मूवी रिव्यू: स्पोर्ट्स पर आधारित साधारण फिल्म ‘रणभूमि’

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रेटिंग**

अभी तक लगान, चक दे इंडिया, भाग मिल्खा भाग तथा मैरी कॉम आदि स्पोर्ट पर बनी फिल्में दर्शक को बहुत पंसद आई लिहाजा वे सभी हिट साबित हुईं। प्रेम रतन धन पायो जैसी बिग बजट फिल्म के साथ इस बार एक सीमित बजट की फिल्म ‘रणभूमि’ रिलीज हुई है। इस फिल्म का कुछ भाग लगान की तरह खेल पर आधारित है, जो अन्य स्पोर्ट फिल्मों की तरह एक हद तक रोमांच पैदा करता है।

कहानी

हिमानी अत्री यानि भूमि और उससे छोटा भाई अपनी दादी के साथ रहते हैं। दरअसल उसके माता पिता एक एक्सिडेंट में मारे जाते हैं लेकिन उसका भाई बच तो जाता है लेकिन उसके सिर में ऐसी चोट लग जाती है जिसकी वजह से उसे कहीं भी चक्कर आ जाते हैं और वो बेहोश हो जाता है। डॉक्टर उसके ऑपरेशन के लिये आठ लाख का खर्च बताता है। जिस स्कूल में दोनों पढ़ते हैं दरअसल उसी स्कूल के पीटी और कोच मन्सूब अख्तर की कार से भूमि के माता पिता मारे जाते हैं लेकिन चूंकि मन्सूब वहां से भाग जाता और बाद में स्कूल के ट्रस्टी और बिजनेसमैन भगवान तिवारी यानि दुग्गर उसे बचा लेते हैं। भूमि रेस में सबसे अच्छी स्पोर्ट्स गर्ल है, वो स्कूल में सौ और दो सौ मीटर की दौड़ जीत चुकी है। बाद में जब एक सोलह सौ मील लंबी दौड़ होती है जिसमें वहां के मंत्री का बेटा भी भाग ले रहा है जो लगातार दो साल से जीतता आ रहा है। लेकिन इस बार उसे भूमि से खतरा है इसलिये उसके जीतने की जिम्मेदारी मंत्री, दुग्गर को देते हैं और दुग्गर, कोच को। कोच बेईमानी से भूमि को अयोग्य करार दे देता है बदले में दुग्गर मंत्री के सहयोग से उसकी स्पोर्ट एकेडमी बनाने का वादा करता है लेकिन जब कोच को पता चलता है कि भूमि वही लड़की है जिसके माता पिता उसकी लापरवाही से मारे गये थे अगर वो तुरन्त उन्हें अस्पताल ले जाता तो वे शायद बच सकते थे।

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उसमें पश्चाताप की भावना आ जाती है इसलिये वो दुग्गर से कहता है कि उसे एकेडमी नहीं चाहिये बदले में वो अब भूमि को क्वालिफाइ करना चाहता है इसके अलावा उसे आठ लाख रूपये चाहिये क्योंकि भूमि का छोटा भाई उसी की वजह से इस हालत तक पहुंचा है और वो अब उसके ऑपरेशन के लिये आठ लाख चाहता है। दुग्गर उसे पहले तो समझाता है बाद में वो सारी बातें भूमि की दादी को बताने की धमकी देता है। लेकिन कोच अपनी बात पर दृढ़ है क्योंकि अगर भूमि वो दौड़ जीत लेती है तो जीत के पैसे से उसके भाई का ऑपरेशन हो सकता है। कोच अगले दिन से भूमि को ट्रेनिंग देना शुरू कर देता है और एक दिन दौड़ का दिन आ जाता हैं वहां भूमि को कोच के इशारे पर ही सब कुछ करना था। ये बात दुग्गर को पता है इसलिये सही वक्त आते ही वो कोच को घायल कर देता है लेकिन कोच किसी तरह बाहर आकर भूमि को इशारा करता है और भूमि जीत हासिल कर लेती है ।

निर्देशन

फिल्म में शामिल कलाकार तकरीबन सभी नये हैं, निर्देशक भी। इसीलिये वो पहले भाग में कलाकारों से उस तरह का काम नहीं निकलवा पाया जो फिल्म के लिये जरूरी था। मुख्य किरदार फिल्म के प्रोड्यूसर मन्सूब अख्तर ने ही निभाया है। अंत में जब दौड़ शुरू होती है तो एक हद तक खेल में जो रोमांच हैं उससे दर्शक कहीं न कहीं प्रभावित होता है। फिल्म की स्क्रिप्ट और संवाद बेहद ढीले ढाले हैं। गीत संगीत भी कमजोर है सिवाय एक गीत ‘चल दौड़’ के जिसे पत्रकार अजय गर्ग द्वारा लिखा गया है।

अभिनय

फिल्म के मुख्य चार किरदारों दादी हेमा सिंह, कोच मन्सूब अख्तर, भूमि हिमानी अत्री और विलन भगवान तिवारी में सिर्फ भगवान तिवारी आकर्षित करते हैं ।

क्यों देखें

जिन दर्शकों को स्पोर्ट्स फिल्मों में रूचि हैं वे एक बार फिल्म देख सकते हैं।

 


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Mayapuri

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