सपनों के सौदागर ने जब अपने सबसे सुहाने सपने को मजबूरी में त्याग दिया

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हर पिता का अपने बेटे के लिए एक सपना होता है। वह या तो चाहते है कि उनका बेटा उनके जितना अच्छा हो या उनसे बेहतर।
अली पीटर जॉन

महान शोमैन राज कपूर ने अपने दूसरे बेटे ऋषि कपूर के लिए भी ऐसा ही एक सपना देखा था। वह चाहते थे कि वह उनके जैसे निर्देशक या उनसे बेहतर निर्देशक बने। उन्होंने न केवल अपने बेटे को एक निर्देशक बनाने का सपना देखा, बल्कि उन्हें अपने सहायक निर्देशक के रूप में भी काम दिया, जबकि उनका बेटा उनके मैग्नम ओपस ‘मेरा नाम जोकर’ में एक बाल कलाकार के रूप में काम कर रहा था।

लेकिन, ‘मेरा नाम जोकर’ जो कि उनके करियर की सबसे महत्वाकांक्षी और अद्भुत फिल्म थी, अब तक की सबसे बड़ी फ्लॉप साबित हुई और वह सीरियस फाइनेंसियल ट्रबल में थे। उन्हें अपना स्टूडियो गिरवी रखना पड़ा था, अपनी अधिकांश संपत्ति बेचनी पड़ी थी और अपना सारा समय शराब पीने में बिताना पड़ा क्योंकि उनके पास अपने और आर. के. फिल्म्स के बैनर को बचाने की कोई उम्मीद नहीं थी।

वह आखिरकार अपने गाइड और लेखक के. ए. अब्बास के पास गए और उनके चरणों में गिर गये और उन्हें बताया कि केवल वह ही उन्हें बचा सकते है। उन्होंने अब्बास से यह भी कहा कि उनके पास कुछ बड़े सितारों के लिए साइनिंग अमाउंट का भुगतान करने के लिए भी पैसे नहीं हैं और वह केवल अपने दूसरे बेटे ऋषि कपूर को एक अभिनेता के रूप में कास्ट करने की उम्मीद कर रहे थे और अब्बास को अपने बीस साल के बेटे के लिए एक प्रेम कहानी लिखने को कहा था।

अब्बास जिन्होंने राज कपूर के लिए ‘आवारा’, ‘श्री 420’ और ‘मेरा नाम जोकर’ जैसी फिल्में लिखी थीं, उन्होंने केवल तीन दिनों में एक स्क्रिप्ट लिखी थी और राज कपूर ने पटकथा को एक सबसे बड़ी हिट में बदल दिया, जिसने उनके बेटे को एक स्टार के रूप में लॉन्च किया, जिसे फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखना पड़ा।

ऋषि कपूर ने रोमांटिक हीरो के रूप में सत्तर से अधिक फिल्में कीं और उन्हें रोमांटिक स्टार के रूप में अपनी छवि बदलने का कोई अवसर नहीं मिला। और एक दिन उनके पिता ने उन्हें ताना मारा और कहा, “अबे बेवकूफ ऐसे कब तक नाचता गाता रहेगा, कुछ अच्छे रोल भी करो कि मालूम पड़े की राज कपूर के बेटे हो।” ऋषि ने अपनी पूरी कोशिश की, लेकिन रोमांटिक स्टार की छवि ने उन्हें तब तक छोड़ने से इनकार कर दिया जब तक उनके पिता की मृत्यु नहीं हो गई।

