रोशन का जनम, गीता दत्त और मदन मोहन की विदाई

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Geeta-Dutt-5

 

 

मायापुरी अंक 50,1975

18 जुलाई की तारीख हिंदुस्तान की फिल्म इंडस्ट्री में एक महत्वपूर्ण तारीख बन कर रह गई है। इसी तारीख को ‘कव्वाली’ के बादशाह रोशन का जन्म हुआ था। और इसी तारीख को गायिका गीता दत्त और ‘गजलों’ के बादशाह मदन मोहन (जिन्हें अब स्वर्गीय लिखते हुए कलेजा मुंह को आता है) का देहांत हुआ। तीनों अपने अपने रंग में विशिष्ट स्थान रखते थे। उन तीनों का ही बदल मिलना मुश्किल है।

रोशन जी को अपने काम से इतना प्रेम था कि चौबीस घंटे घर में घुसे रहते और धुनें बनाया करते। उनकी पत्नी ईरा उनकी इस बात से खीज़ उठती थी। वह चाहती थी कि रोशन जी बाहर जायें और वे हिंदुस्तानी नारी की तरह उनके आने की प्रतिक्षा करें। वह उनके अंतिम दिनों मे उनके लिए घर से बाहर म्यूज़िक रूम तलाश करने लगी। यह देखकर रोशन जी उनसे मज़ाक में कह दिया करते,

“बहुत पछताओगी अगर मैं बाह चला गया तो…”

ईराजी उसी टोन में मज़ाक में जवाब देती,

मुझे इसके लिए जरा भी पछताना नही पड़ेगा। ऐसी जगह म्यूज़िक रूम लूंगी कि आप दोपहर को भी घर नहीं आ पायेगी। और मैं शाम तक बड़ी बेकरारी से प्रतिक्षा करती रहूंगी।

ईराजी उनके लिए ऐसा म्यूज़िक रूम नहीं ढूंढ पायीं किंतु एक शाम वह ऐसे गये कि शाम तो क्या उम्र भर इंतजार करें तो भी वापस नहीं आ सकते। उन्हें अपना यह शौक कितना मंहगा पड़ा यह वही जानती हैं। लेकिन रोशन जी को अपनी मौत का आभास पहले ही हो गया था। घर के पास से अगर कोई अर्थी गुजराती थी तो वह कह उठते थे

एक दिन मैं भी ऐसे हो चला जाऊंगा और तुम बालकनी में खड़ी यूं ही देखती रह जाओगी।

रोशन जी की ऐसी बातें सुनकर ईराजी का मन कांप उठता था। अपने मन की शांति के लिए एक दिन उन्होंनें एक ज्योतिषी से इसका जिक्र किया उसने यह कह कर और घबरा दिया कि रोशन जी का मृत्यू योग है। इस योग को टालने के लिए ज्योतिषी ने पूजा करने के लिए कहा। ईराजी मन की शांति के लिए पूजा के लिए राजी हो गयी। और रोशन जी की चोरी से पूजा में जितना भी खर्च होना था किया। रोशन जी को जब इस बात का पता चला तो वे हंस पड़े और बोले।

अरे पागल मौत और जिंदगी इंसान के हाथ में नहीं है। वहां से तो सांसे गिनकर भेजा जाता है। जितनी सांसे दी जाती हैं, उससे एक भी सांस वह ज्यादा नहीं ले सकता मृत्यु योग तो जन्म से ही लग जाता है।

रोशन जी की यह बात एक-एक अक्षर अक्षर सच निकली।

16 नवम्बर 1967 को वह सुबह से ही बड़े मूड में थे। सारा दिन ताश खेलते रहे रात को ‘ज्वेल थीफ’ का प्रीमियर था। किंतु उसी शाम हरी वालिया ने उन्हें घर बुलाया था। इसलिए प्रीमियर में छोटे बेटे राजू (आज का संगीतकार राजेश रोशन) को जाने के लिए कह दिया। बड़ी खुशी के आलम के कपड़े पहले। राजू को अपने करीब खड़ा कर दिया और बोले

अरे राजू तो मेरे बराबर हो गया। अब मुझे किस बात की फिक्र है? दोनों लड़के जवान हो गए हैं।

कार राजू को सौंप कर दोनों पति पत्नी टैक्सी से हरिवालिया के घर की ओर निकल गए रास्ते में कहने लगे। गाना सुनाओ।

ईराजी ताजमहल फिल्म का गाना जो वादा किया वह निभाना पड़ेगा गाने लगी। इस पर वह नाराज़ होकर बोले

तुम रोज यही गाना गाती हो। अच्छी बात है आज मैं तुम्हें नया गाना सिखाता हूं।

यह कहकर रोशन जी नया गीत गुनगुनाते हुए हरिवालिया के घर पहुंच गए। हरिवालिया के घर में बहुत सारे लोग जमा थे। एक वितरक उनसे कुछ निजी बातें करने लग गया।

थोड़ी देर के बाद शोर मचा रोशन जी बेहोश हो गए।

ईराजी उनके साथ गई थी। शोर सुनकर वह चीखें सुनकर, कौन से रोशन बेहोश हो गए?

