मूवी रिव्यू: बॉक्सिंग पर बनी एक और सर्वश्रेष्ठ फिल्म ‘साला खडूस’

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रेटिंग****

अगर किसी फिल्म का विषय अच्छा हो तो इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि फिल्म का डायरेक्टर मेल हैं या फिमेल। दरअसल फिल्म ‘साला खडूस’ की लेखक निर्देशिका सुधा कांगेरा है जिन्होंने बॉक्सिंग पर इतनी बेहतरीन फिल्म बनाई है जबकि शुरू में तो फिल्म के प्रोड्यूसर और एक्टर आर माधवन तक को यकीन नहीं था कि एक महिला भी बॉक्सिंग जैसे मेल सब्जेक्ट को इतनी बढि़या तरह से हैंडिल कर सकती है।

कहानी

आर माधवन एक ऐसा बॉक्सर हैं जो अपने खुले और रूखे स्वभाव के कारण उस वक्त के कोच यानि जाकिर हुसैन की वजह से अपने मुकाम तक नहीं पहुंच पाता। इसके बाद जब वह महिला बॉक्सिग कोच बना उस वक्त भी उसका स्वभाव वैसा ही था लिहाजा उसे हर कोई खड़ूस मानता था। उसके इसी रवैये को देखकर जाकिर हुसैन जो मेडी के गुस्से का शिकार बन चुका है, खुंदक में उसका तबादला चैन्नई कर देता है जंहा की महिला बॉक्सर सबसे ज्यादा कमजोर मानी जाती हैं। मेडी को चेन्नई वैसा ही दिखाई देता है जैसा कि उसने सुना था, वहां उसे ऐसी एक भी बॉक्सर नहीं दिखाई दी जिसमें कुछ दमखम हो। उसी दौरान उसे एक बॉक्सर लक्ष्मी यानि मुमताज सरकार की बहन रितिका सिंह दिखाई देती हैं जिसमें एक आग थी और जो अपने गुस्से के आगे किसी को कुछ नहीं समझती थी।

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मेडी को उसमें एक सफल बॉक्सर के सारे गुण दिखाई देते हैं लिहाजा जब वो उसके बारे में पता करता है तो पता चलता है कि वो एक बेहद गरीब मछली बेचने वाले परिवार की मछली बेचने वाली लड़की मेधी है। उसकी बहन लक्ष्मी भी एक बॉक्सर है जिसका मकसद बॉक्सिंग के जरिये पुलिस में भर्ती होना है लेकिन उसमें एक सफल बॉक्सर के गुण नहीं है। मेडी मेधी को ऑफर देता है लेकिन वो उसे गलत समझते हुये मना कर देती है बाद में मेडी उसे एक ऑफर देता है कि वो अगर उसकी कोचिंग में बॉक्सिंग सीखेगी तो उसे वो हर रोज पांच सौ रूपये अपनी तरफ से देगा। बाद में कितने सारे झमेलों, यहां तक अपने करियर को दांव पर लगा कर मेडी,  मेधी को वर्ल्ड चैंपियन बनाकर ही दम लेता है ।

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निर्देशन

अगर आप अपना काम जानते हैं तो बेशक आप एक अच्छी फिल्म बना सकते हैं। सुधा कोंगरा एक ऐसी लेखिका और निर्देशिका है जिन्होंने न सिर्फ एक अच्छी स्क्रिप्ट लिखी बल्कि उसपर जमकर रिसर्च भी की। उसी का नतीजा है कि वो एक ऐसी उम्दा फिल्म बनाने में कामयाब रही जो हर किसी की उम्मीदों पर खरी साबित होती है। फिल्म की यूएसपी है रितिका सिंह जो वास्तव में बॉक्सर है। उससे इतना अच्छा काम निलकवाना एक अच्छे निर्देशक की पहचान है। इसके अलावा सुधा की रिसर्च वास्तविक बॉक्सर्स तथा बढि़या फिल्म मेकिंग के तहत एक बेहतरीन फिल्म बनाने में पूरी तरह कामयाब रही। बेशक फिल्म की ढ़ेर सारी चीजें ‘चक दे इंडिया’ से मिलती जुलती है लेकिन फिल्म का ट्रीटमेन्ट बिल्कुल अलग है। फिल्म की फोटोग्राफी शानदार है तथा सारी लोकशंस वास्तविक लगती है।

अभिनय

वो कहते हैं न कि कुछ लोग जन्म से ही होनहार होते हैं। सतरह साल की बॉक्सर रितिका बेशक बॉक्सर भी उतनी ही अच्छी होगी जितना कि उसने सुन्दर अभिनय किया है। चाहे लांग शॉट हो या क्लोज अप रितिका द्वारा दी गई विभिन्न भाव भंगिमाये या फिर उसका खुशी में उन्मुक्त डांस देख कर एक अभ्यस्त अदाकार भी शरमा जाये। आर माधवन ने सिस्टम से हारे हुये शख्स की भूमिका को कमाल की अभिव्यक्ति दी है। इसके अलावा एक अलग से विषय पर फिल्म बनाने के अपने फैसले और संघर्ष के लिये वे विशेष बधाई के पात्र हैं। उनके अलावा मुमताज सरकार, जाकिर हुसैन तथा नासिर जैसे सशक्त अभिनेताओं ने अपनी भूमिका को जैसे जिन्दा कर दिखाया है।

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संगीत

संतोष नारायण का म्यूजिक फिल्म को और प्रभावशाली बनाता है। खासकर रितिका और उसकी बहन पर फिल्माया गया गाना काफी रोचक बन पड़ा हैं इसके अलावा बैकग्रांउड गीत बाकायदा कहानी को और प्रभावी बनाते हैं।

क्यों देखें

अगर आप बॉक्सिंग में रूचि रखते हैं या साफ सुथरी उद्देश्यात्मक फिल्म देखने का शौक रखते हैं। तो ये फिल्म कतई मिस न करें। क्योंकि बेशक ‘साला खडूस’ को ‘मैरी कॉम’ के बाद एक और सर्वश्रेष्ठ फिल्म कहा जा सकता है।

 

 


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Mayapuri

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