“अच्छा निर्देशक किस्मत वाले को मिलता है” – संजीव कुमार

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sanjeevremember

 

मायापुरी अंक 17.1975

हाल ही में ‘आंधी’ के सैट पर मेरी संजीव कुमारजी से मुलाकात हुई। चूंकि संजीव कुमार एक ऐसा अभिनेता हैं जो ‘निशान’ जैसी स्टंट फिल्म से होते हुए‘कोशिश’ जैसी कलात्मक फिल्मों तक पहुंचे हैं।

“बिल्कुल, आखिर में फिल्म से पहले स्टेज पर में काम कर चुका हूं स्टेज का एक्टर फिल्म के एक्टर से ज्यादा मंजा हुआ होता है। यूं शुरू शुरू में मैंने ऐसी फिल्में भी ले ली थी जिनमें एक्टिंग का कोई स्कोप नही था।

ऐसी फिल्मों से आपका मतलब? मेरा मतलब है जैसै ‘रॉकी मेरा नाम’ अब ऐसी फिल्मों से कोई खास इमेज तो बनने से रही। क्या आप बता सकेंगे कि ‘नया दिन नयी रात’ जिसमें आपके अभिनय के नौ रुप थे, क्यों फ्लॉप हो गई? मैं नहीं कह सकता। लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि मैंने इस फिल्म में सबसे ज्यादा मेहनत की थी। इस फिल्म में काम करने का सबसे बड़ा कारण यह भी था कि शिवाजी गणेशन ने इसी फिल्म के तमिल संस्करण ‘नवरात्रि’ में नौ भूमिकाएं निभाई थी जिन्होनें मुझे एक चैलेंज दिया। यूं इस फिल्म के लिए पहले दिलीप कुमार से निर्माताओं की बात हुई थी लेकिन दिलीप ने मुझे सजेस्ट किया। यह मेरी बदकिस्मती ही कही जायेगी जो यह फिल्म चल नही पाई।

क्या आप एक बूढ़े की भूमिका अभिनीत करते समय इस बात की चिंता नही करते कि आपकी स्टारवेल्यू कही गिर न जाए?

नही, यह तो आर्टिस्ट के लिए गर्व की बात है। मुझे ही यह गर्व हासिल हुआ है कि मैं एक फिल्म (‘परिचय’) में जया भादुड़ी का पिता बना, दूसरी फिल्म कोशिश में उनका पति बना, और ‘शोले’ में जया के दादा की भूमिका में काम कर रहा हूं अगर कभी मौका मिला तो मैं जया के बेटे का रोल भी करूंगा।

लेकिन इसके लिए आपको कुछ पतला होना पड़ेगा? “वह भी हो जायेगा। यूं एक अच्छे एक्टर के लिए अच्छे निर्देशक का होना बेहद जरूरी है। और यह किस्मत की बात है। अच्छा निर्देशक किस्मत वाले एक्टर को ही मिलता है। मुझे कई अच्छे निर्देशक मिले हैं और मैं खुद को भाग्यशाली एक्टर मानता हूं ऐसा ही एक डायरेक्टर मुझे “लैला मजनू” में मिला था जिसने मुझे कमरे में कैद करके स्लिम होने पर मजबूर किया। क्योंकि मजनू एक दुबला पतला आदमी था। यह निर्देशक थे स्व. के. आसिफ़ जिन्होनें मुझे सच्चा मजनू बनाने के लिए तब तक कमरे में बन्द रखा जब तक कि मैं एकदम दुबला नही हो गया।

“लैला मजनू” (पुराना नाम ‘मोहब्बत और खुदा’) कब तक प्रदर्शित होगी?

