सायरा बानो जो अपने सौन्दर्य के कारण ही फिल्मों मे जमी हुई है

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मायापुरी अंक 12.1974

सायरा बानो अपनी पहली फिल्म ‘जंगली के रिलीज होते ही ब्यूटी क्वीन बन गई. और उसके बाद से ही यह कहा जाता रहा है कि सायरा केवल अपने सौन्दर्य के कारण ही फिल्मों में जमी हुई है वरना उन्हें अभिनय नही आता. दिलीप से शादी के पश्चात भी उनकी अभिनय-क्षमता मे निखार नही आया है इसीलिए वह रेहाना सुल्ताना के पद चिन्हों पर चल कर सैक्सी अभिनेत्री की इमेज बनाने में लगी हुई है। इसीलिए वह अपनी फिल्मों में कम से कम कपड़ो के साथ पर्दे पर आती है।

यही नही सायरा बानो के बारे में जब भी चर्चा होती है तो उसके अभिनय के साथ उसके गृहस्थ-जीवन की असफलता की ओर भी इशारे किये जाते हैं। आये दिन दिलीप कुमार के साथ उनके संबन्ध विच्छेद की खबरें आती रहती है। कहने वालों का लहजा ऐसा होता है कि लगता है कि बस कल के अखबारों मे दोनों की तलाक की खबरें आने ही वाली है। दोनों (दिलीप-सायरा) की उम्रों में बहुत अधिक अन्तर और सायरा का फिल्मों में काम करते रहना इसका मूल कारण होता है और इसी वजह से उसके साथ काम करने वाले हीरोइन के साथ उसके रोमांस की खबरें भी उड़ती रहती है।

सायरा के सम्बन्ध में फैली इन बातों में यथार्थ कितना है और झूठ कितना है, यही हर कोई जानने को उत्सुक रहते हैं।

इस दुनिया में ऐसा कोई नही है जो यह कह सके कि वह एक पूर्ण व्यक्ति है. सायरा बानो की मां नसीम भी अपने समय की सुन्दरतम अभिनेत्री मानी जाती थी। इसीलिए उसे परीचेहरा नसीम कहा जाता था, मां का सौन्दर्य सायरा को विरासत में मिला है. सायरा के पास सौन्दर्य है और शो-बिजनेस में होने के कारण वह सौन्दर्य प्रदर्शन करती है तो क्या बुरा करती है लेकिन सवाल यह है कि क्य वह जान बूझकर ऐसा करती है ?

सायरा एक अभिनेत्री है और अभिनेत्री फिल्मों में अपनी मर्जी से नहीं नाचती। जैसा निर्देशक नचाता है नाचना पङता है। उनकी टांगों के प्रदर्शन के लिए उसकी वेश भूषा के लिए वह नहीं बल्कि निर्माता-निर्देशक जिम्मेदार होता है। फिल्म की कहानी उनकी पसंद से ली जाती है और कहानी की ज़रूरत के अनुसार भूमिका की रूप रेखा तैयार की जाती है, आज निन्यानवें प्रतिशत फिल्में एक सी ही होती है। एक प्रतिशत फिल्में अलग हटकर बनती है। हर अभिनेत्री चाहती है कि उसे मनपसंद प्रभावशाली भूमिका मिले। लेकिन फार्मूला फिल्मों के दौर में मनपसंद भूमिका सौभाग्य की बात है। सायरा को ‘गोपी’ और ‘सगीना’ में ‘विक्टोरिया 203’, ‘अप्रैल फूल’, ‘इन्टरनेशनल कूक’ आदि की अपेक्षा अधिक रोल मिले तो उन्होनें सिद्ध कर दिखाया कि उनमें टैलेन्टस है, कोई काम लेने वाला चाहिए।

(यह और बात है कि उन दोनों फिल्मों के नायक दिलीप कुमार थे। दिलीप ने नायक ही नहीं निर्देशक की भूमिका निभाई थी) जिन लोगों ने सायरा की फिल्म चैताली, बैराग और ज़मीर के रशेज या शूटिंग देखी है वह कहते है कि सायरा ने इन फिल्मों से अपनी पिछली इमेज को धोकर रख दिया है।