ऋषि को हालांकि याद था कि कैसे उनके पिता चाहते थे कि वे निर्देशक बनें। और जब वह सही मायने में रोमांटिक हीरो की भूमिका से तंग आ गए, तो उन्होंने अपने पिता के सपने को पूरा करने का फैसला किया और राजेश खन्ना, ऐश्वर्या राय, अक्षय खन्ना और कई अन्य जाने-माने चरित्र कलाकारों जैसे सितारों के साथ अपनी पहली और एकमात्र फिल्म ‘आ अब लौट चलें’ का निर्देशन किया। फिल्म हालांकि फ्लॉप हो गई थी। ऋषि ने एक अच्छी पटकथा पाने के लिए दो साल तक इंतजार किया, लेकिन उनकी खोज कुछ भी नहीं में समाप्त हो गई और वह अधिक से अधिक निराश होते जा रहे थे।

इस समय के दौरान राहुल रवेल, जो ‘मेरा नाम जोकर’ के निर्माण के दौरान उनके सहयोगी थे, ने ऋषि को चरित्र भूमिकाएं निभाने की सलाह दी और ऋषि ने उनकी सलाह को स्वीकार किया और ‘चिंटू जी’ नामक फिल्म में अपनी पहली प्रमुख चरित्र भूमिका निभाई, जो वास्तविक जीवन चिंटू के रूप में उनके स्वयं के व्यक्तित्व पर आधारित थी। रंजीत कपूर द्वारा निर्देशित फिल्म ने अच्छा प्रदर्शन नहीं किया, लेकिन इसने ऋषि के लिए सफलता का एक नया द्वार खोल दिया। वह जल्द ही मोस्ट वांटेड और अत्यधिक भुगतान वाले चरित्र अभिनेता थे और उन्होंने ‘अग्निपथ’, ‘लव आज कल’, ‘मुल्क’, ‘102 नॉट आउट’ और कई अन्य फिल्मों में यादगार भूमिकाएं निभाईं। वह ‘शर्मा जी कुछ नमकीन हो जाए’ नामक एक फिल्म कर रहे थे, जिसे उन्होंने मरने से पहले पूरा कर लिया था लेकिन फिल्म अभी तक रिलीज नहीं हुई है।

जब ऋषि को बेवकूफ कहा था…

ऋषि ने अपना घर खरीदने के लिए पर्याप्त पैसा कमाया था और पाली हिल पर एक पुराना बंगला देखा था जिसका इस्तेमाल शूटिंग के लिए किया जाता था, विशेषकर एक्शन दृश्यों के लिए क्योंकि बंगला बदमाशों के ठिकाने की तरह दिखता था।

ऋषि ने उस पुराने बंगले को खरीदने और उस स्थान पर अपना बंगला बनाने का फैसला किया था। जब उन्होंने अंततः बंगला खरीदा था, तो उन्होंने अपने पिता को इसे देखने के लिए कहा था। उनके पिता ने जब बंगले को देखा तो ऋषि से कहा, “राज कपूर का बेटा इतना बेवकूफ कैसे हो सकता है? क्या सोचकर तुमने यह बँगला खरीदा है?” ऋषि जिन्होंने कभी उल्टा जवाब नहीं दिया वह अपने पिता के सामने चुप रहे और अपने बंगले के निर्माण में लग गए और जब यह पूरा हो गया, तो उन्होंने अपने पिता राज और माँ कृष्णा के सम्मान में बंगले का नाम ‘कृष्णा राज’ रख दिया। दो साल पहले मैं पाली हिल की तरफ था और कृष्णा राज को देखने के लिए गया और इसे घटों से ढूढ़ता रहा तब मुझे अंत में बताया गया कि कृष्णा राज को ध्वस्त कर दिया गया था और ऋषि और उनका परिवार एक अपार्टमेंट में शिफ्ट हो गए थे।

इस स्वप्न नगर में लोग कैसे कैसे सपने देखते है, लेकिन एक सबसे बड़ा सपनों का सौदागर वहां ऊपर बैठा हुआ है जो हर सपने को बनाता भी है और कभी-कभी बिगाड़ता भी है और इंसान हाथ मलते हुए रह जाता है। (ऋषि कपूर की पहली पुण्यतिथि पर)

अनु- छवि शर्मा


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