1975 रहा अभिनेताओं के नाम!

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मायापुरी अंक 14.1974

अभिनेताओं में 1975 में प्रथम स्थान पर सुनील दत्त होगा इसमें कोई शक नही है। जिस प्रकार लगातार वह फिल्में साइन कर रहा है, उससे अगले वर्ष कम से कम उनकी दर्जन भर फिल्में तो आयेंगी ही।

चरित्र अभिनेताओं में प्राण के साथ अब प्रेमनाथ की मांग बढ़ रही है और उसके साथ ही उसकी हरकतें भी बढ़ती जा रही है। वैसे अभिनय में तो वह अपनी तरह का बेजोड़ कलाकार है। ‘रोटी कपड़ा और मकान’ का उसका रोल इस बात का साक्षी है।

हास्य कलाकारों में महमूद और जानीवाकर का युग बीत गया है। अब तो असरानी की मांग ही सबसे ज्यादा हो रही है। इस प्रकार खलनायकों में रणजीत फिल्में साइन कर रहा है। शायद उसके पीछे बिन्दु का सहयोग भी काम कर रहा हो। अभिनेत्रियों की संख्या जैसे-जैसे कम हो रही है एक-एक अभिनेत्री के पास फिल्मों की संख्या बढ़ती जा रही है। पिछले वर्ष रेखा दस फिल्मों, हेमा आठ तथा जीनत और सायरा सात-सात फिल्मों में आई। रेखा और सायरा के बारे में तो कुछ कहना ही व्यर्थ होगा। उनका ध्यान अभिनय पर कम और सैक्स-ग्लैमर पर ज्यादा रहता है। हेमा अवश्य एक प्रभावशाली अभिनेत्री है और धर्मेन्द्र के साथ उसकी जोड़ी लोकप्रिय भी बहुत हो चुकी है। वह निश्चय ही अगले वर्ष श्रेष्ठ हीरोइनों की गिनती में रहेगी। इनके अलावा मौसमी चटर्जी की मांग बढ़ रही है। जीनत तो एक अलग ढंग की भूमिकाओं के लिए अच्छी अभिनेत्री साबित हो रही है।

अब तो हर वर्ष फिल्म इंडस्ट्री में नई प्रतिभाओं का एक अच्छा खासा हुजूम चला आता है। पूना से तो प्रतिवर्ष बहुत से कलाकार और निर्देशक डिप्लोमा लेकर निकलते ही है, बम्बई में अभिनय के प्रशिक्षण की जो दुकानें खुल गई हैं वह भी हर वर्ष कितने ही अभिनेता तैयार कर देते है। हालांकि इनमें से प्रसिद्धि दो-चार को ही मिल पाती है।

नई अभिनेत्रियों में ‘इंसानियत’ की नायिका मधु जहां एक दम बेकार रही वही अंकुर की नायिका शबाना आज़मी अच्छे अभिनय से मोहित कर गई। इस समय उसके आस-पास तीस से ऊपर फिल्में है। ‘धुएं की लकीर’ वाली परवीन बॉबी 36 घंटे में तो बिल्कुल ही साधारण थी और यही हाल था ‘टांगे वाली’ नीतू सिंह का ‘हवश’ में। अगला वर्ष इन्हें ग्लैमर गर्ल के रूप में ही पा सकेगा अभिनय इनके बस का नही। ‘शुभ दिन’ वाली मधुच्छन्दा इसके पहले ‘सारा आकाश’ में ज्यादा प्रभावित कर चुकी है। ‘खून की कीमत’ की नायिका नीलम मेहरा में थी अभिनय का कौशल दिखलाई नही दिया। अंबिका जौहर (5 राइफल्स) तो वैसे भी अभिनय की अपेक्षा कपड़े उतारने पर अधिक ध्यान देती है।

नये अभिनेताओं में ‘शुभ दिन’ के हीरो राजेश लहर की एक ही विशेषता है कि उनकी शक्ल ऋषिकपूर से मिलती है। ‘आलिंगन’ का हीरो रमेश शर्मा तो यह विशेषता भी नही रखता न जाने कैसे उसे पूना में अभिनय के लिए गोल्ड मेडल दे दिया गया चरित्र अभिनेताओं में रजा मुराद और (नमक हराम) और तारिक (यादों की बारात) अवश्य अच्छा काम कर गये है।

