निर्माता निर्देशक बी.आर चोपड़ा और राहत जान

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मायापुरी अंक 41,1975

लाहौर की फिल्मी यादों का क्या कहना। उन दिनों की दिलचस्प बातों का जिक्र करते हुए नंदलाल ऐश ने लिखा है आज के प्रसिद्ध फिल्म निर्माता निर्देशक बी.आर.चोपड़ा उन दिनों लाहौर की प्रसिद्ध सिने पत्रिका ‘सिने हेरल्ड’ के सम्पादक थे और साथ में नार्दन इंडिया स्टूडियोज में पब्लिसिटी ऑफिसर बन कर फिल्म निर्माण में गहरी दिलचस्पी लेने लगे थे।

इसी स्टूडियो की एक प्रसिद्ध पंजाबी फिल्म थी ‘गवांढी’ जिसके गीतकार थे सोहन लाल साहिर जो उस फिल्म में एक महत्वपूर्ण भूमिका भी कर रहे थे।

‘गवांढी’ फिल्म का यूनिट कुछ बाग बगीचों में रोमांटिक दृश्य फिल्माने के लिए कपूरथला गये हुए थे। शायर सोहन लाल साहिर वहीं के थे। उन्होंने दिन भर की शूटिंग के बाद जब यूनिट के थके मांदे लोगों को आराम की जरूरत थी, सबको अपनी ओर से निमत्रंण देते हुए कहा, “आप जानते हैं आप मेरी नगरी में आये हैं। मैं आज आपका स्वागत करूंगा। शाम को सूरज ढलने के साथ ही मैं आपकी मुलाकात कपूरथला की ‘राहत जान’ से कराऊंगा।“

‘राहत जान’ का नाम सुनते ही पब्लिसिटी ऑफिसर बी.आर.चोपड़ा जो उस वक्त जवानी के जोश में थे कुछ और जोश में आ गये। वे फौरन ही ड्रेसिंग रूम में गये, शेव बनायी, नहाये धोये और कपड़े बदल कर जब छैल छबीले बन कर बाहर आये तो सभी लोगों को आश्चर्य हुआ।

शाम हुई तो सभी लोग मेज के चारों ओर डट गए साहिर साहब कुछ बोतलें ले आये, और शराब का दौर शुरू हुआ। सब के साथ चोपड़ा साहब ने भी जाम चढ़ाया किन्तु वह कुछ परेशानी से लगातार दरवाजे की ओर देख रहे थे जैसे उन्हें किसी की प्रतीक्षा हो। जब दूसरे दौर में भी उनकी प्रतीक्षा समाप्त न हुई तो साहिर साहब ने पूछा, “चोपड़ा जी, आप किसी की राह देख रहे हैं? इस पर उन्होंने साहिर साहब के निकट आकर कान में कहा, तो क्या ‘राहत जान’ नही आयेंगी?” इस पर साहिर साहब ठहाका मारकर जोर से हंस पड़े, और फिर सबके सामने मुखातिब होकर कहने लगें, “चोपड़ा जी, आप एक जाम तो चढ़ा चुके हैं, दूसरा हाजिर है। आपको और कौन सी ‘राहत जान’ चाहिए?” यह कहना था कि हाल में हास्य का फव्वारा छूट गया। दरअसल कपूरथला की खास शराब का ही नाम था ‘राहत जान’ इस पर चोपड़ा साहब खीसें निपोरते हुए दूसरा जाम भी चढ़ा गये।

और उसी प्रसंग के साथ प्रसिद्ध फिल्म निर्माता निर्देशक बी.आर. चोपड़ा के आज के व्यक्तित्व और कृतित्व को देखते हैं तो कितना अंतर पाते हैं! अब तो लगता है बी.आर. चोपड़ा किसी का इंतजार नही करते बल्कि उनकी ‘राहत जान’ फिल्मों का इंतजार दर्शक करते हैं। उनकी फिल्में आम दर्शकों को थकान मिटाने के लिए, मानसिक क्लांति दूर करने के लिए, मन को गुदगुदाने के लिए जाम की तरह हैं जिन्हें हम ‘राहत जान’ कह सकते हैं।

