“दिन दिन जल्दी जल्दी ढलता” है – अमिताभ बच्चन की जुबानी

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मायापुरी अंक 17.1975

बच्चे प्रत्याशा में होगें,

नीड़ों से झांक रहे होगें,

यह ध्यान परों में चिड़ियों के,

भरता कितनी चंचलता हैं,

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है।

मुझसे मिलने को कौन विकल,

मैं होऊं किसके हित चंचल,

यह प्रश्न शिथिल करता पद को।

भरता उर में विहलता है,

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है।

उक्त पंक्तियां मुझे उस वक्त याद आती हैं, जब मैं रात देर घर लौटता हूं। प्रतिदिन काम, काम और बस काम ! दिन में दो-दो शिफ्टें ! और काम भी कैसा, वही जाना-पहचाना, चिर परिचित ! जब तक काम में लगा रहता हूं, तब तक मन, काम में इस कदर लगा रहता है कि पता ही नही चलता कि दुनिया में क्या हो रहा है। आप कही यह मत सोचने लग जाइएगा कि मुझे कुछ नही मालूम !

जनाब मुझे हर बात मालूम है। बिहार की स्थिति मुझसे छिपी नही मेरे बारे में कौन क्या कहता है ? कौन क्या छापता है ? कितनी बातों में दम है ? कितनी बेकार हैं? मैं सब जानता हूं। लेकिन जो मजा खामोशी मैं है, वो मजा चिल्लाने में कहां ?

आप सोच रहे होगें कि मैं लाइन से बाहर जा रहा हूं। क्षमा कीजिएगा। मैं पुन: पटरी पर आ जाता हूं मै कह रहा था कि जैसे कवि ने उक्त पंक्तियां विवाहित अभिनेता के लिए ही लिखी हैं बच्चे प्रत्याशा में होंगे

और अब तो आप जान ही गये होंगे कि इन पक्तिंयो के रचियता कौन है? जी हां, आपका अन्दाजा बिल्कुल सही है। ये पंक्तियां मेरे पिता श्री हरिवंशराय बच्चन की हैं,

अमिताभ की लोकप्रियता से भी हजारों गुना अधिक लोकप्रिय, चहेते एवं गुणी ! और मैं एक चढ़ता सूरज जाने कब ढल जाऊं, कौन जाने..?

अब आप लोग अमिताभ बच्चन को पसन्द करते हैं, प्यार करते हैं, चाहेत हैं यह मेरी सफलता नही, बल्कि उस परिवार की सफलता है, जहां मेरा जन्म हुआ है और उसी परिवार ने मुझे अमिताभ बच्चन बनाया है।

मेरी मां श्रीमती तेजी बच्चन, जो मेरी जन्मदात्री के अलावा मेरी बहुत अच्छी दोस्त, सहयोगी और मार्ग दर्शक हैं।‘दोस्त’ इस कार्य में दुखों के पलो में, अगर किसी ने मेरा साथ दिया है हिम्मत बढ़ायी है तो वह हैं मेरी मां तेजी बच्चन !

भाई अमिताभ ने मुझे फिल्म उद्योग में प्रवेश दिलवाने में जी-जान की बाजी लगा दी। साथ-साथ तकलीफें देखना और हर वक्त एक कुशल गाइड की तरह से मुझे सही राह दिखाना यानी कि उसी की कोशिशों से मैं फिल्म-स्टार बन सका हूं !

और अब तो मेरी पत्नी जया भी मेरी बहुत अच्छी आलोचक और निर्देशक के अलावा सलाहकार हैं स्टेज की दुनिया से एकाएक मैं फिल्मी दुनिया में आ गया। यहां के मेरे अनुभव बड़े विचित्र हैं। मगर उपयोगी भी और इतने कटु-अनुभव कि अगर मेरी जगह कोई और होता तो मैदान छोड़ कर भाग खड़ा होता, लेकिन मैं डटा रहा। कभी घबराया नही क्योंकि मुझे अच्छी तरह मालूम था कि मै क्या हूं

लगभग सात साल पहले एक निर्माता ने दिल्ली में बहुत बड़ा नाटक किया नाटक से मेरा मतलब ‘स्टेज वाला नाटक’ नही उन साहब बहादुर ने एक फिल्म का नाम रखा। ‘गालिब’ फिर इसका मुहर्त (दिल्ली में) किया, बड़ी धूमधाम से और अमिताभ को चारों तरफ मशहूर कर दिया कि यह अमिताभ अब ‘गालिब’ की भूमिका निभाएंगे।

अब देखिए नाटक की शुरूआत कैसे होती है। उस प्रोड्यूसर ने मुंबई आकर, गालिब की भूमिका के लिए अशोक कुमार को अनुबंधित कर लिया। कहां अशोक कुमार ओर कहां अमिताभ बच्चन !

