फार्मूला फिल्में बनाने का जिम्मेदार कौन ?

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मायापुरी अंक 14.1974

फार्मूला’ को जब फिल्म के सन्दर्भ में लिया जाये तो उसका अर्थ होगा सात-आठ गाने, दो-चार रेप सीन, कैबरे, मुजरा, कुश्ती, विदाई-विछोह, सुखान्त मिलन वगैरह-वगैरह। इसमें कहानी की जरूरत नही पड़ती क्योंकि ‘कहानी’ नाम की वस्तु को अधिकांश निर्माता जानते नही या समझते ही नही, बल्कि जानने-समझने की जरूरत ही महसूस नही करते क्योंकि फार्मूला अपने-आप में एक कहानी है। जिसे निर्मातागण कुत्ते के कान बिल्ली को और बिल्ली के कान चूहे को लगा कर विभिन्न तरीकों से पेश करते है। फार्मूला को ‘भेड़ चाल’ के रूप में भी लिया जा सकता है। किसी एक विचार पर बनी फिल्म को सफलता मिली नही कि उस फिल्म का थोक के भाव अन्धानुकरण आरम्भ हो जाता है। और फिर दर्जनों फिल्में इसी एक विचार या विषय पर बन कर चली आती है। नमूने के तौर पर जेम्स बांड टाईप ‘फर्ज’ को सफलता मिली नही कि ‘स्पाई इन रोम’ ‘नसीहत’ ‘जानी मेरा नाम’ ‘नफरत’ जैसी तोड़-फोड़ और विध्वंसात्मक प्रवृति को बढ़ावा देने वाली फिल्मों की कतार लग गयी।

लेकिन एक प्रश्न यह भी उठाता है कि क्या फार्मूला फिल्मों के जिम्मेदार या दोषी सिर्फ निर्माता ही है? ताली कभी एक हाथ से नही बजती। लिहाजा एक पक्षीय निर्णय देना न्याय नही होगा।

वास्तव में फार्मूला फिल्मों के बनने में हमारा अर्थात दर्शक वर्ग का भी बहुत बड़ा हाथ है। आपसे पूछा जाये कि आप फिल्म क्यों देखते है तो मिलेगा, मनोरंजन के लिये ‘रिलेक्शन’ के लिये मनोरंजन वास्तव में निहायत जरूरी भी है। इस स्थिति में दर्शक मस्तिष्क पर अधिक जोर देना नही चाहते। प्रोड्यूसर दर्शक की इस मनोवृति से अच्छी तरह वाकिफ होता है। लिहाजा वह (निर्माता) भी अपने दिमाग का कम से कम उपयोग या दुरुपयोग करने की गरज से केवल उसी फिल्म को बनायेगा जिसमें दर्शक उन दृश्यों को देखकर मनोरंजन कर जिसकी (दृश्यों) केवल कल्पना ही की जा सकती है, यथार्थ में ऐसा कभी घटित न हो नमूने के लिए फिल्म का हीरो सरे बाजार हीरोइन की कमर में चिकोटी काटता है। वह उसे गुस्से से खा जाने वाली निगाहों से देखती है। हीरो को आनन्द आता है और वह चीख-चीख कर गाने लगता है “यह जवानी, है दीवानी रुक जाओ रानी उसकी इन तमाम अश्लील हरकतों पर हीरोइन रीझ उठती है और दुनिया व समाज की सारी लोक लाज, शर्म-हया को तिलांजलि देकर सीधे हीरो की बाहों में दा समाती है। जरा सोचिये, आप ऐसा करना चाहें और तिस पर लड़की से यह अपेक्षा करें कि वह भी फिल्म की हीरोइन जैसा करे, तो जानते है क्या हश्र होगा ! यही न कि, अगर आगरा या रांची के पागलखाने न भेजे गये तो कम से कम हवालात की सैर का आनन्द तो जरूर ही प्राप्त कर सकते है।

