मुंशी से निर्माता बने व्हीं शांताराम

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045-25 Shantaram

 

मायापुरी अंक 45,1975

एक वकील के पास एक नया मुवक्किल आया। और आते ही अपना केस बयान कर डाला केस सुनकर वकील ने कहा मैं इसके पांच सौ रूपये लूंगा।

मुवक्किल किसी अजीब किस्म की परेशानी में गिरफ्तार था। उसने पांच सौ रूपये गिनकर वकील साहब के मुंशी के हवाले कर दिये। वकील के मुंशी ने मुवक्किल की ओर देखा ओर कहा, पचास रूपये मुझे अदा कीजिए।

मुवक्किल बोला, हर्गिज नही मैं वकील साहब को सौ रूपये दे दूंगा लेकिन तुम्हें एक पाई भी नही दूंगा।

यह सुनकर मुंशी की गुस्से से आंखे सूर्ख हो गईं। बोला, जब तक आप मेरे पैसे अदा न करेंगे आपका केस मुकम्मिल नही हो सकेगा। केस के सारे कागजात आखिर तो मेरे ही पास आएंगे।

मुवक्किल ने और सौ रुपये निकाले और वकील साहब को दे दिये और कहा, इसे भी अपनी फीस समझिये।

जिद्दी मुवक्किल के जाने के पश्चात मुंशी ने वकील से कहा, 30 प्रतिशत के हिसाब से फीस के मुझे साठ रुपये दीजिये।

वकील को इकट्ठे दो सौ रुपये इस प्रकार कभी मिले न थे।उसकी नीयत खराब हो गई और उसने मुंशी को पैसे देने से इंकार कर दिया। मुंशी ने तुरंत हमेशा के लिए सलाम किया और नौकरी छोड़कर चलता बना।

आज वह मुंशी फिल्म इंडस्ट्री की नाक समझे जाते हैं जिन्हें उनकी सराहनीय सेवाओं के लिए‘चित्न पति की उपाधि से अलंकृत किया जा चुका है। जी हां, वह व्यक्ति हं वी, शान्ताराम जिन्होंने ‘आदमी’’शकुंतला’’पड़ोस’’दुनिया न माने’’डॉक्टर कोटनिस की अमर कहानी’’दहेज’‘तीन बत्ती चार रास्ता’’दो आंखे बारह हाथ’’झनक झनक पायल बाजे’’स्त्री’’जल बिन मछली’’नृत्य बिन बिजली’ जैसी गौरव प्रधान फिल्में बनाई हैं


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Mayapuri

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