“लक्ष्मीकांत प्यारेलाल मेरे अच्छे दोस्त है” – आर.डी. बर्मन

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052-5 rahul dev burman and Amjad

मायापुरी अंक 52,1975

म्यूजिक डायरेक्टर राहुल देव बर्मन से हालांकि मैं दो-तीन बार मिल चुका हूं और जब भी मैं उनसे इंटरव्यू करने की बात करता तो यही कहकर टाल देते

यार आज जाने दो, फिर कभी..

लेकिन आज मैं घर से निश्चय करके निकला था कि आर.डी.बर्मन से किसी भी हालत में आज मिलना ही है। फिल्म इंडस्ट्री के सेंटर दादर जब मैं पहुंचा तो मालूम हुआ कि पंचम (आर.डी वर्मन को उनके करीबी दोस्त प्यार से इसी नाम से ही पुकारते हैं) आज फिल्म सेंटर में फिल्म ‘मजाक’ की रिकॉर्डिंग कर रहे हैं, तो मैं सीधा फिल्म सेंटर पहुंचा। परंतु वहां पर गायक किशोक कुमार के डेढ़ घण्टे देर से आने की वजह से गीत की रिकॉर्डिंग रूकी हुई थी। मैंने देखा कि आर.डी.बर्मन अपने म्यूजिक का सेट-अप जमा करके आराम से बैठे हुए थे। इसी समय मैंने उनसे मिलना उचित समझा और इंटरव्यू के लिए जा घेरा और उनसे अपना पहला सवाल पूछा

अपने आरंभिक जीवन के बारे में कुछ बतालाइये?

इस बार मैंने देखा कि आर.डी. बर्मन ने मेरी बात को टालने की बजाय अपनी अंगुलियों से कुर्सी के हत्थों को तबले की तरह बजाते हुए कहा।

आज मैं आपको वह राज बताने जा रहा हूं जिसे मैं हर एक से छिपाता रहा हूं। ये बात उन दिनों की है, जब मैं कलकता मैं पढ़ा करता था और मुझे संगीत से कोई खास लगाव नही था। पिता जी ने सबसे पहले मुझे तबला सीखने को कहा। मेरे लिए एक उस्ताद बुलाए गए, लेकिन वे बेचारे घर पर मेरा इंतजार करके लौट गए, क्योंकि मैं घर से गायब था। उस समय सोचा करता था कि तबला क्या सीखूं? इसमें कौन-सा रस है। इत्तफ़ाक से एक दिन रेडियो पर किसी का तबला वादन सुना। तब समझ में आया कि तबले में भी एक कशिश है। दूसरे दिन सीथा मैं उन्हीं उस्तादजी के घर पर गया। हाथ-पैर जोड़े मांफी मांगी और तबला वादन सीखना शुरू कर दिया। उस्ताद ने मेरी लगन को देखकर पिताजी, जो उन दिनों मुंबई आ गये थे, उनको खत़ लिखा कि पंचम तबला बड़ी मेहनत से सीख रहा है कुछ दिनों बाद पिता जी कलकत्ता आये। तब एक दिन मकान की छत पर पिता जी, माता जी और मेरी नानी के बीच मेरी बात को ले कर झगड़ा हो गया। पिता जी कहते थे कि मुझे पंचम को मुंबई ले जाने दो, फिर देखा, वो क्या करता है। लेकिन माता जी और नानी जी कहतीं कि लड़का मुंबई गया तो समझो बिगड़ा इसे फिल्मी दुनिया की हवा ना ही लगे तो अच्छा है। खैर काफी देर माथा पच्ची करने के बाद पिता जी ने मुझे एक महीने के लिए मुंबई लाने की परमीशन ले ली. तो इस तरह में पिता जी द्वारा मुंबई लाया गया और फिर पिताजी की देख-रेख में काम करना शुरू कर दिया।

आर.डी.बर्मन अपने शुरू के जीवन की कुछ बातें बताकर खामोश हो गये तो मैंने उनसे पूछा।

आपकी पहली फिल्म कौन-सी थी और उस फिल्म में संगीत-निर्देशक का चांस आपको कैसे मिला?

