मूवी रिव्यू: भाई के लिये सब कुछ न्यौछावर कर देने वाली बहन का चित्रण है ‘सरबजीत’

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रेटिंग***

निर्देशक ओमंग कुमार की दूसरी बायोपिक फिल्म ‘सरबजीत’ सरबजीत से कहीं ज्यादा उसकी बहन दलबीर कौर की बायोपिक लगती है। लिहाजा अगर फिल्म का नाम सरबजीत की जगह दलबीर भी होता तो चल जाता। बावजूद इसके फिल्म अपने कथानक को लेकर पूरी तरह असरदार और प्रभावशाली है।

कहानी

पंजाब के एक गांव में सरबजीत अपनी पत्नि व दो बेटियों के साथ मस्त जीवन गुजार रहा है। उसकी बहन दलबीर कौर अपने भाई से बेइंतहा प्यार करती है इसीलिये वो उसके बीमार होने पर अपने पति द्वारा प्रतिवाद करने के बाद सदा के लिये अपना घर छोड़ मायके आ जाती है। एक दिन शराब के नशे में सरबजीत सीमा पार चला जाता है और वहां सुरक्षागार्ड उसे हिन्दुस्तानी जासूस बनाकर जेल में बंद कर देते हैं। इसके बाद शुरू होती है दलबीर द्वारा अपने भाई को पहले तलाश करने और फिर उसे पाकिस्तान जेल से छुड़ाने की कवायद लेकिन वो चाहकर भी उसे इंडिया जिंदा वापस नहीं ला पाती।

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निर्देशन

इसमें कोई दो राय नहीं कि ओमंग कुमार ‘मैरीकॉम’ के बाद ‘सरबजीत’ के रूप में एक और बेहतरीन फिल्म बनाने में कामयाब रहे हैं लेकिन इस बार उन्होंने सरबजीत के बदले उसकी बहन दलबीर को सामने रखा लिहाजा एक बार ऐसा लगने लगता है कि जैसे हम सरबजीत नहीं बल्कि दलबीर की बायोपिक देख रहे हों क्योंकि ओमंग दलबीर के मोह में इस कदर खो गये कि उन्होंने सरबजीत के अलावा उसकी पत्नि को तो हाशिये पर ला खड़ा किया। यहां तक सरबजीत के वकील के रोल में दर्शन कुमार भी एक हद तक नाटकीय लगते हैं। इसके अलावा सरबजीत को छुड़ाने वाली मुहीम के लिये धरना, सिफारिश, याचना तथा कैंडल लाइट के तहत भी कुछ सिनेमाई लिबर्टी लेते हुये कुछ सच्चे और कुछ बनावटी प्रसंग दिखाये गये हैं। सरबजीत के दौर का पंजाब भी कम ही दिखाई देता है। सबसे बड़ी बात कि फिल्म शुरू से अंत तक भारी उदासी का माहौल बनाये रखती है। कई जगह सरबजीत रूलाने में कामयाब रहे हैं। एक दृश्य जिसमें वे अपने वकील को कहते हैं कि यार कुछ देर तो मेरे पास बैठ जा क्योंकि मेरे पास कोई आंदा ई नई। इसी तरह दलबीर का पाकिस्तान में पाकिस्तानियों को ललकारना बहुत प्रभावशाली दृश्य बन पड़ा है। फिल्म शुरू से अंत तक इस कदर उदास है और गमगीन है कि एक पल भी राहत का नहीं मिल पाता। लिहाजा एक समय दर्शक थोड़ा कसमसाने लगता है।

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अभिनय

सरबजीत की भूमिका में जिस प्रकार रणदीप ने घुसकर काम किया है वो बेहद सराहनीय है। उसकी आशा, निराशा, मनोदशा और नाउम्मीदी दर्शक को दृवित कर देती है। यहां उनका साथ उनके लुक मेकअप ने भी क्या खूब दिया है। ऐश्वर्या की बात की जाये तो मेरे ख्याल से दलबीर उनके करियर की सर्वश्रेष्ठ भूमिका रही। इतनी कठिन भूमिका को उन्होंने बहुत बड़े चातुर्य से निभाया है। अपने भाई का खोना फिर उसे पाकिस्तान की जेल से वापिस लाने की उनकी ललक देखते बनती है। ऐश्वर्या की भूमिका और भी प्रभावशाली हो सकती थी अगर वे इतनी खूबसूरत न होती तो। सरबजीत की पत्नी की भूमिका में रिचा चड्ढ़ा ने एक बार फिर बेहतरीन अभिनेत्री होने का सुबूत दिया है। बेशक उन्हें ज्यादातर पाश्र्व में ही रखा गया है लेकिन जब भी उन्हें मौका मिला उन्होंने बिना बोले अपनी आंखों और भावों से अभिनय कर दिखाया। एक दो दृश्य में तो वे ऐश्वर्या पर भी हावी होती दिखाई दीं। पाकिस्तान में सरबजीत के पाकिस्तानी वकील की भूमिका में दर्शन कुमार ने अभिनय अच्छा किया लेकिन पता नहीं क्यों उनके नाटकीय लगने का एहसास भी होता रहा।

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संगीत

जीत मलिक और अमाल मलिक का संगीत कहानी को एक हद तक ताकतवर बनाता है। शुरूआत में दर्शाये गये गीत कहानी की गति में रूकावट नहीं बनते और न ही कहानी को बोझिल होने देते। बैकग्राउंड गीत भी प्रभावशाली रहे।

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क्यों देखें

एक निर्दोष आदमी सरबजीत (रणदीप हुड्डा) को दी गई यातना तथा अपने भाई के लिये सब कुछ न्यौछावर कर देने वाली ममतामयी बहन के रूप में ऐश्वर्या के अभिनय वाली इस फिल्म को मिस न करें।


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Mayapuri

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