कुलदीप कौर एक बिन्दास औरत

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मायापुरी अंक 17.1975

श्याम बड़े सुन्दर और आशिक मिजाज आदमी थे। उनकी सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वह दोस्तों पर जान छिड़कते थे। उनकी और प्राण की दोस्ती लाहौर से चली आ रही थी। लाहौर में ही श्याम की कुलदीप कौर से दोस्ती हुई थी। यह दोस्ती शादी में बदलते-बदलते रह गई थी। जबकि श्याम पर कुलदीप मर मिटी थी। वह श्याम पर नियत खराब किए हुए थी और श्याम ताजी को अपनी जीवन-संगिनी बना चुके थे।

भारत के बंटवारे के पश्चात प्राण और कुलदीप मुंबई आ गए। श्याम उन दिनों मुंबई में ही काम कर रहे थे। वह उर्दू के प्रसिद्ध लेखक शाहदत हसन मंटो के साथ रहते थे। उनका ताजी से झगड़ा चल रहा था। ताजी के कारण ही कुलदीप श्याम से नाराज हुई थी। इसमें उन्हौंने अपना अपमान समझा था। श्याम ताजी से झगड़े के पश्चात कुलदीप से दोस्ती करने के बड़े इच्छुक थे। कुलदीप चूंकि एक हठीली औरत थी इसलिए वह अपनी इच्छा के विरूद्ध श्याम से दूर भागती रही।

श्याम, मंटो और कुलदीप उस जमाने में टॉकीज मलाड़ में काम करते थे। एक संध्या तीनों काम से फारिंग होकर बिजली की ट्रेन से अपने-अपने घर वापस जा रहे थे। क्लास का पूरा डिब्बा खाली था। उन तीनों के सिवा अन्य कोई मुसाफिर उसमें न था। श्याम जो बड़े मुंह फट इंसान थे। उन्हौंने समय का पूरा लाभ उठाते हुए कुलदीप से छेड़खानी शुरू कर दी। जिसका मुख्य उद्देश्य यही था कि कुलदीप वह रिश्ता जो लाहौर मैं होते-होते रह गया था फिर से श्याम से जोड़ ले।

कुलदीप ने तेज निगाहों से श्याम की ओर देखा और बोली मुहं धोकर रखिये श्याम साहब

श्याम ढीठ आदमी थे। उन पर वाक्-पटुता का भला क्या असर होता। उन्हौंने एक ठहाका लगाया और कहा। तुम लाहौर में मुझ पर मरती थी, याद नही तुम्हें?

कुलदीप ने भी ठहाका लगाया जिसमें भारी का व्यंग्य भरा था। “आपको बहम हो गया था

“तुम गलत कहती हो, तुम वास्तव में मुझ पर मरती थी। श्याम ने तिलमिलाकर कहा।

कुलदीप में आत्म-समर्पण की इच्छा मौजूद थी। लेकिन चूंकि वह हठी स्वभाव की थी इसलिये अपनी कामना को दबाते हुए बोली “मरती थी लेकिन अब नही करूंगी”

“अब नही मरोगी तो कल मरोगी मरना तुम्हें बहरहाल मुझ पर ही है। श्याम ने अपनी उसी फंटूश मुद्रा में कहा।

कुलदीप यह सुनकर भिन्ना गई। श्याम से बोलीं, आखिरी बार सुन लो तुम्हारा मेरा कोई संबंध नही हो सकता। तुम इतराते हो। हो सकता है, लाहौर मे कभी मेरी तबियत तुम पर आई हो लेकिन जब तुमने बेरूखी बरती तो मैं तुम्हें क्यों मुंह लगाऊं? अब इस किस्से को खत्म करो।

किस्सा खत्म हो गया किन्तु सिर्फ कुछ समय के लिए क्योंकि श्याम बहस और वाद-विवाद के अभ्यस्त नही थे।