मेरी पहली फिल्म थी छोटे नवाब मुंबई में आने के बाद महमूद से मेरी पहली मुलाकात हुई थी। हम दोनों के विचार इतने मिलते थे कि हम जिगरी दोस्त बन गए। एक दिन मैं अकेला घर पर बैठा हुआ, हारमॉनियम पर एक धुन यों ही निकल रहा था कि इतने में महमूद आ गये। महमूद को मेरी वह धुन पसंद आई और मुझे पांच रूपए एडवांस देकर, अपनी फिल्म छोटे नवाब में संगीत देने के लिए अनुंबधित कर लिया फिल्म का संगीत और फिल्म अच्छी चल निकली तो मैं भी संगीत-निर्देशक के रूप मे पहचाना जाने लगा। महमूद और मैं खाली समय में जब कोई काम नहीं होता तो (पिता जी ने एक पुरानी फिएट गाड़ी मुझे दे रखी थी) हम दोनों पूरे मुंबई में इधर से उधर घूमा करते थे। एक बार घूमते-घूमते मुंबई से बाहर पूना की तरफ जा निकले बीच जंगल में ही पता नहीं, दोनों का क्या मूड हुआ कि गाड़ी खड़ी करके बाहर निकल आए और जोर-जोर से गायक सी.एच.आत्मा, के.एल सहगल, के.सी. डे आदि की आवाजों में राग अलापने लगे। जब थक गए तो वापस गाड़ी में बैठकर मुंबई आ गए और उसी समय एक धुन मेरे दिमाग में आई थी। जिसे मैंने महमूद की फिल्म ‘पति पत्नी’ में गीत ‘दाने दाने’ पर लिखा है खाने वाले का नाम पर फिट करा दी थी। जिसे सभी लोगों ने पसंद किया था।

महमूद के बारे में तो आपने बहुत कुछ बताया। अब अपने दूसरे साथियों के बारे में कुछ बतालाइए?

आर.डी. मेरे सवाल को सुनकर कुछ सोचते हुए बोले।

मेरे एक अच्छे मित्र हैं, जो आज फिल्मी दुनिया के हर इम्तिहान को पास कर चुके हैं। वे बड़े मशहूर गीतकार, लेखक, संगीतकार, डायरेक्टर, निर्माता और बहुत बड़े गायक हैं। फिल्मी दुनिया की इतनी बड़ी-बड़ी डिग्रीरियां रखते हुए भी कभी-कभी मायूस हो जाते हैं। एक दिन मिले तो कहने लगे यार फिल्मो की हालत खराब हो रही है, मैंने सोचा है कि खंडवा चले जायें और वहां पर खेती करें। गेंहू की खेती करें, बेचें भी और खायें भी? तुम्हारा क्या ख्याल है पंचम? तो मैंने उनसे कहा, भाई, खंडवा जाकर खेतों में हल चलाने की बजाए अगर आप फिल्म इंडस्ट्री में ही हल चलाते रहें तो इसी खेत को काफी अच्छा उपजाऊ बना सकते हैं। ये बेचारा खुद चाहे जिस हालत में रहे पर दूसरों को हंसता हुआ देखना चाहते हैं और यही उनकी महानता है पहचाना, यह महान आदमी कौन है? ये है किशोर कुमार