फार्मूला फिल्मों के चलने की एक वजह अशिक्षा भी है। हमारे समाज का एक बड़ा वर्ग जो शिक्षित नही है, मार-धाड़, मुजरे और प्यार-मोहब्बत भरी फिल्में पसन्द करता है। उसे इस बात से कतई मतलब नही की हीरो किस फौलाद का बना है। उसे इसी में मजा आता है कि धर्मेन्द्र ने कैसे दस लठैतों या अस्त्र-शस्त्र से लैस डाकूओं या गुण्डों का मिनटों में सफाया कर डाला। रेखा ने कैसे कमर ठुमका ठुमका कर और शरीर के अंगों को भद्दे ढंग से हिलाकर मुज़रा पेश किया।

समाज का एक अन्य अंग, विधार्थी या नौजवान वर्ग, भी फार्मूला फिल्मों के लिये जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। इस वर्ग को विध्वंसात्मक, सनसनीखेज, रोमान्स आदि से परिपूर्ण घटनाओं से लगाव है। यही वजह है कि फिल्मों के चरित्र मार-पीट, तोड़-फोड़, प्यार मोहब्बत आदि की कार्यवाहियों अधिक करते है, कैबरे बलात्कार के दृश्यों में भी इस वर्ग की गहरी दिलचस्पी रहती है। ऐसी फिल्मों के चरित्रों के हाव-भाव के अनुकरण का उदाहरण, आजकल नौजवानों को शत्रुघ्न सिन्हा स्टाईल संवाद झाड़ते, लड़कियों पर फिल्मी हीरो की तरह घटिया किस्म के अश्लील फिकरे कसने और उपद्रवों आदि की शक्ल में देखा जा सकता है।

कुछ दर्शक सितारे प्रेमी होते है। मसलन किसी हीरो, हीरोइन, विलेन, मसखरे आदि की कोई फिल्म ज्यादा चल गयी तो जनता उस विभूति की प्रेमी बन जाती है कोई दिलीप कुमार की एक ही फिल्म पच्चहत्तर दफे देखकर भी नही झुंझलाता तो कोई राज कपूर पर दिलो जान से फिदा है देवानन्द भले चौवन साल का बूढ़ा हो चुका है लेकिन उस पर मरने वाले आज भी उसकी फिल्म को पहले ही दिन देखने पर अमादा रहते है। यही कारण है कि देवानन्द की फिल्में बॉक्स ऑफिस की खिड़की भले ही न तोड़ सके लेकिन किसी तरह चार हफ्ते तो चल ही जाती है। कोई राजेश खन्ना या चिन्टू की तरह बाल संवारता है तो बेशक उसका मनपसन्द सितारा होगा। हेमा मालिनी या जीनत अमान या नीतू सिंह की तस्वीर जड़ित लॉकेट वाली माला को गले में बांधे हुए काफी प्रेमी मिल सकते है। डिम्पल की शादी हो जाने तथा फिल्मों से सन्यास ले लेने के बावजूद भी कई लोग उसके नाम की माला जपते देखे जाते है। नही तो ‘बॉबी’ सिनेमा भवनों पर पचास सप्ताह तक कैसे ठहरती ? ऐसे प्रेमी या दीवाने दर्शक अपने ‘चहेतों’ की बकवास फिल्म को भी अन्य लोगों से देखने की पुरजोर सिफारिश पेश करते है, जबरदस्ती सिनेमा हाल पर धकेल लायेंगे, और कभी-कभी अपनी जेब से टिकट खरीद कर भी अन्य को फिल्म देखने पर मजबूर करते है, भले ही एक वक्त का भोजन त्यागना क्यों न पड़े।

