मैं दर्शकों को चीट नहीं करूंगा – संजय

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मायापुरी अंक 50,1975

संजय अपने ही बंगले में अपनी ही फिल्म ‘चांदी सोना’ की शूटिंग में व्यस्त थे। मैं जब सेट पर पहुंचा तो वह कैमरे के सामने डायलॉग बोल रहे थे।

हम तो इसे खत्म करने में रात दिन लगे हुए हैं। क्योंकि इस काम को पूरा करने में आपसे ज्यादा फायदा हमारा है।

मुझे लगा जैसे संजय यह डायलॉग फिल्म के अंदर नहीं बल्कि फिल्म के बाहर भी कह रहा हो। अपने लिए, अपने प्रशंसकों के लिए वह जल्द से जल्द इस फिल्म को पूरा करना चाहता है क्योंकि इसमें उसका फायदा ज्यादा है।

यूं फिल्म ‘चांदी सोना’ में संजय ने यह डायलॉग ब्रिटिश कमिश्नर बने सामने खड़े इफ्तिखार से कहा था। शॉट खत्म होते ही मैंने संजय को अपना कार्ड दिया। उन्होंने कार्ड देखा, मुझे वापिस किया और बड़े प्यार के साथ कहा मैं अभी आपसे बात करता हूं। आप तशरीफ रखिए।

मैं एक खाली सोफे पर बैठ गया और करीब आधा घंटा बैठना पड़ा। नहीं, शॉट देते समय उसके चेहरे पर एक्सप्रेशन सहीं और वास्तविक थे या नहीं, परवीन जी (परवीन बॉबी) को बुलाने कोई गया है या नहीं, या फिर यह कि इफ्तिखार जो शॉट् देकर खड़े हैं और वर्दी में उन्हें पसीना आ रहा होगा, किसी ने फैन (पंखा) ऑन किया या नहीं या उनके लिए अभी तक कुर्सी क्यों नहीं रखी गई?

इस आधे घंटे में संजय ने तीन शॉट फिल्माए। इसके साथ ही वह इस बात का भी ख्याल रख रहा था कि कामिनी कौशल अभी तक आई है या नहीं, शॉट देते समय उसके चेहरे पर एक्सप्रेशन सही और वास्तविक थे या नहीं, परवीन जी (परवीन बॉबी) को बुलाने कोई गया है या नहीं, या फिर यह कि इफ्तिखार जो शॉट् देकर खड़े हैं और वर्दी में उन्हें पसीना आ रहा होगा, किसी ने फैन (पंखा ऑन किया या नही उनके लिए अभी तक कुर्सी क्यों नही रखी गई?

इस आधे घंटे में मैंने संजय के भीतर के उस आदमी को बहुत करीब से महसूस कर लिया जो अपनी रचनाओं को मेहनत के खून से सजाता है।

आप तो टुकड़ों में बंटे आदमी महसूस होते हैं? जब संजय मेरे साथ इंटरव्यू के लिए बैठा तो मैंने पूछा।

हां, एक टुकड़ा लेखक, एक टुकड़ा निर्माता, एक टुकड़ा निर्देशक, और बाकी टुकड़ो मैं मै अभिनेता हूं। एक साथ इतनी सारी जिम्मेदारियों को निभाने के लिए आदमी को टुकड़ो में बांटना ही पड़ता है।

एक निर्माता-निर्देशक के रूप में आपके सामने क्या-क्या कठिनाइयां आ रही हैं?

सबसे बड़ी प्रॉब्लम आर्टिस्टों की डेट्स की है। मेरी फिल्म में सभी बड़े आर्टिस्ट हैं और उनकी डेटें एक साथ मिलना सबसे बड़ी प्रॉब्लम है।

दूसरी मुश्किल यह है कि सेट पर आते ही सबको जाने की जल्दी रहती है। क्योंकि उन्हें दूसरे निर्माताओं की शूटिंग भी करनी होती है। इसलिए मुझे एक डायरेक्टर के तौर पर जो आर्टिस्ट पहले सेट पर आ गया उसी की शूटिंग पहले कर लेता हूं। हालांकि इससे सीनों और शॉट्स को आगे पीछे करना पड़ता है। इस तरह की टेक्नीकल डिफिकल्टीज है यह। इसके अलावा और भी इतनी तकलीफें फिल्म मेकिंग में आती हैं कि मुझे लगता है दुनिया में सबसे मुश्किल काम फिल्म बनाना है।

क्या आपको डायरेक्टर बनने का शौक पहले से था या फिर प्रोफेशन (व्यापार) के लिए आपने यह कदम उठाया है?

