यह फिल्मी दुनिया है बाबू यहां का दस्तूर निराला हैं

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Ashok Kumar Actor

 

मायापुरी अंक 15.1974

एक रोगी डॉक्टर के पास गया बोला डॉक्टर साहब, रात को सिर भारी-भारी रहता है और नींद नही आती क्या इलाज है इसका? डॉक्टर ने नुस्खा बताया आज सोने से पहले एक गिलास गर्म गर्म दूध पी लीजिये।

रोगी भड़क कर बोला मगर तीन महीने पहले तो आपने इसी बीमारी के लिए कहा था, खाली पेट सोया करो। डॉक्टर भी अकड़ गया चुप रहो मियां, मालूम भी है, पिछले तीन महीने में डॉक्टरी विद्या कहां से कहां जा पहुंची है।

यही हालत हमारी फिल्म इंडस्ट्री की है। आये वर्ष यहां हीरो-हीरोइन बनने के लिए योग्यताएं बदल जाती है। 1940 के आसपास एक जमाना था जब सितारा बनने के लिए गले का मीठा होना जरूरी था। गले में से संगीत के सातों सुर भले ही न निकलें पर दो-ढाई सुर तो निकलने ही चाहिये थे। बचे-बचे सुर उन दिनों की फिल्म कम्पनियां सितारों को दंड बैठक लगवा कर स्वंय निकलवा लिया करती थी। तब बेचारा अशोक कुमार भी अपनी फिल्म में स्वयं ही गाना गाया करता था। उस समय गाने वाले सितारों (श्याम, के. एल. सहगल, सुरैया, नूरजहां, आदि) की धूम थी।

समय ने तरक्की की ओर फिल्मों में पार्श्व-गायन घुस पैठ कर गया। अब सितारा बनने के लिए गले में मिश्री जैसा स्वर होना जरूरी नही था। अभिनय पर बल दिया जाने लगा।

इससे फिल्मों में एक स्वर्ण-युग आया। दिलीप कुमार, राज कपूर, देव आनंद, मीना कुमारी, वैजयंती माला, मधुबाला सब इसी युग की देन है। इधर आजकल स्टार बनने के लिए जो योग्यता है वह है अंग-प्रदर्शन निर्माता सितारो के कपड़े उतारना चाहता है और कोई सितारा कहां तक उसका साथ देता है, यही उसकी योग्यता है। इस रेस में स्वर्ण-युग के बड़े-बड़े दिग्गज हीरो-हीरोइन पिछड़ कर जाने कहां छूट गये है।

मगर एक योग्यता ऐसी है जो किसी सितारे को 1940 में भी चाहिये थी 1940 में भी चाहिये थी, 1960 में भी चाहिये थी और अब भी चाहिये वह योग्यता है किस्मत फिल्म-जगत में ऐसा ग्लैमर है कि इसकी ओर हजारों अभिनेता यूं खिंचे चले आते है जैसे चुम्बक की ओर लोहे का चूरा खिंचा आता है। इन अभिनेताओं का एक बड़ा भाग गुमनामी के अंधेरों में खो जाता है और कोई-कोई किस्मत वाला ही फिल्म-जगत में सितारा बन कर चमकता है।