एक दिन शाम को बियर पीने के पश्चात श्याम अपने दोस्त मंटो के साथ कुलदीप कौर के यहां जा पहुंचे। हल्का-हल्का नशा छाया हुआ था। वहां फ्लैश खेलने बैठ गए। प्राण भी वहां बैठे हुए थे। प्राण कुलदीप के अलावा श्याम और मंटो के भी कामन फ्रैन्ड थे। पत्ते प्राण ही बांटते और वही उठाते। इस तरह कोई पन्द्रह मिनट में मंटो पचहत्तर रुपये हार गये। श्याम ने जब यह रंग देखा तो बोले मंटो अब बंद करो।

प्राण ने बताया कि उन्हौंने चालाकी से यह रूपये जीते हैं। और चूंकि वह दोस्ती में धोखे को अच्छा नही समझते इसलिए वापस कर रहे हैं। फिर उन्हौंने वह भेद बताया कि वह पत्ते जमाकर खेलते थे कि बड़े पत्ते उनके पास ही जाते थे। और वह हर बारी जीत जाते थे। इस तरह उन्हौंने मंटो को पैसे वापस लेने पर मजबूर कर दिया किन्तु कुलदीप ने पैसे लौटाने से इंकार कर दिया। श्याम जलकर कबाब जेसे हो गये। प्राण कुलदीप से नाराज होकर चले गये। श्याम थोड़ी देर कुलदीप से बातें करते रहे। फिर बोले चलो सैर को चले। और कुलदीप सैर के लिए तुरंत राजी हो गईं। क्योंकि वह बहुत जल्दी तंग आने वाली औरत न थी। और न ही वह किसी मर्द से घबरातीं थी। उन्हें अपने पर पूरा पूरा भरोसा था।

श्याम, कुलदीप और मंटो पहले क्लेचर रोड आये जहां श्याम और मंटो रहते थे। क्लेचर रोड पर कुलदीप ने गाड़ी रुकवाई और स्टोर में घुस गईं। श्याम को बड़ा गुस्सा आया कि अब मंटो प्राण के द्वारा जीते हुए रुपयों से उनके सामने ही खरीदारी करेगीं। मंटो उन्हें समझा बुझाकर स्टोर में चले गये। स्टोर से कुलदीप ने ‘पार्डले’ सैंट की एक शीशी खरीदी। जिसकी कीमत उन दिनों बाईस रुपये आठ आने थी। उन्हौंने पैसे मंटो से दिलवाये। और मंटो बेचारें मुफ्फात मे ‘बकरा’ बनगए। बाद में श्याम को जब यह बात मालूम हुई तो वह गुस्से से आग बबूला हो गये और उन्हौंने मंटो और कुलदीप को खूब जी भरकर गालियां दी। श्याम का मकसद कुलदीप को शीशे में उतारना था। मंटो ने भी श्याम की और से फील्डिंग की और कुलदीप पिछली बातें भुलाकर समझौता करने के लिए राजी हो गईं। दोनों वहां से होटल चले गए।

मंटो दोनों को जाता देखकर खुश थे किन्तु उनकी यह खुशी क्षणिक भर ही रही। थोड़ी देर में उन्हौंने देखा श्याम पलट आये हैं। उनका हाथ घायल था और खून बह रहा था। मंटो ने हैरानी से श्याम की ओर देखा और उन्हें ब्रांडी का एक गिलास दिया। उसके बाद श्याम ने बताया कि होटल पहुंचते ही वह अनजान सी बन गई। इस पर श्याम को बड़ा गुस्सा आया। दोनों में फिर चोंचे लड़ने लगी। श्याम ने मुक्का तान कर जो मारा तो कुलदीप एक तरफ को हो गई। श्याम का घूसा पत्थर पर पड़ा। वह हंसती ठहाके लगाती ऊपर होटल में गई। श्याम अपना जख्मी हाथ लिए देखता रह गये।

इतना कहने के बाद श्याम ने पतलून की जेब से सैंट की शीशी निकाली और बोले रुपये तो मैं उन्हें वापस न कर सका लेकिन सैंट की शीशी वापस ले लाया हूं।


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Mayapuri

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