“प्राण” भारतीय सिने जगत के सबसे ज़िन्दादिल खलनायक की याद फिर एक बार

1 min


“प्राण” ये हिन्दी फिल्म जगत का वो नाम है, जिसे लोग शायद ही भूल पाएं।  इनका नाम भारतीय फिल्म जगत के उन महान खलनायकों में से एक था जिन्होंने अपने अभिनय के दम पर लोगों के मन में अपनी एक अलग और खास छाप छोड़ी है। 12 फरवरी 1920 को दिल्ली में पैदा हुये प्राण ने सैकड़ों फिल्मों में यादगार भूमिकाएँ निभाईं। प्राण के पिता लाला केवल कृष्ण सिकन्द एक सरकारी ठेकेदार थे, जो आम तौर पर सड़क और पुल का निर्माण करते थे। देहरादून के पास कलसी पुल उनका ही बनाया हुआ है। प्राण की शिक्षा कपूरथला, उन्नाव, मेरठ, देहरादून और रामपुर में हुई।

कई बार फिल्मफेयर पुरस्कार तथा बंगाली फ़िल्म जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन अवार्ड्स जीतने वाले इस भारतीय अभिनेता ने बतौर फोटोग्राफर लाहौर में अपना कैरियर शुरु किया। प्राण को 1940 में ‘यमला जट’ नामक फिल्म में पहली बार काम करने का अवसर मिला। उसके बाद तो प्राण ने फिर पलट कर नहीं देखा। हिन्दी सिनेमा में 1940 से 1990 के दशक तक दमदार खलनायक और नायक का अभिनय किया। उन्होंने प्रारम्भ में 1940 से 1947 तक नायक के रूप में फिल्मों में अभिनय किया। इसके अलावा खलनायक की भूमिका में अभिनय 1942 से 1991 तक जारी रखा। उन्होंने 1948 से 2007 तक सहायक अभिनेता की तर्ज पर भी काम किया।

pran-3

उन्होंने लगभग 400 फिल्मों में काम किया। प्राण 1969 से 1982 के बीच सबसे ज्यादा फीस पाने वाले एक्टर थे, यहां तक कि उनकी फिल्मों का मेहनताना सुपरस्टार राजेश खन्ना से भी ज्यादा हुआ करता था। ‘डॉन’ फिल्म के लिए जहां अमिताभ बच्चन को 2.5 लाख रुपये फीस मिली थी वहीं प्राण को 5 लाख रुपये फीस के तौर दिए गए थे। ये एक ऐसे प्रभावशाली व्यक्तित्व के मालिक थे जो अपने अभिनय से लोगों की विचारधारा तक बदल सकते थे एक तरफ उनके नाम ‘राम और श्याम’ के खलनायक की ऐसी तस्वीर रही है, जिससे लोगों ने परदे के बाहर भी घृणा शुरु कर दी थी और वो घृणा इतनी बढ़ी कि एक समय आया लोगों ने “प्राण” नाम रखना ही बंद कर दिया। वहीं उनके नाम ‘उपकार’ के मंगल चाचा की भूमिका भी है, जिसे दर्शकों का बेइन्तहा प्यार और सम्मान मिला।

1968 में उपकार, 1970 आँसू बन गये फूल और 1973 में प्राण को बेईमान फिल्म में सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता के लिये फिल्म फेयर अवॉर्ड दिया गया। इसके बाद मिले सम्मान और अवॉर्ड की संख्या सैकड़ों में है और सिर्फ इतना ही नहीं प्राण को हिन्दी सिनेमा में उनके योगदान के लिए 2001 में भारत सरकार ने पद्म भूषण से सम्मानित किया और 2013 में उन्हें फिल्म जगत के सर्वोच्च सम्मान दादा साहेब फाल्के सम्मान भी प्रदान किया गया।

18pran

प्राण परदे पर जितने क्रूर और कठोर दिखते थे परदे के बाहर बिल्कुल विपरीत थे। अपने सहायक अभिनेताओं के बीच उनकी छवि एक बहुत दिलदार किस्म के व्यक्ति की थी यानि वे सच में सबके प्राण ही थे। खेलों के प्रति प्राण का प्रेम भी जगजाहिर है। ताश खेलना व स्पोर्ट्स भी उनको पसंद थे। वह और उनकी पत्नी मुंबई के ‘क्रिकेट क्लब ऑफ इंडिया’ में नियमित जाया करते थे। उन्होंने अनेक सेलिब्रिटी मैचों को स्वर्गीय पी. जयराज के साथ मिलकर आयोजित किया। 50 के दशक में उनकी अपनी फुटबॉल टीम ‘डायनॉमोस फुटबाल क्लब’ बहुचर्चित रही है।

हिंदी फिल्मों के मशहूर विलेन और चरित्र अभिनेता प्राण की शुक्रवार 12 जुलाई, 2013 को देर शाम मुंबई के लीलावती अस्पताल में मौत हो गई। वो 93 साल के थे। उनके बेटे सुनील ने बीबीसी संवाददाता मधू पाल को बताया कि वो लीलावती अस्पताल में भर्ती थे जहां उनकी मौत देर शाम हुई।

 


Like it? Share with your friends!

Mayapuri

अपने दोस्तों के साथ शेयर कीजिये