जाहिरा और परवीन बॉबी का उदाहरण लीजिये। दोनों हीरोइनें सुंदरता और अभिनय-क्षमता (यदि उनमें कुछ है तो) में बिल्कुल एक ही लेवल पर आकर टिकती है। उनकी धारणायें भी एक जैसी है। दोनों ही अपने-अपने फ्लैट में अकेली रहती है और ‘फ्री लव की समर्थक है। किसी भी कोण से आप एक को दूसरी से उन्नीस या इक्कीस सिद्ध नही कर सकते। फिर भी परवीन अपनी पहली फिल्म (फ्लॉप चरित्र) के साथ आकाश तक उछल गई। वितरक ‘चरित्र’ के पिट जाने के बावजूद परवीन को साइन करना चाहते थे और उसे धड़ाधड़ फिल्में मिलती गई। उधर जाहिरा ‘गैम्बलर’ में पिट कर गुमनामी के अंधेरों में खो गई। उसकी ऐसी हालत हो गई कि अपने फ्लैट में बंद होकर वह चुपके-चुपके रोया करती थी। यह सब किस्मत की करामात नही तो क्या थी? और आज किस्सा फिर उलटा है परवीन की ‘धुएं की लकीर’ और ‘36 घंटे’ पिटी तो वितरक ठहर कर सोचने पर मजबूर हो गये कि क्या वे परवीन को लेकर ठीक कर रहे हैं? जाहिरा को दस-बारह फिल्में दिला दी और ये सभी फिल्में बड़े-बड़े सितारों को लेकर बन रही है। अब जाहिरा बीते दिनों को याद कर मुस्कुराती है। अब उसने अपनी ‘जंजीर’ के हिट जाने से पहले वितरक अमिताभ के बारे में कहते थे वह लम्बू क्या एक्टिंग करेगा? उसके चेहरे पर हंसी भी यूं लगती है जैसे टाट में पैबंद लग गया हो। बेचारी जया भादुड़ी ने अमिताभ को हीरो बनाने के लिए क्या-क्या पापड़ नही बेले ? यदि कोई निर्माता अमिताभ को अपनी फिल्म मे ले लेता था तो जया उसकी फिल्म में अपना मूल्य एक चौथाई कम कर देती थी। इसके बावजूद अमिताभ की मार्केट नही बन रही थी। तब जया ने देवी किस्मत के आगे हाथ जोड़े है विधाता ‘जंजीर’ हिट कर दो तो मैं अमिताभ से शादी कर लूं किस्मत ने जया की सुन ली। ‘जंजीर’ हिटहोते ही अमिताभ दूसरा सुपर-स्टार बन गया। अब वितरकों की उसके कद की लम्बाई खलती नही, भाती है, अब उसकी ‘टाट में पैबंद’ मुस्कान ‘गोल्डन स्माइल’ बन गई है। सच तो यह है कि अमिताभ नही बदला, अमिताभ की किस्मत बदल गई है।

एक समय ऐसा था जब शशि कपूर को कोई वितरक घास तक नही डालता था। पृथ्वीराज कपूर निर्माताओं से कहा करते थे मेरा सबसे योग्य बेटा शशि कपूर है, आप उसे अपनी फिल्म में ले लीजिये। वास्तव में पप्पा पृथ्वीराज चाहते थे कि शम्मी और राज की तरह शशि भी फिल्मों में अपना स्थान बना ले। शशि कपूर बिल्कुल ‘बेकार’ बैठा था जब किस्मत से उसकी ‘जब जब फूल खिले’ हिट हो गई। और लीजिये, रातों-रात शशि कपूर स्टार बन गया। अभिनेत्री फिल्म में शशि कपूर ने एक व्यस्त डॉक्टर का खूबसूरत रोल निभाया मगर अभिनेत्री’ पिट गई और शशि की मार्केट नीचे गिर गई। ‘शर्मिली’ या ‘जानवर और इंसान’ में शशि का ऐसा कोई खास काम नही था मगर किस्मत से फिल्में चल निकली और शशि कपूर की मार्केट फिर बन गई।

नवीन निश्चल की पहली ‘सावन भादों’ हिट हो गई तो उसके घर के आगे निर्माताओं की लाइन लग गई। नवीन ने अंधाधुंध फिल्में साइन करनी शुरू कर दी। उसकी अगली फिल्में फ्लॉप हो गई और आज ‘किसी भी जमे हुए सितारे जैसी योग्यता होने के बावजूद नवीन के पास कोई विशेष फिल्में नही है। विक्टोरिया न.203 में नवीन का कोई ऐसा काम नही है। सारी फिल्म पर अशोक और प्राण छाये रहते है मगर इसी फिल्म ने नवीन की गिरती हुई साख को थोड़ा-सा सहारा दिया है।

आज तक किसी की समझ में नही आया कि अनिल धवन कैसे हीरो बन बैठा ? उसके पास न तो ऐसा गज़ब का चेहरा है, शरीर जरूरत से अधिक मोटा है और अभिनय के नाम पर तो बिल्कुल ही टोटा है। मगर उसकी पहली फिल्म ‘चेतना’ चल निकली और अनिल धवन भी चल निकला। इसे कहते है किस्मत किस्मत चाहे तो जीरो को हीरो बना देती है।

इस बात का भी कोई उत्तर नही मिलता कि सिम्मी हीरोइन क्यों नही बन पाई ? उसने अपनी सारी आशायें ‘मेरा नाम जोक’ की रिलीज पर बांध रखी थी। जोकर की रिलीज से पहले सिम्मी के पास अनेक छोटी-मोटी फिल्मों के ऑफर आये मगर उसने उन्हें बड़ी फिल्मों की आशा में ठुकरा दिया। जोकर पिट गई और उसके साथ ही सिम्मी की आशायें भी मिट्टी में मिल गई हालांकि उस फिल्म में सिम्मी के अभिनय की सभी ने जी खोल कर सराहना की थी। बड़ी के चक्कर में सिम्मी छोटी फिल्मों से भी हाथ धो बैठी। सोनिया साहनी की बहुत कम फिल्में फ्लॉप गई है। उसकी पहली फिल्म ‘जौहर महमूद इन गोआ’ भी हिट गई थी और हाल की फिल्म ‘बॉबी’ की तो बात ही मत कीजिये। इसके बावजूद सोनिया साहनी के पास इन दिनों कोई काम नही है। इसे किस्मत का खिलवाड़ नही कहियेगा तो क्या कहियेगा।

