संजीव कुमार की कंजूसी

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मायापुरी अंक 3,1974

संजीव कुमार स्टंट फिल्मों के दायरे से निकल कर घुसपैठ करके सामाजिक फिल्मों में आ गये थे। ‘पति-पत्नी में वह नन्दा के साथ हीरो का रोल निभा रहे थे। एक दिन वह मैट्रो सिनेमा में कोई फिल्म देखने गये हुये थे। अपनी आदत (या कंजूसी) के अनुसार उन्होनें लोअर स्टाल का टिकिट खरीदा था। इत्तफाक से नन्दा भी उस दिन मैट्रो में फिल्म देखने आई थी. नन्दा बालकनी में बैठी हुई थी। संजीव ने उसे देखा तो दूर से सलाम झाड़ दिया।

अगले दिन जब नन्दा सैट पर पहुंची तो निर्माता से संजीव की शिकायत करते हुए उसे फिल्म से अलग करके कोई ढंग का हीरो लेने के लिए कहा। बोली ‘यह हीरो है या कोई फेरी वाला है। जरा हूलिया तो देखिये एक तो बेढंगे कपड़े पहनता है ऊपर से निचली क्लास में जाकर फिल्म देखता है इसके साथ काम करके तो मेरा भी ग्रेड गिर जाएगा

नंदा की शिकायत खत्म होने के थोड़ी देर बाद संजीव भी सैट पर पहुंच गये उसने उस वक्त भी वही कुर्ता और पाजमा पहन रखा था। हाथ में छत्री लटक रही थी। और घड़ी के बेल्ट के नीचे बस का टिकिट तह किया हुआ रखा। उसे इस हालत में देखकर सैटपर मौजूद लोगों ने जोरदार अट्टहास किया। एक ने संजीव से कहा तुम हीरो हो तो हीरो की तरह रहना भी सीखो। गाड़ी नही रख सकते तो कम से कम टैक्सी म में आया जाया करो. अगर यह ‘फेरी वाले’ (जुना पुराना जरी वाला) का लिबास ही पहनना है तो कालबा देवी में जाके कोई और धंधा करो फिल्म लाइन छोड़ दो।

संजीव कुमार को उस समय यह बातें बड़ी कड़वी लगी थीं क्योंकि उस समय वह इस स्थिति में नही थे लेकिन आज वह सब कुछ रखने के बाद भी वैसा ही है(कंजूस!) लेकिन उस समय उसे ‘फेरी’ लगा रहें होंगे और खुद नंदा जी क्या कर रही है यह जमाना जानता है। (कहने की शायद जरूरत नही है) सच है वक्त बड़ी जालिम चीज है।

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Mayapuri