तुम्हारे पति…..

ईराजी ने दौड़ कर उन्हें झंझोड़ा मगर वह उन्हें सदा के लिए इंतज़ार करने के लिए अकेला छोड़कर बहुत दूर जा चुके थे।

आज व हमारे बीच नही, उनके नगमें आज भी दिमाग में गूंज रहे हैं कारंवा गुजर गया गुबार देखते रहे आपने याद दिलाया तो मुझे आया अपनी नज़र से उनकी नजर से उनकी ‘नज़र तक’ एरी आली पिया बिन रहते थे कभी जिनके दिल में जिंदगी भर नही भूलेगी वो बरसात की रात इस दिल की हालत क्या कहिये जब तक यह नगमें फिजा में गूंजते रहेंगे वे अमर रहेंगे।

पार्श्वगायिका गीता दत्त यादें जो कुछ याद रहीं।

आज से तीन साल पहले वक्त का रोना रोने लगी गीता दत्त तदबीर से बिगड़ी हुई तकदीर बनाते-बनाते अल्लाह को प्यारी हो गई थी। आज सैक्सी गानों के लिए लोग आशा की प्रशंसा करते नहीं थकते।लेकिन अगर ओ.पी. नय्यर और एस.डी. बर्मन ने गीता दत्त के साथ नाइंसाफी न को होती तो आशा कभी इस बुलंदी पर न पहुंच पाती। आशा की आवाज़ में अश्लीलता बहुत है किंतु गीतादत्त के यहां आवाज में रियल सैक्स था। एक खास अंदाज था। जो आशा को नसीब नहीं। उनके गीत मेरा नाम चिन चिन चूं… (हावड़ा ब्रिज) तदबीर से बिगड़ी हुई तकदीर बना ले… (बाजी), चोर लुटेरे डाकू… (उस्ताद) इस बात के प्रमाण हैं। इनके अलावा उसके कितने ही ऐसे गीत हैं जो लता के मुकाबले में रखे जा सकते हैं जाने क्या तूने कही, जाने क्या मैंने सुनी (प्यासा) भंवरा बड़ा नादान है कोई दूर से आवाज दे चले आओ (साहब बीबी और गुलाम) दर्शन प्यासी आई दासी (संगदिल) नन्ही कली सोने चली हवा धीरे-धीरे आना (सुजाता) आदि ऐसे ही गीत हैं।

गीता दत्त का असल विवाहित जीवन सुखी न था। और इसी गम को भुलाने के लिए गीता दत्त ने अपने आपको शराब में डुबो दिया था। गुरूदत्त नहीं चाहते थे कि गीता दत्त फिल्मों में गाने गाए। क्योंकि शाम को जब थके-हारे घर पहुंचने पर यह पता चले कि बेगम साहिबा रिकॉर्डिंग पर गई तो पति महोदय को बड़ी कोफ्त होती थी। लेकिन गीता दत्त ने पतिव्रता नारी की तरह गुरूदत्त का कहा माना और केवल उन्हीं की फिल्मों में गाने गाये। लेकिन गीता दत्त घर पर होतीं और स्टूडियो में वहीदा रहमान गीता दत्त की जगह संभाले रहती। यहां तक तो ठीक था। किंतु गुरूदत्त को अपनी मोहब्बत के जाल में फंसाकर सुनील दत्त से भी मोहब्बत कर बैठी थी। कहते हैं गुरूदत्त को जब उन दोनों को मोहब्बत का पता चला तो उनका दिल टूट गया और उन्होंने आत्म हत्या कर ली। गुरूदत्त ने खुद को तो गमों से मुक्त कर लिया किंतु गीता दत्त पर गमों का पहाड़ तोड़ गये। जिनके बीच से जितनी निकलने की कोशिश की उतना ही बोझ बढ़ता गया और जय किशन और मदन मोहन की तरह आखिर एक दिन उन्हें भी शराब ने निगल लिया।

जनता की याददाश्त तो कमजोर होती ही है किंतु फिल्म वालों ने भी गीता दत्त को भुला दिया है। अब तो बस रेडियो सीलोन पर ही कभी कभार भूले-बिसरे गीतों में गीता दत्त की आवाज़ सुनाई दे जाती है। लेकिन जब भी सुनिये तो ऐसा प्रतीत होता है कि वह यहीं कहीं पास मौजूद हैं और कह रही है

जरा सामने आ, जरा आंख मिला तेरा शुक्रिया कर दूं अदा।


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Mayapuri

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