महिला वर्ग भी फार्मूला फिल्मों को बढ़ावा देने में कतई पीछे नही है। इस वर्ग की कुछ नायकों-खलनायकों की ‘पर्सनेल्टी’ (व्यक्तित्व) इतनी भाती है कि मन ही मन वे अपने शौहर, प्रेमी या होने वाले पतिदेव में उस व्यक्तित्व के गुणों को खोजने लगती है। राजेश खन्ना की रद्दी से रद्दी फिल्म के सुपर हिट होने का राज यही था। आजकल ‘ही मैन’ धर्मेन्द्र के सितारों की बुलन्दी को भी यही वजह है और शायद अब आने वाला कल चिन्टू (ऋषि कपूर) का है हीरोइनों द्धारा अपनाये गये हेयर स्टाइल, पोशाक, स्वेटर, आभूषण, सैंडिल आदि के माप डिजाइनों के लिये भी महिला वर्ग फार्मूला फिल्मों को बार-बार देखता है क्योंकि कलात्मक फिल्मों के कलाकारों को देखकर नाक-भी सिकोड़ने से इन्हें फुर्सत नही मिलती।

एक ऐसा दर्शक वर्ग भी है जो कभी-कभार फिल्म देखता है इस वर्ग मै बच्चे बूढ़े, स्त्री-पुरूष, जवान-अधेड़ आदि तमाम लोग सम्मिलित है। चूंकि यह वर्ग महीने, दो महीने पीछे फिल्म देखने जाता है अत: इस वर्ग का मुख्य उद्देश्य केवल मनोरंजन ही होता है। इस वर्ग की अपनी ‘आईडियोलोजी’ (केवल फिल्म से सम्बन्धित) या ‘विचार धारा’ नही होती, कोई ‘व्यू भी नही होता। जैसे किसी ने अमुक फिल्म की तारीफ कर दो तो महोदय झट परिवार सहित फिल्म देख आयेंगे ये वर्ग उस फिल्म को देखते है जिसके गीत रेडियो पर दिन में बहत्तर दफे बजते हो, आये दिन रेडियो प्रोग्राम भी होते रहते हो, आसानी से टिकट उपलब्ध न होता हो, चार दिन पहले एडवान्स बुकिंग पर धक्के खाने में आनन्द मिलता हो तथा कई बड़े सितारों को एक साथ एक ही फिल्म में देखने की हसरत पूरी होती हो।

बच्चा वर्ग के लिए फिल्म देखना, मेले या नुमाईश में जाने से कम नही है। उनके लिये तो फिल्म देखना एक अजूबा है। अक्सर देखा जाता है कि ये वर्ग बड़े लोगों की बातों में उस समय काफी दखल रखता है जब उनमें (बड़े लोगों में) फिल्मी बातों का दौर चल रहा होता है। और फिर आजकल तो बच्चों के दांत पीछे निकलते है और ‘पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले’ ‘दम मारो दम’ ‘हमतुम इक कमरे में बन्द हों और चाबी खो जाये’ वगैरह-वगैरह पहले अत: मां-बाप अपने लाड़ले लाड़लियों को ऐसी फिल्में दिखाना ज्यादा पसन्द करते है जिसमें कार्टून अर्थात हास्य अभिनेता अपनी बेवकूफियों से हंसाता हो। बड़े बड़ो का दिमाग का दिवाला निकाल देने और लेटो अरस्तु के दार्शनिक विचारों को मात कर देने वाला एक अद्ढ़ फिल्मी बच्चा हो या इंसान की बुद्धि से कही अधिक बुद्धि वाला कुत्ता, हाथी, घोड़ा, बकरी, बिल्ली, चूहा, शेर, गाय, हिरन, सांप, छछून्दर, चींटी, मक्खी, गधा आदि पशु-पक्षी हो.

इन विभिन्न वर्गों के लिये अलग अलग फिल्म बनाना निर्माता के लिए लगभग असम्भव सी बात है, ऐसा इसके लिये सोचना या कल्पना करना ही नरक समान है। निर्माता इस बात का खतरा लेने से घबराता है कि यदि एक वर्ग के लिये फिल्म बना ही बैठे और फिर उस वर्ग को पसन्द न आई तो यह तो ही उसे मजबूर करता है कि ऐसी फिल्म बनाओ या ‘तमाशा’ लगाओ कि हर वर्ग का व्यक्ति उसे देखने आये। किसी न किसी को तो ‘तमासा’ भायेगा ही

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Mayapuri