नये कलाकारों की अपेक्षा इस बार नये निर्देशकों का काम बहुत अच्छा रहा। राज तिलक ने रहस्य फिल्म 36 घंटे को बहुत प्रभावसाली ढंग से निर्देशित किया है और इतने ही अच्छे ढंग से बनी है ‘अंकुर’ जिसके निर्देशक श्याम बेजल की यह पहली फिल्म है। दो पुराने कलाकार शम्मी कपूर और साधना भी इस वर्ष निर्देशक बन गये। उनकी फिल्में ‘मनोरंजन’ और ‘गीता मेरा नाम’ में कुछ स्थानों पर निर्देशन की अच्छी पकड़ थी। हां, वेस्ट इंडीज से आये युवा निर्देशक हरबंस अरोड़ा की ‘मां, बहन और बीबी सफल नही रही।

इस वर्ष का सबसे बड़ा स्कैंडल था जीतेन्द्र हेमा के विवाह का समाचार जिसने एक बार फिल्म उद्योग में तहलका ही मचा दिया था। एक बार तो बीसों निर्माता जिनका पैसा हेमा पर लगा था, उठे। भला हो धरम का जिसने ठीक मौके पर शोभा सिप्पी के साथ मद्रास पहुंच कर हेमा को एक बार फिर दुल्हन बनने से रोक लिया। वैसे इस वर्ष संजीव कुमार भी दूल्हा नही बन सके। वर्ष के शुरू में पी.एन अरोड़ा और हेलन के अलगांव की बात ने भी काफी तूल पकड़ा।

फिल्म उद्योग को इस वर्ष सबसे अधिक प्रभावित किया सरकार के तस्कर विरोधी अभियान ने। सरकार द्धारा धड़ाधड़ तस्करों को पकड़ कर अन्दर भेज देने से बहुत सी फिल्में खटाई में पड़ गई, जिन पर इन तस्करों का पैसा लग रहा था। शायद यह सरकार ने तस्कर विरोधी अभियान की घबराहट ही थी कि इस वर्ष फिल्म उद्योग में दी गई पार्टियां भी प्राय: फीकी ही रही।

इस वर्ष सरकारी घोषणाओं ने फिल्म इंडस्ट्री की जान सांसत में डाले रखी। पहले फिल्मों के राष्ट्रीकरण की अफवाह उठी। रंगीन फिल्मों के आयात पर सरकार ने जो रोक लगाई तो इस्टमेनकलर में फिल्में बनाने वाले निर्माता एक बार घबरा उठे। वह तो सरकार ने जल्दी ही एक सही कदम उठाकर यह प्रतिबन्ध खत्म कर दिया। रही सही कसर पूरी कर दी फिल्म वितरण के राष्ट्रीयकरण की अफवाह ने, जिसने एक बार तो वितरण के काम को ठप्प सा ही कर दिया।

सरकारी संस्थान फिल्म वित निगम के माध्यम से भी इस बार कोई उल्लेखनीय काम नही हुआ। राष्ट्रीय पुरस्कार तो हमेशा की तरह इस बार भी विवाद का विषय बने रहे। सरकार अभी तक यह निश्चय नही कर पाई है कि ‘गर्म हवा’ की कहानी का पुरस्कार इस्मत चुगताई को दिया जाये या कैफी आजमी को, क्योंकि दोनों ही इस कहानी को अपना बतलाते रहे है।

और दो अभिनेत्रियों की सगाई कुल मिलाकर 1974 के वर्ष ने हिन्दी फिल्मों में से घरेलू टाईप हीरोइनों की सफाई ही कर दी। वह तो भला हो जीनत अमान, परवीन बॉबी और जरीना-जाहिरा जैसी अंग्रेजीनुमा अभिनेत्रियों का, जिन्होनें दिल खोलकर फ्री-लव फ्री-सैक्स का ढिंढोरा पीटा और फिल्म नगरी को अचानक आ जाने वाले सुन्दरियों के अकाल से बचा लिया।


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Mayapuri

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