जीवन में जब भी सुख-चैन के दो पर मिलें तो अपने प्यार करने वालों को अवश्य याद कर लेना चाहिए। अब मैं स्वर्गीय रोशन के बारे में बतलाने जा रहा हूं। रोशन जी हमेशा मुझे कहते रहते थे पंचम अगर तुमने अपने आपको संभाल कर रखा तो ये कला एक दिन तुमको जरूर ऊंचा उठाएगी। और यह सच भी है कि आज मैं उनकी कही हुई बात के सहारे अपने जीवन को सजाने की कोशिश कर रहा हूं। आज अपनी मेहनत का फल जो कुछ भी मुझे मिलता है। उसी पर मैं कुछ भी मुझे मिलता है। उसी पर मैं खुश हूं। मेरे दो और अच्छे साथी, हैं लक्ष्मीकांत प्यारेलाल। इन दोनों से भी मुलाकात बड़े इत्तफ़ाक से ही हुई थी। बात सन 1956 की है। मैंने अपने पिता जी की रिकॉर्डिंग में वायलन बजाते हुए एक लड़का देखा था। जो बिल्कुल ही मेरे कद का, मेरी ही तरह का था। बस अंतर था तो कपड़ो का। मैं बंगाली स्टाइल के धोती कुर्ते में था और वो पेंट शर्ट में न जाने क्यों में उस समय उसकी तरफ खींचता-सा गया। वह लक्ष्मीकांत था फिर लक्ष्मीकांत ने अपने साथी प्यारे लाल से मिलवाया। प्यारे लाल उन दिनों मेंडोलियन बजाया करते थे। उसके बाद मुलाकातों पर मुलाकातें होती रहीं और हम लोग दोस्ती के अटूट धागे में बंध गये। आज लक्ष्मीकांत प्यारेलाल अपनी मेहनत और लगन के बल पर ही इस पॉजिशन पर पहुंचे हैं।

मैंने उनसे पूछा।

यह बात कहां तक सच है कि आप विदेशी संगीत का सहारा लेकर संगीत तैयार करते हैं?

मेरे एकाएक यह प्रश्न पूछने पर पंचम कुछ चौंका फिर चश्मे को साफ करते हुए बोले,

जिन गीतों को आप सुनकर खुश होते हैं, लेकिन उस संगीत को तैयार करने में संगीतकार को अक्सर कई रातों जागना पड़ता है, खाना पीना छोड़कर उसे बस उस गीत की धुन के पीछे लगा रहना पड़ता है। तब कहीं जाकर वह एक अच्छी धुन बना पाता है। हां, यह बात अवश्य है कि मैं अपने संगीत में विदेशी संगीत की स्टाइल रखता हूं। इस स्टाइल में मैंने अनेक ऐसे सफल प्रयोग भी किये हैं, जिन्हें सभी लोगों ने पसंद किये हैं। इसी बात से संबधित एक वाक्य मुझे याद आया। एक बार मैं नासिर हुसैन साहब की फिल्म ‘बहारों के सपने’ के एक समूहगान की रिकॉर्डिंग कर रहा था उस समय गाने में कुछ कर रहा था उस समय गाने में कुछ कमी मुझे भी लग रही थी और नासिर साहब को भी इतने में मुझे एक नई बात सूझी तो मैंने कहा अगर लता जी से.. आ..अ..अ (गाकर) कहलवा दिया जाये तो कैसा रहेगा? मेरी बात उनको बहुत पसंद आयी और फिर वह गाना भी अच्छा लोकप्रिय हुआ।

अब अपने पिताजी बर्मनदा के बारे में कुछ बतालाइये ना?

अगर मेरे पिताजी के बारे में पूछा जाए तो मैं एक कलाकार की हैसियत से केवल इतना ही कह सकता हूं कि बर्मन दा का जीवन और संगीत दोनों एक ही है। कहने का मतलब यह है कि वे संगीत को ही अपना जीवन और अपने जीवन को संगीत मानते हैं।

आर.डी बर्मन से मेरी इतनी ही बातें ही पायी थीं कि जिसका इंतजार था यानि किशोर कुमार अपनी लूंगी और कुर्ता पहने आ गये मैंने बातों के इस सिलसिले को और आगे न बढ़ा कर, यहीं पर खत्म करना उचित समझा और फिर आर.डी. बर्मन को इस संक्षिप्त मुलाकात के लिये धन्यवाद देकर घर लौट आया।


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Mayapuri

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