बी.आर. चोपड़ा पहले फिल्म ‘जर्नलिस्ट’ और ‘पब्लिसिस्ट’ हैं जो जीवन के भीषणतम संबंधो से जूझ कर चोटी के फिल्म-निर्माता और निर्देशक बने हैं।

इसे भाग्य कहिये या फिर संघर्ष को विजय

लाहौर से मुंबई आने पर चोपड़ा जी के आकांक्षी मन में फिल्म-निर्माता बनने की बड़ी आकुलता-व्याकुलता थी। वह लाहौर से बहुत कुछ सीख कर आये थे। यहां आते ही उन्हें कुछ साथियों का सहयोग मिला और उन्होंने बड़ी लगन से ‘करवट’ नाम की फिल्म का निर्माण किया। पर सिर मुंडाते ही ओले पड़े। वह फिल्म ऐसी चौपट हुई चोपड़ा जी चौपट ही गये और उनके लिए चैन की करवट लेना मुश्किल हो गया। उन दिनों के संघर्ष की याद करते हुए चोपड़ा जी कहते हैं, ‘करवट’ ने मुझें एक दम बेकार कर दिया। पत्नी के सारे जेवर बिक गये। रोजी-रोटी के वास्ते कई छोटे मोटे धंधे करने पड़े। जीवन की गाड़ी चलाने के लिए रोज कुंआ खोदना पड़ता था।“

चोपड़ा जी की जगह कोई दूसरा आदमी होता तो इतनी जबरदस्त मार खाने के बाद फिर कभी भूल कर भी दुबारा फिल्म नही बनाने का नाम न लेता। पर ‘करवट’ की असफलता से उन्होंने कई सबक सीखें, और उन्हीं को अपना संबल बना कर किसी हिस्सेदार की मदद से ‘अफसाना’ फिल्म का निर्माण करने के साथ उसका निर्देशन भी किया। उन्हें आशा थी कि फिल्म सैट पर आते ही बिक जायेगी पर चूंकि वह पहली बार फिल्म निर्देशक बने थे इसलिए वितरकों ने बड़े नखरे दिखाये। चोपड़ा जी फिर भी हतोत्सहित नहीं हुए क्योंकि उन्हें अपनी ‘राहत जान’ पर पूरा भरोसा था। इस फिल्म में उन्होंने अपनी किस्मत की सबसे बड़ी और अंतिम बाज़ी लगा दी थी, आखिर संघर्ष में विजय हुई।

भाग्य भी मुस्कुराया और अफसाना ने सिल्वर जुबली मना कर बी.आर. चोपड़ा का सिक्का पूरी फिल्म इंडस्ट्री पर ऐसा जमा दिया कि उनकी साख अब तक बनी हुई है। इस फिल्म की सफलता के बाद चोपड़ा जी के भीतर से एक नये व्यक्ति का जन्म हुआ। वह व्यापारी से बौद्धिक बने, और एक नये निर्मात निर्देशक का जन्म हुआ जो जिंदगी के अनुभवों के आधार पर नई मान्यताओं को लेकर आगे आया।

नये विचारों, नई धारणाओं और नई मान्यताओं को लेकर फिल्मी जीवन में प्रवेश करने वाले बी.आर.चोपड़ा फिल्मों के माध्यम से सामजिक उद्देश्य की पूर्ति करना चाहते थे। वह चाहते थे कि फिल्में सफल भी हों और उनके माध्यम से समाज में सामाजिक चेतना की नई लहर भी उठेवह इस भ्रांत मान्यता को समाप्त कर देना चाहते थे कि केवल फार्मूला फिल्में ही सफल होती हैं