मेरे दिमाग में बहुत से वलवले थे, जोश था कुछ कर दिखाने का जो मुझे एज एन एक्टर आज तक किसी भी फिल्म में नही मिला। अच्छे रोल्स सब गिने-चुने बड़े स्टार्स को ही मिलते रहे। इसीलिए मैं अब अपनी सारी प्रतिभाएं अपनी फिल्म में दिखाना चाहता हूं।

मैं समझता हूं संजय का यह कहना ठीक है क्योंकि मैंने देखा है सेट पर वह एक-एक शॉट को तीन-तीन बार शूट करते हैं। एक-एक लफ्ज़ पर एक एक्सप्रेशन पर पूरा ध्यान देते हैं। उसकी स्क्रिप्ट तीन साल पहले से पूरी कर ली गई है। बातों ही बातों में वह अपनी स्क्रिप्ट के बारे में भी बताता है।

स्क्रिप्ट को मुकम्मल करना बेहद जरूरी होता है। बाद में कहीं कोई खूबसूरत चीज आ जाती है तो मैं उसे बदल भी लेता हूं। ‘चांदी सोना’ की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसकी कहानी ऑरिजिनल है कोई इस पर नकल का दावा नहीं कर सकता। दूसरे सीन नंबर नाइंटी फोर (94) तक कोई भी नही कह सकता कि आगे क्या होगा!

क्या आप भी दूसरों की तरह तेज रफ्तार फिल्मी पटकथा में विश्वास रखते हैं?

नहीं जैसी स्टोरी की मूवमेंट हो, उसकी डिमांड हो, मैं वैसा ही करना ज्यादा पसंद करूंगा। जबरदस्ती किसी चीज को ठूसंना, या दोहराना मैं हरगिज पसंद नहीं करता। कुछ लोग जबरदस्ती फिल्म में वाइलेंस (हिंसा) डालते हैं अब यह कोई जरूरी तो नहीं मैं मानता हूं जिंदगी का एक हिस्सा वाइलेंस भी है। लेकिन मैं यह

भी मानता हूं कि फिल्मों में भी उसे उतना ही होना चाहिए जितना कि जिंदगी में होता है या हो सकता है गैर जरूरी वाइलेंस डालकर बॉक्स ऑफिस का सपना देखना, यह शौक मुझे बिल्कुल नहीं है। वाइलेंस मेरी फिल्मों में भी है लेकिन वह आपको झूठा महससू नहीं होगा क्योंकि यह तो महाभारत के जमाने से आज तक चलता आ रहा है।

क्या आपको अपनी इस फिल्म की शूटिंग के लिए ‘मॉरिशस’ जाना जरूरी था?

नहीं दरअसल मुझे एक खूबसूरत आइलेंड (टापू) की तलाश थी क्योंकि वह कहानी में बहुत ही जरूरी चीज हैं। कहानी मैं मैंने इस आइलैण्ड का नाम ‘बुटालिया’ के लिए मैंने कई जगहें देखी लेकिन ‘मॉरिशस’ से बेहतर खूबसूरत जगह मुझे कहीं भी नहीं मिली। मैंने इसलिए इसे अपनी फिल्म में रख लिया। दूसरी वजह यह भी थी कि मैं दूसरे निर्माताओं की तरह खर्च बचाकर यह नहीं कर सकता था कि गोवा में शूटिंग करके उसे ‘बुटालिया’ कह दूं सीधी-सी बात है गोवा जिसने देखा है वह पर्दे पर भी उसे गोवा ही बतायेगा महसूस करेगा, ‘बुटालिया’ नहीं मैं दर्शकों को चीट नहीं करूंगा। मनोरंजन के लिए मुझे चाहे कितनी भी मेहनत क्यों न करनी पड़े। कहीं भी क्यों न जाना पड़े अब आप अंदाजा लगाइये कि मैंने ‘चांदी सोना’ के लिए बैरूत का सफर भी अपनी यूनिट के साथ किया, सिर्फ इसलिए कि संसार की सबसे खूबसूरत गुफाएं बैरूत में हैं। अगर आप यह गुफाएं देख लें तो जरूर महसूस करेंगे कि गुरूदत्त का सबसे अनमोल खजाना बैरूत की यह गुफाएं हैं जिन्हें आज तक फिल्माने की हिम्मत कोई भी हिंदुस्तानी निर्माता नहीं कर सका। मैं तो यह कहना चाहता हूं कि अगर आप फिल्म के लिए अपना देश छोड़ कर बाहर जाना चाहते हैं तो क्या ‘एफिल टावर’ शूट करने जाते हैं जिसे हर हिंदुस्तानी कैलेंडर और तस्वीरों में ही देख लेता है। लाखों रूपया खर्च करके अगर कोई खूबसूरत चीज आप विदेशों से शूट करके लाते हैं तो बात ठीक भी है, समझ में आती है, वरना यह किसी भी तरह एक नासमझी से कम नहीं है।

