सह्रदय सहगल – ठण्ड का ठोस अनुभव

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051-25 sahgal

 

मायापुरी अंक 51,1975

सहगल शराब के ही मारे थे। सारा दिन वे नशे में डूबे रहते। इस दाग़ को छोड़ दिया जाये तो उनके जीवन की चादर निखरी-निखरी व उजली-उजली-उजली थी। उन्होंने खूब पैसा कमाया और उसी प्रकार खर्च भी किया। इतनी ख्याति मिली लेकिन इंसानियत, जरूरतमंदों की सहायता, अन्य कलाकारों का आदर आदि गुण उन्होंने ख्याति के नशे में कभी नहीं छोड़े। मोह की फिल्मी नगरी में उनका कदम कभी गलत राह पर नहीं उठा।

गरीबों के लिए उनके मन में अत्यंत प्रेम था। स्टूडियो में वे सदा मज़दूरो के बीच अपना समय काटते। उनके सुख-सुख में सहभागी बनते। उनकी हर संभव सहायता करते। जरूरतमंद को नौकरी दिला देते। इसलिए स्टूडियो के गरीब कर्मचारियों के तो वे परमात्मा थे।

मुंबई का एक किस्सा संस्मरण है। एक बार वे रात को बड़ी देर से अपनी मनपसंद ब्यूक कार में घर लौट रहे थे। ठण्ड जैसे हर किसी का पता पूछती घूम रही थी। दादर में सर्कल के पास कार पहुंचते ही एक भिखारी ने बड़ी आशा से उनके आगे हाथ फैलाया। सहगल साहब ने उसे सिर से पैर तक निहारा। बदन पर सिर्फ एक फटी-सी हाफ पेंट और बनियान।

क्यों भाई, तुम्हें ठण्ड नहीं लगती?

लगती तो जरूर है साहब। लेकिन हम गरीबों का क्या? चाहे ठण्ड हो या ओले पड़े। बस यही कपड़े है मेरे पास जो मैं पहने हूं। अत्यंत दयनीय स्वर में वह भिखारी बोला।

सहगल के मन में जाने क्या विचार उठे? वे कार से नीचे उतरे। अपने दूसरे कपड़े लाने के लिए ड्राइवर की कार लेकर तुरंत भेजा और खुद वही फुटपाथ पर खड़े होकर बदन से सारे कीमती ऊनी कपड़े उतार कर उस भिखारी को पहना दिये और अण्डवियर और बनियान पहले फुटपाथ पर बैठ गए। और लगे महसूस करने कि उतने कम कपड़ो में कितनी ठण्ड लगती है!


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Mayapuri

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