शादी के बाद, मेरे अनुभव अपने है! – सिम्मी

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सिम्मी

-अरूण कुमार शास्त्री

यह लेख दिनांक 8-8-1976 मायापुरी के पुराने अंक 99 से लिया गया है!

“उनकी नयी रामायण में रावण हीरो था, और सीता उनसे प्यार करती थी, सीता जान-बूझ कर राम को सोने के हिरण के शिकार में भेजती हैं, और जब लक्ष्मण पास होते हैं वह उसे भी बाधा समझती और लक्ष्मण के चले जाने पर सीता रावण से कहती हैं, दोनों चले गए हैं और अब हम भी चलें… ठीक इसी तरह रावण के मरने के बाद सीता जब अयोध्या लौटती हैं, तो वे रावण के गम में घुलती बताई जाती है. उसी तरह राम का चरित्र बहुत छोटा और महत्वहीन तो था ही, साथ हीं जिस सीता को सारा हिंदुस्तान देवी मानता है उसे रावण की प्रेमिका के रूप प्रस्तुत करना मुझे बिल्कुल नहीं जंचा और मैंने अपने वकील की मदद से कानूनी तौर उस फिल्म से संबंध तोड़ लिया.

सिम्मी

“मैं फिल्‍म के निर्देशक से पूछती भी हूं-सीता को इस रूप में पेश करने की क्या तुक है?”

निर्देशक का जबाब था-हम फिल्म पश्चिमी देशों के लिए बना रहे हैं और लंका में तो रावण की ही पूजा होती है, इस लिए हमारे नायक भी रावण हैं, “उनकी कोई भी बात मेरे गले नहीं उतर रही थी और यह एक तरह से हिंदुस्तानी संस्कृति को बदनाम करने की साजिश भी थी” अगर मैंने ऐसी सीता को पर्दे पर साकार कर दिया होता तो हिंदुस्तान में अपने मुंह दिखाने के काबिल भी न रहती और मेरा सड़कों पर निकलना भी मुश्किल हो जाता. और ‘सीता देवी’ की भूमिका को अस्वीकार करने की पूरो कहानी यही है. जल्दी ही एक प्रेस-कांफेंस बुलाकर मैं इसी बात का स्पष्टी करण करने जा रही हूं”-सिम्मी ने श्रीलंका के व्यापारी अंजता बिजेसेना को फिल्म ‘सीता देवी’ की भूमिका को ठुकरा देने की पूरी कहानी यह थी, जिसकी नायिका के रूप में उन दिनों सारी दुनिया के अखबारों में सिम्मी को चर्चा बड़ी सरगर्मी के साथ हुई थी-हो रही थी!

पिछले एक पखवारे से अधिक हो गये थे और सिम्मी से इंटरव्यू के लिए सही वक्‍त और सहो दिन तय नहीं हो पा रहे थे, आखिर 29 जून को 9.50 की शाम को फोन पर हमें यह सूचना दी गई कि कल यानी अगले दिन 30 जून को 4.30 बजे से 5.30 बजे तक का समय मेरे लिए तय किया गया है, और फिर 30 जून को दोपहर के बाद झटके की बरसात आने और चले जाने के बाद हवा में उमस भरी थी. बाबुल नाथ की हेंगिग गार्डन की हरियाली झाड़ियों से गुजरते हुए मलाबार हिल के पाव-लोवा की तरफ आगे बढ़ रहा था, जिसके छठे फ्लोर में सत्यजित रे कृत ‘अरण्ये दिने रात्री’ और ‘सिद्धार्थ’ जैसी बहुचर्चित और अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त फिल्म की अभिनेत्री सिम्मी रहती हैं

सिम्मी

‘अरण्ये दिने रात्री’ में सिम्मी एक आदिवासी औरत की भूमिका निभाती है-काली- कलूटी आदिवासी औरत जो ऊपर से नीचे तक कच्ची शराब के नशे में घुत्त होती है, और जंगलों में घूमने आये नवयुवकों से झूमते हुए शराब मांगती है-अद्धा दे न बाबू ! अद्धा दे न बाबू!!! ये युवक भी शराब में डूबे हुए हैं और इनकी नजरें सिम्मी के क्षत-विक्षत यौवन पर टिक जाती हैं, इस दृष्य में सिम्मी के अभिनय का जवाब इस हद तक वास्तविक बन जाता है जिसकी कोई व्याख्या नहीं हो सकती. “इसी क्रम में सिद्धार्थ का वह दृष्य भी याद आता है जब सिम्मी “सिद्धार्थ” से पूछती हैं-तुमने कभी किसी औरत का चुंबन किया है? और फिर अगले ही दृष्यों में सिद्धार्थ को एक औरत की पूरी हकीकत बताती हैं. औरत के सम्पूर्ण समंर्पण की वास्तविकता को सिम्मी ने जिस अंदाज में बिना किसी संवाद के सिर्फ उत्तेजक मुद्राओं के द्वारा जो व्यक्त किया है, उसे भी शायद ही कभी भुलाया जा सकता है.

