सकुबाई हर उस महिला की कहानी है जो हार नहीं मानती”- पद्मश्री विजेता सरिता जोशी

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Sarita Joshi

जनवरी के इस महीने में ‘ज़ी थिएटर’, एयरटेल स्पॉटलाइट पर पेश कर रहा है नादिरा ज़हीर बब्बर का उत्कृष्ट नाटक  ‘सकुबाई’।

बॉलीवुड, मराठी सिनेमा, गुजराती सिनेमा, टेलीविजन और थिएटर जगत की वरिष्ठ अभिनेत्री तथा संगीत नाटक अकादेमी एवं पदमश्री विजेता सरिता जोशी, इस बहुचर्चित नाटक की एकमात्र पात्र हैं और बड़ी खूबी से घर में काम करने वाली एक सेविका की भूमिका निभाती हैं।

सुलेना मजुमदार अरोरा

“मैंने अपनी सारी यादें सकुबाई की भूमिका में भर दी है” सरिता जोशी

Sarita Joshi

उनका कहना है की सकुबाई सिर्फ एक घर में काम करने वाली नौकरानी की कहानी ही नहीं है बल्कि हर उस महिला की कहानी है जो जीवन के कठिन दौर से गुज़र कर भी मुस्कुराना नहीं छोड़ती।

उन्होंने मायापुरी से कहा, “जब मैंने पहली बार ये नाटक पढ़ा तो मुझे वह हर महिला याद आयी जिसने मेरे घर में, हमारे पूरे परिवार के लिए भोजन पकाया, मेरी बेटियों को पालने में मेरी मदद की और मेरे घर की देख भाल की।

मुझे उनकी गरिमा, उदारता और पीड़ा याद आयी। मुझे उस सेविका की याद आयी जो मेरे घर सफ़ेद वस्त्र पहन कर काम करने आती थी क्योंकि मेरी ही तरह उसने भी अपने पति को खो दिया था।

एक वक़्त था जब मैंने भी रंगीन वस्त्र पहनने छोड़ दिए थे पर फिर अपनी बेटियों की खुशी के खातिर मैंने सफ़ेद वस्त्रों को त्याग दिया।

मैंने उस महिला को कुछ रंगीन साड़ियां भेंट में दी और धीरे धीरे उसने रंगों को अपना लिया। सकुबाई भी ऐसी ही है और जीवन में बहुत  कुछ खो कर भी वह मुस्कुराती रहती है और बेहद ज़िंदादिल है।”

सरिता जोशी के अनुसार, सकुबाई को अपने अभिनय द्वारा जीवंत करना उनके लिए एक लम्बी यात्रा जैसा था। वे कहती हैं, “किसी भी पात्र को निभाना, पूरी ज़िन्दगी के निचोड़ को धारण करने जैसा होता है।

मैंने सकुबाई को कुछ इस तरह से तराशा जैसे कोई एक मूर्ति को तराशता है या एक तस्वीर में रंग भरता है। मैंने अपनी सारी यादें सकुबाई की भूमिका में भर दी है, उसकी चाल, उसके हाव भाव और वेश भूषा को मैंने असल ज़िन्दगी से ही चुराया है।”

‘ज़ी थिएटर’ के टेलीप्लेज़ के बारे में सरिता जोशी का कहना है, “इस महामारी के दौरान, टेलीप्लेज़ बहुत कारगर साबित हुए, खासकर वरिष्ठ नागरिकों के लिए, जिनके लिए मनोरंजन के सभी साधन सीमित थे।”

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Mayapuri