हाल ही में कुछ फिल्मी पत्रिकाओं में छपा था कि परवीन बॉबी संजय को जो सहायता पहले दे रही थी अब नही दे रही हैं। मैंने जब संजय से इसकी पुष्टि करनी चाही तो वह बोला।

यह सब दुश्मनों की उड़ाई हुई बातें हैं यार, परवीन मुझे आज भी पूरा कॉऑपरेट कर रही हैं। उसने मेरे फिल्म में काम भी बहुत अच्छा किया है। आई एम सेटिस्फाई विद हर वर्क। दरअसल परवीन जरा फ्री ख्यालों की लड़की हैं इसलिए कुछ लोग उसे गलत समझ जाते हैं। वह तो इतनी मंजी हुई आर्टिस्ट हैं कि एक ही बार में पिकअप कर लेती हैं। मैंने उसे दूसरे निर्माताओं की तरह सिर्फ शो केस का पीस नहीं बनाया बल्कि फिल्म का एक जरूरी हिस्सा समझ कर पूरी अहमियत दी है।

क्या आप बड़े स्टार्स को ही लेकर फिल्म बनाने में विश्वास रखते हैं?

पूछने पर संजय ने मुझे बताया बात बड़े या छोटे कलाकार की नहीं होती, बात सिर्फ यह होती है कि जो किरदार और उसके जज्बात, उसके एक्सप्रेशंस एक मंजा हुआ अनुभवी कलाकार निभा सकता है, नया नहीं कर सकता। अब मेरी ही फिल्म को लीजिए क्या इसमें प्राण, प्रेमनाथ या इफ्तिखार के बदले नये कलाकारों से काम लिया जा सकता है? सवाल रियलिटी (वास्तविकता) का है और वह सुलझे हुए कलाकार ही दे सकते हैं। मैंने तो एक कैरेक्टर के लिए स्पेशल एपीरियंस में राजकपूर को भी लिया है और उन्होंने जो काम किया है वह फिल्म के लिए एक और खूबसूरत हिस्सा बन गया है।

अभिनेता के रूप में संजय इस समय बाहर की चार फिल्मों में काम कर रहे हैं लेकिन लगता है उन्हें अपनी फिल्म में सबसे ज्यादा आकर्षण है इसीलिए वह एक्टर और डायरेक्टर होने के बावजूद इफ्तिखार से भी पूछ लेते हैं मेरे एक्सप्रेशंस तो ठीक थे न? उन्हें दूसरों की आलोचनाओं को स्वीकार कर लेने में शर्मिंदगी नहीं, खुशी का अहसास होता है। यहां तक कि मैंने देखा अंदर ड्राइंग रूम में बैठी मंजू के आवाज देने पर वह फील्ड से दौड़कर उसे भी ‘हल्लो डार्लिंग’ कहकर विश करता है।

ऐसे मेहनती आदमी की सफलता में किसे यकीन होगा? करीब सात साल पहले जब मैं गुनाहों के देवता के सेट पर संजय मिले थे, लोगों ने मुझे बताया था वह बड़ा घमंडी हैं, सीधे मुंह बात नहीं करते, सेट पर लेट आते हैं लेकिन आज संजय के सेट पर दूसरे लोग लेट आते हैं और वह हंसते-हंसते सबसे काम करवाते हैं। प्यार से यूनिट के हर कर्मचारी से मिलते हैं। लगता है सजंय के बारे में पहले सुनी वो बातें एकदम झूठ थी। दिखावा थी। क्योंकि जो आदमी दूसरों की इज्जत करना जानते हैं इस दुनिया में उसी के दुश्मन ज्यादा होते हैं।

लेकिन मैं कह सकता हूं कि संजय आज फिल्म संसार का वह व्यक्तित्व जो फिल्मों से जुड़ा रहने पर भी फिल्मी महसूस नहीं होता।


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Mayapuri

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