कला और व्यवसाय के बीच फंसी शबाना आजमी

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khandar1

 

मायापुरी अंक 12.1974

शबाना आज़मी जब पूना इन्स्टीट्यूट से बम्बई आई थी तो उनके पास एक अदद डिप्लोमा, एक गोल्ड मैडल और इसके अतिरिक्त तीन फिल्मों के कान्ट्रैक्ट भी थे। लेकिन मुसीबत यह थी कि तीनों ही कलात्मक फिल्में थी। व्यवसाय से जिनका दूर का भी सम्बन्ध नही था। इसीलिए शबाना लोक प्रिय नही हुई। क्योंकि न तो वह बड़े-बड़े बैनर वाली फिल्में थी न ही बड़ा सैट अप था।

“अंकुर” के बाद जब शबाना ने ख्वाजा अहमद अव्वास की फिल्म “फासला” साइन की तो लोगों ने समझा कि यह तो एकदम पागल लड़की है। और फिर “परिणाम” से यह एकदम सिद्ध हो गया कि शबाना केवल आर्ट फिल्मों को लेकर रह जायेगी। और तो और बहुत से निर्माता-निर्देशक भी यही समझने लगे थे। लेकिन “इश्क इश्क इश्क” के बाद उनके यह भ्रम एक दम टूट गये।

“इश्क इश्क इश्क” में काम करने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। शबाना ने हंसते हुए कहा, “एक दिन नीलम मेहरा मेरे पास आई और बोली, “अरी शब्बो तुझे कुछ दी-दुनियां की खबर भी रहती है। मैंने पूछा, “क्या हुआ? अरी हुआ क्या, देव साहब को ‘इश्क इश्क इश्क’ के लिए एक लड़की की जरूरत है। मैं तो कहती हूं वह भूमिका तू स्वीकार कर ले बड़ा बैनर है और बड़े-बड़े स्टार्स के साथ काम करने का मौका मिल रहा है। एक ही फिल्म से लोकप्रियता की चरम सीमा पर पहुंच जायेगी।

मैं कुछ नही बोली। लेकिन इसी विचार के अंतर्गत मैं अगले दिन नीलम मेहरा के साथ देव साहब से मिली। देव साहब ने कहा कि इस भूमिका की लिस्ट में उन्होनें मेरा नाम सर्वोच्च लिख रखा था। लेकिन अनेक निर्माताओं ने उन्हें मेरे पास आने से रोक दिया था। उनका कहना था कि शबाना केवल आर्ट फिल्मों की अभिनेत्री है। कमर्शियल फिल्म वह स्वीकार नही करेगी। यह तो अच्छा हुआ मैं उनके पास पहुंच गई वरना वह तो भूमिका लेकर मेरे पास कभी नही आते।

“यानि के आप आर्ट फिल्मों से उकता-सी गई है”

‘नही, ऐसी कोई बात नही है। मुझे गम्भीर रोल पसन्द है। लेकिन हमेशा गम्भीरत का लिबास ओढ़े कोई कब तक जी सकता है। जीने के लिए परिवर्तन आवश्यक है और उस परिवर्तन के अंतर्गत समानान्तर फिल्मों के साथ-साथ हल्की-फुल्की व्यावसायिक फिल्मों में भूमिका अभिनीत करना कोई हर्ज की बात नही है। अभी पिछले दिनों एक निर्माता मेरे पास एक प्रस्ताव लेकर आये। बोले, “शबाना जी, मैं आपके लिए एक ‘आफ बीट’ भूमिका लाया हूं एक ही फिल्म से आप आसमान के सितारों को छूने लगेंगी। मैंने स्क्रिप्ट पढ़ी और बोली, “या तो फिल्म में से यह दृश्य निकाल दीजिये। या किसी और अभिनेत्री को ले लीजिये।

“वह निर्माता कुछ चिपकू किस्म के थे। कहने लगे, “लेकिन आजकल तो बड़ी-बड़ी अभिनेत्री लेखकों की खुशामद करके अपनी फिल्मों में ऐसे दृश्य रखवाती है और आप इन दृश्यों को निकालने की बात कह रही है। मैं बोली, “मैं बड़ी ऐक्ट्रैस कहां हूं। आप मुझे छोटा ही रहने दीजिये। और वह निर्माता अपना-सा मुंह ले कर चले गये।

“इसका मतलब यह हुआ कि आप आर्ट फिल्मों को कमर्शियल फिल्मों से अधिक महत्व देती हैं ?

“जहां तक आर्ट फिल्मों का सम्बन्ध है वह मुझे पसन्द हैं। लेकिन लोकप्रियता प्राप्त करने के लिए व्यवसायिक फिल्मों में काम करना आवश्यक है, क्योंकि व्यवसायिक फिल्में कलाकार को पब्लिसिटी देती है इस बात का अनुभव मुझे फिल्म ‘अंकुर’ की शूटिंग के दौरान हुआ। एक दिन कॉलेज के लड़के लड़कियों ने मुझे घेर लिया और पूछने लगे कि फिल्म की हीरोइन कहां है ? क्या वह अब तक नही आई ? अब मैं उन्हें क्या जवाब देती। सोचने लगी कि अगर मैं व्यवसायिक फिल्मों की अभिनेत्री होती तो उन्हें यह सवाल पूछने की जरूरत ही महसूस नही होती।

“शबाना जी ग्लेमर की एक दुनिया में किसी को भी कलाकार बनने के लिए वर्षों ऐड़िया रगड़नी पड़ती हैं। लेकिन शुक्र है अपने पिता की मदद से आपको इस प्रकार की कोई परेशानी नही उठानी पड़ी ?

आप मदद की बात करते है। पिता जी की वजह से तो मुझे परेशानी उठानी पड़ी है। जहां निर्माता नये-नये कलाकारों को इन्टरव्यू के लिए बुलाते है वहां मुझे आज तक किसी ने नही बुलाया। वह सोचते थे कि कैफी की बेटी है। अगर पसन्द नही आई तो मना कैसे करेंगे। इसीलिए वह मुझे बुलाते नही थे।

“मैंने सुना है बेंजामिन को आपने स्वयं पसंद किया था। फिर सगाई भी तोड़ डाली। क्या कोई अनबन हो गई थी ?

“यह ठीक है कि बैंजामिन को मैंने स्वंय ही पूना इन्स्टीट्यूट में साथ रहते पसन्द किया था। वह आज भी मेरा दोस्त हैं। मैं इस वक्त अपना पूरा ध्यान फिल्म अभिनय की ओर केन्द्रित करना चाहती हूं। इसी कारण मैंने बैंजामिन से सगाई तोड़ दी। यदि मैं इस वक्त अभिनय छोड़कर विवाह कर लेती तो फिर यह करियर भी छोड़ देना पड़ता जिसे मैं अपने जीवन से भी अधिक महत्वपूर्ण मानती हूं। मैं विवाह करके उसका भविष्य नही बिगड़ना चाहती। इसी वजह से हम दोनों ने अपने-अपने हित के लिए एक दूसरे से मुक्त होने का फैसला किया।

बहरहाल यह मानना पड़ेगा कि कला फिल्मों की अभिनेत्री होने के बावजूद शबाना ने जो लोकप्रियता प्राप्त की है वह व्यवसायिक चित्रों में काम करने वाली अभिनेत्रियां भी नही कर पाती। यदि शबाना ने दो एक उच्चकोटि के व्यवसायिक चित्रों मैं काम कर लिया तो उसे स्टार बनते देर नही लगेगी।


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Mayapuri

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