सायरा बानो का फिल्मों में काम करना उनके कुछ प्रशंसकों और ससुराल वालों को बङा अखरता है। इसीलिए सायरा और दिलीप के सम्बन्धों में दरार की खबरें उड़ा करती है। सायरा बानो ने जब दिलीप कुमार से शादी की थी तब भी वह फिल्मों में काम कर रही थी और नूतन व शर्मिला टैगोर की तरह उन्होनें ऐसा कोई बयान नहीं दिया था कि फिल्मों में काम नहीं करेंगी। उन्होने फिल्मों में काम करने की बात दिलीप कुमार पर छोङ दी थी। दिलीप कुमार ने उनकी लगन देखकर फिल्मों में काम करने की आज्ञा दे दी थी। सायरा को फिल्मों में काम करने पर कोई आपत्ति नहीं तो दूसरे क्यों चिल्लाते हैं?

दरअसल सायरा अगर अपना घर छोङ कर दिलीप के घर में रहने लगे तो शायद इस प्रकार की अफवाहों का जन्म न हो। दिलीप कुमार खुद अपने नकारा भाईयों से तंग आए हुए है। काम धाम कुछ करते नहीं और रोटियां तोङा करते हैं। यह बात सायरा को पसंद नहीं है। इसीलिए ससुराल वालों की सायरा से नहीं बनती। वह अपने पति के साथ अकेले रहना चाहती है ताकि पति-पत्नी में जो प्रायवसी होती है वह कायम रहे। लेकिन जिस घर में 29 आदमी रहते हों वहां यह कैसे सम्भव है?

अपना घर न छोङने का दूसरा कारण उनकी मां है। सायरा को अपनी मां से बङा प्रेम है और उससे बढकर मां को बेटी से है। (यह स्वभाविक भी है। और यूं भी सायरा के बिज़नैस से दिलीप कुमार का कोई सम्बंध नहीं है। उनकी सारी कमाई नसीम के हाथ में आती है। उस सारे सफेद और स्याह की वही मालिक है। दिलीप कुमार को तो इतना भी हक नही कि वह यह कह सके कि फ्लॉप फिल्म में काम मत करो और कम फिल्मों में कम करो !) नसीम को चूंकि उनके पति अहसान ने खुश नही रखा था। इसलिए वह नही चाहती कि उनकी बेटी का जीवन भी ससुराल के नारक में झुलस जाए।

मां की ममता की छाया में रहने वाली सायरा को अपने पति दिलीप से प्रेम नही है बस मां ही से प्रेम है। ऐसी बात भी नही है। दोनों पति-पत्नी में बड़ा गहरा प्रेम है। सायरा की बीमारी के समय दो महीने तक दिलीप कुमार ने बिना किसी नर्स के सायरा की दिन-रात लगकर देखभाल की थी, इसलिए जिस कदर दिलीप कुमार सायरा बानो के साथ वफादर है उतनी ही सायरा बानो अपने ‘साहब’ के प्रति वफादर है। उनके हीरोज के साथ अगर प्रेम के किस्से पत्र-पत्रिकाओं में छपते है तो इसमें उनका क्या है ? वह स्वयं तो छपवाती नही। गपशप लिखने वाले अगर उसे किसी से अकेले में हंसते बोलते देख लेते है तो बस उसी की कहानी, बन जाती है। जब इस लाइन में है तो अपने आपको सामान्य जीवन के दायरे से काट कर अलग तो रख नही सकते ! अगर दूसरों से कट कर रहेंगे तो लोग घंमडी होने का लेबल लगा देते है. सायरा ने इसका हल यह निकाला है कि साल में तीन ही फिल्मों में काम करेगी. किन्तु इस समय इतनी फिल्में लेकर वह पछता रही है. देखना यह है कि जिस तरह दिलीप कुमार लोगों का एक आदर्श हीरो है. उसी तरह इन दोनों की जोड़ी (पति-पत्नी) भी एक आदर्श जोड़ी बन जाए ताकि उस पर कोई उंगली ही न उठा सके.


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Mayapuri

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