अफसानासफलता के बाद चोपड़ा जी सामाजिक चेतना के प्रहरी बन गये। समाज को पैगाम देने वाली उनकी पहली फिल्म थी ‘एक ही रास्ता’ उस फिल्म की कहानी में न केवल नवीनता थी, बल्कि उसमें क्रांतिकारी विचारों का समावेश भी था। पति के मृत्यु हो जाने के बाद अपनी परिस्थितियों के सामने आत्म समर्पण करती हुई विधवा दूसरी शादी कर लेती है पर उनका बच्चा उस नये पुरुष को अपने पिता के रूप में स्वीकार नही कर पाता। कितनी गूढ़ एवं भावुक सामाजिक समस्या को उन्होंने प्रस्तुत किया था इस फिल्म की सफलता के बाद उन्होंने महत्वपूर्ण फिल्म बनाई ‘साधना’ जिसमें एक पतित नारी के उत्थान की बड़ी मार्मिक और सजीव कहानी थी। उसमें भावात्मक एवं नाटकीय घटनाओं के साथ बताया गया था कि वेश्या जब तक कोठे पर है वह वेश्या है अन्यथा वह भी एक नारी है।

‘नया दौर’ तक आते-आते चोपड़ा जी और अधिक आधुनिक हो गये। इस फिल्म मैं उन्होंने मशीन युग के क्रूर प्रहारों से पीड़ित मानवीय भावनाओं के नव संस्कार के लिए नया संदेश दिया कि मशीन आदमी के लिए है, आदमी मशीन के लिए नही। इस फिल्म ने भी अन्य फिल्मों की तरह सफल होकर सिल्वर जुबली मनायी।

इस तरह कुछ ही दिनों में, फिल्मों की गुणवता और व्यावसायिक सफलता से बी.आर. फिल्म्स का सिल्वर जुबली बैनर ऊंची चोटी पर गर्व के साथ फहराने लगा। इसी संस्था के अंतर्गत उनके छोटे भाई यश चोपड़ाभी कुशल निर्देशक के रूप में महक उठे। इसी बैनर के अंतर्गत उनके निर्देशन में बनी पहली फिल्म थी ‘धूल का फूल’ इस फिल्म में ह्रदय स्पर्शी भावनाओं से उद्धेलित अविवाहित मां और अवैध बच्चे की मानवीय समस्या को इस रूप से प्रस्तुत किया गया कि दर्शकों को सारी सहानुभूति उस मां और बच्चे के प्रति उमड़ पड़ी।इस फिल्म ने सफलता के नये मापदंड स्थापित करते हुए सामाजिक मूल्यों के पुनर्वालोकन को दिशा में सूक्ष्म रूप से योगदान भी दिया।

धार्मिक हठधर्मो पर बी.आर. चोपड़ा ने स्व. आचार्य चतुर सेन शास्त्री की साहित्यक कृति ‘धर्मपुत्र’ पर उसी नाम से साहसिक फिल्म का निर्माण व निर्देशन किया।

उसके बाद उनकी ‘कानून’ फिल्म से तो फिल्मी दुनिया में बड़ी हलचल मच गई। लोग उनकी तरह अब फिल्मों के लिये नये-नये विषय ढूंढने लगे। अब नई-नई सामाजिक पृष्ठ भूमियों के आधार पर नये विचारों वाली फिल्में बनने लगीं। बी.आ.आर चोपड़ा ने अपनी सफलतम फिल्मों से यह सिद्ध कर दिया कि रहस्य-रोमांच से ओत प्रोत फिल्मों से भी दर्शकों का मनोरंजन करते हुए समाज को कुछ दिया जा सकता है। ‘हमराज’‘इत्तफ़ाक इस दृष्टि से उनकी विशिष्ट फिल्में रही हैं। बी.आर. फिलम्स की एक और उल्लेखनीय और सफल फिल्म थी आदमी और इंसान जिसका निर्देशन उनके भाई यश चोपड़ा ने किया था।

