‘वो मेरी यादगार दिवाली’ – संदीप आनंद

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sandeep anandपिछले सात आठ साल से लगातार टीवी शो ‘एफ आई आर’ दर्शकों की पहली पसंद बना हुआ है। इसके किरदारों मे हर कोई अपना एक अलग अंदाज लिये हुये हैं और वो अंदाज ही लोगों को हंसाता है। जैसे हवलदार बिल्लू जिसे भूलने की बीमारी है। और वो अपनी ऊल जलूल बातों से चैटाला के धप्पड़ खाता रहता है। इस किरदार को निभाने वाले होनहार एक्टर संदीप आनंद से उनके कॅरियर तथा दिपावली को लेकर हुई कुछ बातें।

मेरी यादगार दिवाली

मुझे मेरी बीस साल पुरानी दिवाली आज भी याद है। उस वक्त मैं कोई छह या सात बरस का रहा होऊंगा। दिवाली से कुछ दिन पहले पापा आतिशबाजी के साथ एक बड़ा राकेट लायें। उन्होंने बताया कि इसका नाम चेलेंजर है। इसकी खासियत ये है कि ये कि चलाने के बाद पूरे शहर का चक्कर लगाने के बाद जहां से चला था वहीं आकर गिरेगा। ये खासकर मेरे लिये थोड़ी अचरज और गर्व वाली बाता भी थी ऐसी आतिशबाजी मेरे अलावा किसी और के पास नहीं थी। इसलिये रौब जमाने के लिये मेने ये बात पूरे मौहल्ले में फैला दी। अब दिवाली का मेरे अलावा पूरे मौहल्ले को इंतजार था कि कब दिपावली आयेगी और कब उस अनोखी आतिशबाजी को पूरे शहर का चक्कर लगाते देखेंगे। लो जी वो वक्त भी आ गया जब वो राकेटे हमारे सामने था जिसे देखने के लिये पूरा मौहल्ला हमारी छत पर जमा था। राकेट में आग लगाई गई और सब सांस रोके देखते रहे कि अब उड़ेगा। लेकिन उड़ना तो दूर वो तो अपनी जगह से हिला तक नहीं। यानि वो अनोखी अतिशबाजी फुस्स साबित हुई। इसके बाद कितने ही दिन मैं शर्म के मारे घर से बाहर नहीं निकला। आज भी वो बात याद आती है तो मन ही मन खूब हंसता हूं।

टीवी से बनी पुख्ता पहचान

0 मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर में पैदा हुए, संदीप आनंद के पिता की घूमती फिरती नौकरी थी इसलिए उन्हें काफी जगह रहने और घूमने का अवसर मिलता रहता था। 1994 में वह उज्जैन अपने नाना के यहां गए। और वहीं स्कूलिंग के दौरान नाटक करने शुरू कर दिये। लेकिन प्रापर थियेटर शुरू हुआ उज्जैन में ही 1997 से। संदीप कहते हैं कि उन दिनों मैं किसी एक थियेटर से नहीं जुड़ा था बल्कि फ्रिलांस था यानि हर किसी के साथ काम करता था। मैने कालीदास एकेडमी में ढेर सारे नाटक किये। उन दिनों मैं अपने गुरू जी के साथ उनके आश्रम में ही रहता था। बाद में मैं जब माइथालॉजिक नाटकों से ऊब गया तो मैं भोपाल आ गया। और वहां हिन्दी प्ले करने शुरू कर दिए।

बहुत कम लोगों को पता है कि बैले डांस के अलावा बैले थियेटर भी होता है। इसमें आर्टिस्ट को डेढ़ से दो घण्टे तक मास्क लगा कर नुत्य शैली में परफार्म करना पड़ता है। मुझे दरअसल नई चीजे सीखने का काफी शौक रहा है इसलिए बाद में मैने छाऊ सीखा इसमें जानवरों की शैली में प्ले किया जाता है। फिर मुझे जापानी काबुकी सीखने का अवसर मिला। इसके बाद कुछ ग्रीक प्ले किये। ग्रीक प्ले करने के बाद मेरा ट्रनिंग प्वाइंट आया, जब मैने इडिपस के बारे में सुना जो विश्व में सबसे ज्यादा कठिन माना जाता है। लेकिन मेरी कम उम्र को देखते हुये मुझे किसी ने इडिपस के लिये गंभीरता से नहीं लिया तो मैने खुद पैसे जमा कर एक टीम बनाई और फिर खुद इडिपस प्ले डायरेक्ट किया। मैं दुनिया का सबसे कम उम्र का ऐसा बंदा था जिसने इडिपस जैसा नाटक डायरेक्ट किया और एक्ट किया। दरअसल मेरा मीडिया में जाना ऐम नहीं था।

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मै नैशनल स्कूल ऑफ ड्रामा जाना चाहता था लेकिन मुझे कम उम्र होने का बहाना दे कर हर बार वापस कर दिया जाता था। और जब घरवालों का दबाव बढ़ना शुरू हुआ तो मैं 2006 में मुबंई आ गया सिर्फ घरवालों को धोखा देने के लिये क्योंकि वह चाहते थे कि अब मैं कुछ काम करूं लेकिन मुझे यकीन था कि इस बार तो मेरा एनएसडी में दाखिला हो ही जायेगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। बाद में किसी तरह मैने कुछ फिल्में की फिर टीवी से जुड़ गया और देखते देखते इसी में रम गया। मुझे खुशी है कि इस धारावाहिक के जरिये मेरी पुख्ता पहचान बनी लेकिन दर्शक मुझे आज भी नहीं जानते लेकिन बिल्लू को जरूर जानते हैं।


Mayapuri