मैं बहुत परेशान हो गया। क्या करूं, क्या न करूं ? बड़ी मुसीबत में डाल दिया था इस भले आदमी ने सब परिचित लोग मुझे देखते और कहते कि यही है वह, जो गालिब का मुखोटा पहनने वाला है कुछ दिनों बाद सब के चेहरे प्रश्नवाचक चिन्हों से मुझे घूरते रहेंफिलहाल किसी तरह समय गुजरा

लेकिन इसके बाद भी ऐसे ही नाटकों का अन्त नही हुआ। दिन प्रतिदिन तरह-तरह की घटनाएं मुझे जकड़ लेती। मजाक होता रहा।

फिर जैसे-तैसे अमिताभ की सलाह एवं गाइनेंस से एक फिल्म मिली ‘सात हिन्दुस्तानी’। मुझे कुछ- कुछ आसार नजर आए। फिल्म कम्प्लीट होकर प्रदर्शित हुई। मुझे थोड़ा, हां थोड़ा-सा पसन्द किया गया, लेकिन बहुत ज्यादा नही।

मगर उसके बाद फिल्में मिलने लगी, लेकिन अब पुन: नाटक शुरू बदकिस्मती के दौर की शुरूआत देखिए

मेरी फिल्में फ्लॉप होनी शुरू हो गई। ‘एक नजर’ भी फ्लॉप हो गई।

उसके बाद कई फिल्में फ्लॉप हुई। इससे मेरा भविष्य धुंधलाने लगा। सभी मजाक उड़ाते और मैं मजाक का पात्रबनता रहा।

निसन्देह फिल्मों की असफलता से मेरी इमेज को गहरा धक्का पहुंचा मेरा मन बैठने लगा। मेरी मारकेट वेल्यू लगभग खत्म हो गई। वितरक मेरा नाम सुनकर डरते। निर्मातागण मेरी ओर आने से कतराते। और तो और जिन लोगों ने मुझे साइन कर रखा था, उन्होंने भी अपनी-अपनी फिल्मों से मुझे अलग कर दिया। और जिनकी चार-चार पांच-पांच रीलें बन चुकी थी। उनकी निर्माण गति मन्द हो गई।

यहां एक बात मै कहूंगा कि किसी भी फिल्म के फ्लॉप होने से कलाकार की कला कभी नही मरती, कला अमर होती है। और फिर फिल्म की असफलता के लिए अभिनेता को ही दोषी ठहराया जाना कहां तक उचित है। यह तो पूरी यूनिट का काम है। सब कंधे से कंधा लगा कर काम करते हैं।

मेरी कई फिल्मों की निर्माण-गति बहुत मन्द थी। कई अनेक परिस्थितियों की वजह से ये फिल्में धीरे-धीरे बनती गयी। और जब किसी फिल्म के निर्माण-कार्य में आवश्यकता से अधिक देरी हो जाती है तो कलाकार के मूड मैं एकाग्रता नही रह जाती, जो स्वभाविक है।

आप चित्रकार को देखिये, वह कितने परिश्रम से दिन रात एक करके अपनी कलाकृति को साकार करता है अगर वह बीच में अपना ध्यान इस कार्य से हटा लेता है तो उसकी कलाकृति उतनी सुन्दर नही बन पाती, जिसकी उसने अपेक्षा की थी। ठीक यही हाल अभिनेता का है। अभिनेता बड़ी मेहनत से फिल्म के निर्माण में सहयोग देता है। और जब उसे फिल्म-निर्माण में ढील दिखाई देती है या अन्य रुकावटें या तकलीफें होती हैं तो उनका उत्साह भी ठंडा पड़ जाता है। कला पूजा है और पूजा में विघ्न पड़ना अशुभ होता है और यही वजह है कि फिल्में फ्लॉप हो जाती हैं और सारा दोष अभिनेता के सर पर मढ़ दिया जाता है। आप ही सोचिये कि अभिनेता कहां तक दोषी हैं?

