्होंने उठ कर तीन-चार को पीट दिया। बाकी के लड़के भाग गये।

अगले दिन हम सब-लोग शूटिंग पर साथ गये। सोचा कॉलेज के लड़के हैं। कहीं दंगा-फसाद न करे। क्या देखते हैं कि सारा कॉलेज चला आ रहा है। और साथ में उनका प्रिंसिपल भी है। वह लड़के झगड़ा करने की जगह सबके सामने अपनी करतूत की माफी मांगने आये थे।

बात उन दिनों की है जब शर्मिला टैगोर का इश्क नवाब पटौदी के साथ जोरों पर था। कलकत्ता में क्रिकेट मैच शुरू होने वाला था और शर्मिला वहां पटौदी के पास जाना चाहती थीं लेकिन शूटिंग चल रही थी और एक दिन का काम बाकी था शर्मिला ने कहा, वह रात का काम करने को तैयार हैं ताकि अगले दिन कलकत्ता की फ्लाईट पकड़ सकें। धर्मेन्द्र भी तैयार हो गये।

रात के करीब ग्यारह बजे थे शॉट के लिए लाईटिंग हो रही थी कि किसी ने आकर धर्मेन्द्र को खबर दी कि वह आई हैं और मेकअप रूम मैं इंतजार कर रही हैं। वह बेचैन से हो गये थोड़ी देर बाद वह हमें यह कहकर जाने लगे

आप लोग रिहर्सल करें, मैं आता हूं…

और आप मेकअप रूम में टैक कीजिए! मेरे मुंह से निकल गया एक लम्हें के लिए धर्मेन्द्र सकते में आ गये घूम कर मेरी तरफ देखा फिर जो उनकी हंसी छूटी कि हंसते हंसते बाहर भागे। हम लोग बाद में बड़ी देर तक हंसते रहे।

कभी-कभी प्रसिद्ध आर्टिस्ट के साथ घूमना बड़ी अपमाजनक बात हो जाती है। हम लोग फिल्म के आउटडोर के लिए दिल्ली गये। एक दिन वहां वर्षा शुरू हो गई और उस दिन शूटिंग कैंसल कर दी गई। धर्मेन्द्र के बैकुण्ठ और मैं होटल के कमरे में बैठ कर ताश खेलने लगें। धर्मेन्द्र ताश में भी उतना ही किस्मत वाले हैं, जितना लड़कियों के मामले में हमेशा ही जीतते हैं। वह जीतते गए और मैं हराता गया। जब मेरी पॉकेट खाली होने लगी तो मैंने हाथ उठा लिया

समय बिताने के लिए यह फैसला किया गया, कोई पिक्चर देखी जाये। कनॉट प्लेस में रिवोली सिनेमा पर एक पुरानी अंग्रेजी फिल्म (Return from the Ashes) लगी हुई थी, वह देखने चले गए।

जैसे ही बालकनी में पहुंचे और लोगों ने देखा धर्मेन्द्र आये हैं तो उनमें खलबली-सी मच गई। सब हमारी और घूम-घूम कर देखने लगें और कानाफूसी होने लगी, खैर अंधेरा हुआ और ट्रेलर वगैरह चलने लगें।

धर्मेन्द्र को उन दिनों गैस की बहुत तकलीफ थी, किस्मत की बात उनके पेट में दर्द शुरू हो गया।

मेरा तो दर्द से बुरा हाल है, वह बोले।

तो फिर वापिस चलें? मैंने पूछा।

नही-नही, तुम लोग पिक्चर देखों, मैं होटल में जाकर आराम करता हूं।

हमारे बहुत कहने के बावजूद भी वह अकेले चले गये मैं और बैकुण्ठ (कैमरा मैन) पिक्चर देखते रहे।

इंटरवल हुआ तो सब लोग घूम कर हमारी तरफ देखने लगें, धर्मेन्द्र को न पाकर उन्हें बड़ी मायूसी हुई। हमारी तरफ देखते हुए ऐसे घूरने लगे जैसे हम बहुत बड़े अपराधी हों।

धर्मेन्द्र तो गये यार! एक आव़ाज आई, हां यार, लेकिन ये लोग कौन हैं? दूसरी आवाज़ थी।

अरे होंगे साले चमचे उनके, छोड़ो यार!

पहली आवाज़ ने उत्तर दिया।

हम दोनों की हालत देखने लायक थी।


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Mayapuri

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