आपको ‘उमंग’ की अर्चना की याद तो होगी। अर्चना ने ‘उमंग’ में कितना अच्छा अभिनय किया था। उसकी दूसरी फिल्म थी ‘बुड्ढा मिल गया’ दोनों फिल्में बॉक्स ऑफिस पर पिटी और आज अर्चना का कोई नाम-लेवा भी नही है। बसंत जोगलेकर ने ‘एक कली मुस्कायी’ बनाकर अपनी बेटी मीरा को हीरोइन बनाना चाहा था मगर फिल्म बुरी तरह पिटी और साथ ही मीरा जोगलेकर का पत्ता कट गया.

रणधीर कपूर की ‘कल आज और कल’ तथा ‘जीत’ पिटी तो वितरक उसे डिब्बा कपूर कहने लगे। कोई भी उसकी फिल्म खरीदने को तैयार नही था। वितरक कहते थे, डिब्बे की फिल्म ली तो अपना डिब्बा गोल हो जाएगा। मगर ‘रामपुर का लक्ष्मण’ की सफलता ने रणधीर के उखड़े पांव जमा दिये। उसे फिल्में मिलने लगी वरना इस समय रणधीर केवल ‘धरम करम’ का निर्देशन कर रहा होता।

‘अनोखी रात’में अजय साहनी (स्व.बलराज साहनी के सुपुत्र) ने खूब अभिनय किया था दर्शक कहते थे कि अजय जरूर अपने पिता का का उंचा करेगा। फिर अजय साहनी की ‘समाज को बदल डालो’ आई। फिल्म का थीम क्रंतिकारी था। लोग उसे पचा नही सके। फिल्म पिटी और साथ ही वितरकों ने अपने खाते में से अजय साहनी का नाम काट दिया। अजय साहनी का नाम काट दिया। अजय ने रूस में निर्देशन की ट्रेनिंग ली थी। बेचारे को अपनी निर्देशन प्रतिभा दिखाने का मौका भी न मिला कहते है, आजकल अपनी असफलता से खिन्न होकर अजय सुबह से शाम तक बियर पीता रहता है। बियर ने उसका शारीरिक गठन ऐसा बिगाड़ दिया है कि यदि उसका वापस आने का कोई चांस था तो वह भी गुल हो गया।

संजीव कुमार के अभिनय के बारे में आपका क्या ख्याल है? मैं सोचता हूं कि इस समय वह फिल्म-जगत का नम्बर एक अभिनेता है। मेरा मतलब अभिनय की क्वालिटी से है। दो बार वह भारत पुरस्कार जीत चुका है। इसके बावजूद क्या इंडस्ट्री में उसे अपना सही स्थान मिल सका? नही जी, वितरक अभी तक धर्मेन्द्र-राजेश खन्ना और देवानंद की तिकड़ी को चोटी पर रखते है। इनमें से अब देवानंद के अपने स्थान से खिसकने के आसार नजर आ रहे है, मगर यह जरूरी नही कि उसका स्थान संजीव को मिले। यहां किस्मत का खेल चलता है। ताज्जुब नही, यदि ऋषि कपूर वितरकों की निगाह में संजीव से भी ऊपर चढ़ जाये।

सिम्पल कपाड़िया की अभी एक भी फिल्म रिलीज नही हुई है। पप्पा चुनिया अपनी मुनिया का बहुत सोच-समझ कर शोर कर रहे है और सिम्पल के पास फिल्मों की दनादन ऑफर आ रही है। 27 नवम्बर की रात को सिम्पल को अशोका होटल में देखा तो मुंह से यही निकला-बहुत शोर सुनते थे पहलू में दिल का, चीर के देखा तो कतरा-ए-खूं निकला अमीन सियानी ने स्टेज पर सिम्पल से दो शब्द बोलने के लिए कहा तो बेचारी इतनी नर्वस ही गई है क जीभ ही तालू से जा चिपकी। मगर इस समय सिम्पल शक्ति सामंत की फिल्म में राजेश खन्ना के साथ हीरोइन आ रही है। है न अपनी अपनी किस्मत।


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Mayapuri

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