बॉलीवुड की स्थिति बहुत ही विचित्र है, यहां अभिनय का मूल्याकंन नही किया जाता, बल्कि सफलता असफलता की ओर देखा जाता है। एक हीरो हिट हो जाये तो वह रातों रात टॉप का आर्टिस्ट कहलाने लगता है, और अगर असफल हो जाए तो बेचारे को कोई पूछेगा नही, और वह रातों रात बहुत ही घटिया किस्म का कलाकार बन जायेगा।

लेकिन इसी बॉलिवुड में, मेरी असफलता ने निर्माता निर्देशक प्रकाश मेहरा को भी हताश करना चाहा, उनके शुभ चिन्तकों ने उन्हें समझाया कि क्यों फ्लॉप फिल्मों के हीरो को ‘जंजीर’ में लेकर रिस्क लेते हो। हीरो चेंज कर लो। लेकिन प्रकाश मेहरा ने अपना निर्णय नही बदला, वे अपने फैसले पर कायम रहे। टस से मस नही हुए क्योंकि पहली शूटिंग के बाद उन्हें विश्वास हो गया था कि अमिताभ ही ठीक हैं।

फिल्म की शूटिंग चलती रही। प्रकाश मेहरा को उनके दोस्त समझाते रहे लेकिन शूटिंग आगे और आगे बढ़ती रही। और प्रकाश मेहरा फिल्म कम्पलीट करके ही मानें।

और फिर ‘जंजीर’ प्रदर्शित हुई। और सौभाग्य देखिए। (यहां मेरे नाटकों का सीन चेंज हुआ हैं) फिल्म हिट हो गई। और इस एक फिल्म ने मुझे एक सफल कलाकार के रूप में स्थापित कर दिया, और मैं रातों रात टॉप का स्टार बन गया। सब अमिताभ को टॉप का आर्टिस्ट कहने लगे।

मैं मन ही मन हंसता कि वाह ! क्या पहले अमिताभ में प्रतिभा की कमी थी। अब अन्य निर्माता भी पुन: मेरी ओर आकर्षित होने लगे। सबका ध्यान मेरी ओर है, लेकिन अब मै सचेत हूं। और बड़े संयम और सचेतन अवस्था में चुन-चुनकर फिल्में साइन कर रहा हूं, ताकि मेरे प्रशंसको को निराशा न हो। मै यह उल्लेख करना नही भूलूंगा, कि मेरे प्रारम्भिक समय के (यानी पहली फिल्म के समय से) प्रशंसक आज भी मेरे साथ हैं असफलता के दिनों में भी उन्होंने मेरा साथ नही छोड़ा था। तब भी वे पत्र लिखते थे और अब भी। जब ‘जंजीर’ के बाद ‘कसौटी’‘बेनाम’ हिट हो गई, वो तब भी मेरे साथ थे।

मायापुरी के द्वारा एक बात मैं अपने प्रशंसकों से कहना चाहता हूं कि हर कलाकार कोई खुदा नही होता, वह भी आप जैसा ही इंसान है और मैं तो बिल्कुल आप जैसा ही हूं फिल्मों मैं आने से पहले मैं दिलीप कुमार और वहीदा रहमान का जबरदस्त फैन था। दिलीप कुमार की एक झलक देखने के लिए मै बैचेन रहता हालांकि बाद मैं मेरी यह इच्छा पूरी भी हुई। और फिर आप सभी की इच्छाएं मैं भी तो पूरी करता हूं अपने आटो ग्राफ भेजकर, फोटो भेज कर, आपके सवालों के जवाब देकर..

और मेरे ख्याल से मैं काफी कुछ कह गया, अत: अपनी बात यही खत्म कर रहा हूं। और अब मुझे याद आ रही हैं वही पंक्तियां

हो न जाय पथ में रात कही,

मंजिल भी तो है दूर नही,

यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी-जल्दी चलता है, दिन जल्दी जल्दी ढलता है।


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Mayapuri

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