सिम्मी

और सिम्मी से मिलने से पहले उनकी फिल्‍मों के कई चरित्र जिन्हें उन्होंने पूरी अर्थंवक्ता दी थी, मेरे जेह़न में ऊपर आसमान में काले-काले बादलों की तरह उमड़-घुमड़ रहे थे, यानी आप समझ सकते हैं, कि मैं भी सिम्मी से मिलने को बेहद उत्सुक था, और बेचैन भी, सीढ़ियों के ऊपर मलाबार को सड़क पर आ चुका था और हवा के बेहद नर्म झोंकों ने भीतर से सराबोर कर दिया… सिम्मी की कई तस्वीरें मन को कौध्ंा गयी और अब मैं मुकाम तक आ गया. एक बेहद करीने से सजी ड्राइंग रुम. कायदे से मैं पांच मिनट लेट था. 4ः35 हुए थे और तीन-चार मिनट तक कमरे के सन्‍नाटे में सांस लेता रहा. मेरे सामने सिम्मी की एक बड़ी-सी तस्वीर थी, जिसमें हवा उनकी जुल्फों से बेतरतीब ढंग से खेल रही थी. सिम्मी की आंखें दूर कहीं आकाश में खोयी हुई थी, सिम्मी कमरे में नहीं थीं लेकिन उनकी मौजूदगी का एहसास बना था.

मैं सामने दरवाजे की तरफ आंखें लगाये था, इस तरफ से ही आयेंगी शायद ! लेकिन किसी योग-माया की तरह पीछे से प्रकट हुई. थोड़ो देर के लिए मुझे ऐसा लगा जैसे इलेक्ट्रीक शॉट झटका महसूस किया जाता है, एक छरहरी गोरी और लंबी कद की औरत जिसके गाल सुर्ख थे और ओठों पर लगी लिपिस्टिक इस हृद तक रक्तिम थी, जैसे लाल गुलाब को दो पत्तियां! खुले गले की मैक्‍सी में सिम्मी के खुले कंधे किसी को भी बेचैन और बेकाबू करने के लिए इतना सामान बहुत ज्यादा था वैसे सही तौर पर किसी को परेशान करने के लिए सिम्मी की एक हल्की मुस्कराहट ही काफी है! फिल्मों में भी सिम्मी अपने शरीर की मर्यादाओं की सीमा तोड़ती हैं, तो इसी लिए कि उन्हें नारी-सौंदर्य के अस्तित्व का संपूर्ण ज्ञान है. इस संदर्भ में चर्चा छेड़ने पर सिम्मी कहती हैं-“जिस्म दिखाने के मामले में कभी वल्गर नहीं हुई और किसी भी फिल्‍म में चरित्र कों अगर वास्तविक बनाने के लिए कुछ किया भी हो तो वह अनिवार्य था.”

सिम्मी

यह तो एक पहलू है जहां सिम्मी के लिए शरीर कोई सीमा नहीं, जहां वह दूसरी अभिनेत्रियों की तरह रूढ़िवादी धारणाओं के कीचड़ में फंसी नहीं हैं. दूसरी तरफ सिम्मी अपनी ज्यादातर फिल्मों में भारतीय स्त्री की तरह साड़ी पहने ही दिखाई पड़ी हैं जब कि अपने निजी जीवन में वह पाश््चात्य रंगों में रंगी थीं और विचारों में घोर आधुनिक थीं-“हां इसका कारण यह है कि जिन दिनों मैं फिल्मों में आई उन दिनों जीनत अमान और प्रवीण बॉबी जैसी लड़कियों का कोई पता नहीं था. फिल्मों का माहौल उन दिनों आज की तरह भी नहीं था और मुझे अपने आपको एडजस्ट करने के लिए यह रुख अपनाना पड़ा, इस तरह मेरी इमेज एक हिंदुस्तानी औरत के रूप में ही ज्यादा विकसित हुई. अब तो ठीक उल्टा है और पाश्चात्य शैली अपनाकर जीना ही फिल्मों में आम हो गया है !

