धुनों का शहंशाह नौशाद – एक याद जो मेरे जहन में है

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naushad ali

 

मायापुरी अंक 15.1974

मैं पान में भीगता हुआ कार्टर रोड से ‘लेड मार्क’ की तरफ जा रहा था। आसमान पर घने बादल घुमड़ रहे थे और सामने सागर की लहरें किनारे पर टकरा रही थी। रेडियो पर एक पुराना गीत बज रहा था।

रुम झुम बरसे बादरवा मस्त हवायें आई पिया घर आजा आजा पिया गर आजा

संगीतकार नौशाद अली का ‘रतन’ जिसकी धुनों में संगीत का जादू जागा था। ये भी कितना अजीब इत्तफाक था। कि मैं उस समय “आशियाना” बिल्डिंग के ठीक करीब से गुजर रहा था जहां आज भी संगीत का शहंशाह नौशाद रहता है। मेरी आंखे इमारत के उस कमरे पर ठहर गयी। जहां यह संगीत का साधक अपनी साधना करता है। कोच की कांच खिड़किया खुली थी, और कोई उनके पीछे खड़ा था। देखा, नौशाद साहब आसमान की तरफ देखते हुए खड़े है बादल घुमड़ रहे है लगा उनके ही गीतों का मेघ धरती से आसमान तक छाया हुआ है। और मुझे उनके उस गीत की याद हो आई जिसमें नौशाद साहब ने ऐसे ही सावन के बादलों को देख कर दिल को छूती हुई धुने बनायी थी।

सावन के बादलो उनसे जा कहा घन घोर घटाओ मत झूम के आओ

सन 1937 से सन 1974 तक का लम्बा सफर है, नौशाद अली संगीतकार का उसके संगीत का, उसके धुनों का आज भी फिल्म ‘अनमोल घड़ी’ का जब कोई गीत हवाओं में थिरक जाता है और कोकिल कणठी नूरजहां का स्वर सुनाई पड़ता है तो राह चलते मुसाफिर के कदम थम जाते है और स्वर साम्राज्ञी नूरजहां की दर्द से बोझिल आवाज गूंज उठती है।

आवाज दे कहां है दुनिया मेरी जवां है चलने को अब फलक से तारों का कारवां है।

गीतकार शकील के गीत, नौशाद की धुनों में नहा कर जब निकलते थे तब संगीत प्रेमी झूम झूम उठते थे। ‘शाहजहां’‘दर्द’ ‘दिल्लगी’‘दास्तान’‘आन’ और ‘अन्दाज’ की घायल करती हुई धुनें जब ‘बाबूल’ पर आकर जरा आकर जरा ठहरती है, तो हम देखते है कि संगीतकार नौशाद की बत्तीस फिल्मों में से 23 फिल्में सिल्वर, गोल्डन और डायमंड जुबली मना चुकी है,

‘आशियाना’ के कमरे में नौशाद अली अट्ठारह-अट्ठारह घंटे बंद रहते है। उनका पियानो उनकी हारमोनियम उनके ‘साज’ उनकी आवाज ही उनके साथी होते है। सात सुरों की सरिता में हर पल गोते लगाते हुए जब भी यह संगीतकार सतह पर आता है तो एक अमर धु जन्म पाती है। एक गीत जन्म पाता है।

गीतों के बोल, कहानी का मिज़ाज, और सीन करेक्ट सिच्युएशन पर मेल खाते गीतों की रचना केवल देशी साजों पर करना, यही नौशाद का सबसे बड़ा गुण है ‘मुगले-आजम’गीत तुम्हारी दुनिया से जा रहे है उठो हमारा सलाम लेलो।

में जो दर्द है, वह सुनने वालों की आंखो में नमी उतार देता है। बैक-ग्राउंड म्यूजिक देने में भी नौशाद साहब अकेले ही है। ‘मुगले आजम’‘गंगा जमुना’ और ‘पाकीजा’ की कामयाबी में इनके बैकग्राउंज म्यूजिक का बड़ा हाथ रहा है।

फिल्म ‘पाकीजा’ में जब ‘साहिब जान’ रात के दो बजे जागती है और गोमती के पुल पर रेलगाड़ी की सीटी बजती है तो यूं लगता है कि रात के ठीक दो ही बजे है। इतना सही परफेक्शन सीन में उभार देना सिर्फ नौशाद साहब का ही काम है। “कमाल साहब” ने कहा था नौशाद साहब ‘पाकीजा’ में मैं कहीं भी नज़र नही आता सिर्फ नौशाद ही नौशाद छाया हुआ है।

यादों की परछाई उभरती रही और मैं नौशाद अली के पिछले तीस सालों से बनाई हुई धुनों के समुन्दर में डूबता-उतरता रहा। ‘प्रेमनगर’ (नौशाद साहब की पहली फिल्म 1937में) ‘आईना’ तक (जो अब रिलीज होगी) का संगीत मेरे आगे बिखरा हुआ है और जिस में कोई विदेशी ट्यून नही है, कोई रिपीटीशन नही है कोई शोर नही है, सिर्फ आत्मा की गहराई में डूब जाने वाला संगीत ही संगीत है।

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Mayapuri