बी.आर.चोपड़ा ने हर फिल्म के साथ कुछ साहसिक कदम उठायें हैं। किसी फिल्म में नये कलाकारों को मौका दिया तो किसी फिल्म में नई तकनीक के नये-नये प्रयोग किये। ‘इत्तफ़ाक’ उनकी क्वीक फिल्म थी जो कुछ ही दिनों में बनकर तैयार हो गई, लेकिन विषय को देखते हुए उन्होंने उसमें एक भी गाना न रखा। ‘कानून’ में भी केवल बैक ग्राउंड म्यूजिक था। गाने रहित फिल्में बनाने का साहस बी.आर. चोपड़ा जैसे निर्माता-निर्देशक ही कर सकते थे। लोगों को शंका थी कि बिना गानों की फिल्में आम दर्शक को कैसे ग्राह्रा होंगी?पर इस बारे में   बी.आर.चोपड़ा का प्रारम्भ से ही यह मत रहा है कि विषय में दर्शक की दृष्टि बांधने की शक्ति होनी चाहिये। यदि फिल्म की कहानी प्रभावपूर्ण है तो बाकी चीजें गौण हो जाती हैं। भाग्य में अट्टू विश्वास रखने वाले चोपड़ा जी दिलीप कुमार, शर्मिला टैगोर बिंदू जैसे चोटी के कलाकारों को लेकर बनाई गई ‘दस्तान’ बॉक्स ऑफिस खिड़की पर पिट गई तो उन्हें गहरा आघात लगा। इस संबंध में उन्होंने स्वयं आत्म-विश्लेषण करते हुए कहा यह मेरी भूल थी कि मैंने सन 1950 में बनाई ‘अफसाना’ को 20 या 22 के बाद फिर उसे उसी रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की। समय के साथ सब कुछ बदल जाता है, इस बात का ध्यान रखकर फिल्म को नये रूप के साथ पेश किया जाता तो कुछ और बात थी।“

‘दस्तान’ के बाद ‘धुंध’ भी उतनी कामयाब नही हुई जितनी आशा थी। इसी तरह उनके लड़के रवि चोपड़ा के निर्देशन में बनी, हाल ही में प्रदर्शित ‘जमीर’ आजके जमाने की हवा के अनुसार एक्शन फिल्म होते हुए भी दर्शकों के मन को उनकी अन्य फिल्मों की तरह मोहित न कर सकी। इन असफलताओं से चोपड़ा साहब विचलित तो हुए ही होगें। पर कहना है कि ‘जीवन’ में उतार-चढ़ाव तो आते ही रहते हैं। मैं जब किसी कार्य में असफल होता हूं तो उससे हतोत्साहित नही होता। बल्कि चिंतन करता हूं और नई राह खोजने की कोशिश करता हूं।“

बी.आर. चोपड़ा अपनी फिल्मों में व्यस्त रहते हुए भी फिल्म क्षेत्र की समस्याओं के हल की दिशा में हमेशा अग्रणी रहे हैं। वह निर्माताओं के सभी प्रमुख संगठनों से प्रारम्भ से ही सम्बंधित हैं और फिल्म जगत के नेता के रूप में उन्होंने समय समय पर फिल्म वालों का सही नेतृत्व भी किया है।

चोपड़ा जी सुलझें विचारों के फिल्म निर्माता हैं, निर्देशक हैं, कहानीकार हैं, मार्गदर्शक हैं, नेता हैं और सर्वापरि भावुक इंसान है जो हमेशा संघर्ष करने वालों की सहायता करते हैं।

चोपड़ा जी फिल्मों के ही नही, कलाकारों के भी निर्माता रहे हैं उनके सरंक्षण में न जाने कितने नये निर्माता-निर्देशक बहुत कुछ सीख कर आगे आये और न जाने उन्होंने कितनी नई प्रतिभाओं को प्रोत्साहन देकर उन्हें शीर्षस्थ स्थान पर पहुंचा दिया। इस दिशा में उनके द्वारा की गई सेवाओं का सही मूल्यांकन करने के लिए अलग से विस्तृत विवेचना करनी होगी।

अंत में हम इतना ही कह सकते हैं कि बी.आर. चोपड़ा एक नही एक अनेक हैं। और सब में उनको अपनी अपनी विशेषताएं हैं।


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Mayapuri

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