शादी के बाद मेरे अनुभव अपने ही हैं और मैं यह भी नहीं कहना चाहती कि शादी कर लेना करियर से हार मान लेने जैसा है. लेकिन मेरे साथ एक दुर्घटना यह हुई कि फिल्म-निमाताओं ने शादी के बाद मेरे बारे में सोचना बंद कर दिया, जब ‘हाथ की सफाई’ प्रदर्शित होकर हिट हुई तो मेरे पास ढेर सारे ऑफर आए थे और फिर शादी के बाद पता नहीं लोगों को क्‍या हुआ कि उन्होंने आना ही बंद कर दिया. सच बात तो यह है कि शादी करने से किसी की प्रतिभा कुंद नहीं हो जाती और उसके भीतर सारे गुण ज्यों के त्यों कायम ही रहते है!

सिम्मी

फिल्म-लाइन में बातें कुछ इतनी विचित्र हैं, जिसकी कल्पना बेहद सहज है. जैसे अगर कोई हीरोइन किसी फिल्म में काम करती है, तो उसके लिए यह जरूरी है कि वह फिल्‍म में हीरो से अपने ताल्लुक बढ़ायें खबरों में जिंदा रहने के लिए वह कुछ ऐसी हरकतें जरूर करें, जिससे अखबार वाले उसका इस्तेमाल मसाले की तरह करें. मसलन वह कभी इसको छोड़ दे और उसको पकड़ लें या ऐसी-वैसी कोई न कोई बात जरूर करती रहे, जिससे उसको उपस्थिति का ’ नकारा नहीं जा सके, भले ही अभिनय के मामले में वह इल्ले-इल्ले क्यों न हो !

सिम्मी कहती हैं-“मुझे यह पसंद नहीं. मेरे लिए फिल्‍म एक पेशे की तरह है. सेट पर जाकर पूरी निष्ठा से काम करना और निर्माता को अपने व्यवहार से खुश रखना ज्यादा बेहतर लगता है मुझे वनिस्पत इसमें कि शूटिंग के बाद भी बेमतलब किसी के साथ वक्त खराब किया जाये.”

इसके साथ ही सिम्मी के लिए हर ऐसी-वैसी फिल्में स्वीकार कर लेना अच्छा नहीं लगता और फिल्मों में अनुबंध स्वीकार करने के पहले उन की शर्त होती है, “मेरी शर्त यह होती है कि एक तो निर्देशक समझदार हो और दूसरी बात है कि जिस चरित्र की भूमिका मैं निभा रही होती हूं वह वजनदार भी हो. इन दोनों के बिना किसी फिल्‍म में काम करना मुझे जंचता नहीं. शायद इसीलिए मैं एफ सी. मेहरा, एस. डी. नारंग और कई अन्य फिल्म निर्माताओं की फिल्मों में अभिनय करने के प्रस्ताव पर सहमत नहीं हो पायी.”

आखिर में मैंने सिम्मी-से उनकी महत्वाकांक्षा के बारे में सवाल किया तो वह कहती हैं, “मैं एक बहुत अच्छी अभिनेत्री और बहुत अच्छी भूमिकाओं से जीने वाली कलाकार के रूप में अपनी स्वीकृति चाहती हूं. लेकिन यह तो सिम्मी को प्राप्त है ही सिम्मी कहती हैं, “इससे क्या? अभी मुझे भीतर से संतुष्टी नहीं मिली है तथा और अच्छी भूमिकाओं की तलाश अभी भी बेसबी से है.”

सामने घड़ी में कब पांच बज कर तीस मिनट हो गए पता नहीं चला जबकि हमारी बातों ने हम दोनों को काफी तसल्ली दी थी. सिम्मी की शालीनता और अथंपूर्ण बातों के साथ उनके स्निग्ध-सौंदयं के सामीप्य पाने का समय गुजर चुका है यह जानकर मैं उदास मन स्थिति लिये वापस तो लौट रहा था लेकिन सिम्मी की बातें अभी भी कानों में गूंज रही हैं!


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Mayapuri

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