बस जल्दी ही इस फिल्म की शूटिंग पूरी हो चुकी है। अब रिलीज की ही तैयारियां हैं। कुछ आप सी झगड़ों के कारण ही देर हो रही है। मैं चाहता हूं कि यह फिल्म जल्दी रिलीज हो। इस फिल्म से मुझे बड़ी उम्मीद है। इस फिल्म के हर फ्रेम में के. आसिफ़ हिन्दुस्तानी फिल्मों का सेंसिल बी. डीमले हैं। यह आसिफ़ का ही बूता था कि वह ‘लव एण्ड गॉड’ की यूनिट के साथ भारी क्रेन लेकर राजस्थान के रेतीले इलाके में पहुंच गए और एक एक शॉट के पीछे इतनी मेहनत की जितनी दूसरे निर्देशक पूरे सीन पर भी नही करते।

‘लव एण्ड गॉड’ के किसी सीन के बारे में बताएंगे? शोर फिल्म के एक दृश्य में बताना था कि कैसे मजनू और लैला अपनी-अपनी मशालें मुकदूस (पवित्र) कुंए में डालते हैं अगर यह मशालें अपनी अपनी लौं मिलाकर जले तो विश्वास किया जाता है कि दोनों प्रेमी एक हो जाएंगे। अगर मशालों की लौं नही मिलती तो प्रेमी भी नही मिल सकेंगे अब इस सीन के लिए आसिफ साहब ने रेगिस्तान में कुंआ बनवाया, कुंए के ऊपर क्रेन लगाई, क्रेन पर कैमरा रखकर कैमरामैन को बिठा दिया। इसके बाद कुंए में मजनू और लैला की मशालें फेंकी गई औरशॉट क्रेनसे लिया गया। वह शॉट जिसमें मशालों की लौं एक साथ मिल कर जलने लगती हैं।

“अच्छी भूमिकाओं” के लिए एक एक्टर को क्या करना चाहिए?

त्याग, मैं अच्छी भूमिका के लिए कुछ भी कर सकता हूं। अब आप शायद बिलीव (विश्वास नही करेंगे कि ‘खिलौना’ में बढ़िया भूमिका पाने के लिए मैंने प्रसाद जी की (एल.वी.प्रसाद) “जीने की राह” में गेस्ट आर्टिस्ट के तौर पर काम किया। ‘खिलौना’ में जो भूमिका मैंने की है यह वह भूमिका है जिसके लिए कई एक्टर पागल थे। आखिर में यह मेरे हिस्से में आई।

“क्या यह सही है कि एक ही फिल्म में दो टक्कर के अभिनेता हों तो फिल्म जानदार बन जाती है। साथ ही भूमिकाएं भी”

हां, दो मंजे हुए कलाकार सामने हों तो बड़ा मजा आता है। मैंने दिलीप कुमार, धर्मेन्द्र और जीतेन्द्र जैसे अभिनेताओं के साथ काम किया है और मुझे बड़ा मजा आया। लेकिन राजेश खन्ना के साथ मैं काम करते समय हमेशा एक तरह की बेकार की परेशानी में फंसा रहा। मुफ्त की टेंशन मुझे दुखाती रही। इसलिए मैं यह कहना चाहूंगा कि सामने भले ही मंजा हुआ अभिनेता हो लेकिन जरूरी यह भी है कि वह अच्छा आदमी भी हो।

और इस इंटरव्यू के बाद मैं कह सकता हूं कि संजीव कुमार वह आदमी हैं जिसे हम अच्छा एक्टर भी कह सकते हैं और अच्छा आदमी भी। दोनों बातें बहुत कम लोगों में होती हैं। लेंकिन संजीव में नही।

इसकी वजह यह भी हो सकती है कि संजीव ने एक्टर बनने से पहले एक अभाव भरी जिंदगी देखी है जहां एक छोटी‘खोली’ थी जिसमें रात दिन चूहे कबड्डी खेला करते थे। वहां से निकल कर संजीव कभी बस में, कभी लोकल में, और कभी पैदल स्टूडियों, और फिल्म निर्माताओँ के दफ्तरों तक पहुंचे थे। उनकी सच्ची लगन का परिणाम है जो आज संजीव इतने बड़ा स्टार हैे।


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Mayapuri

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