INTERVIEW!! “आज भी शारीरिक तौर पर मैं एक यंग “ब्वॉय” ही लगता हूँ – शाहरुख खान

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लिपिका  वर्मा

शाहरुख खान को फिल्मी दुनिया में प्रवेश कर काफी समय हो गया किन्तु आज भी वह एक, “ब्वॉय” की तरह ही  लगते हैं। इसीलिए एक यंग “फैन” बनने का खुद ही फैसला किया उन्होंने।

सुनिए किंग खान की जुबानी – यंग फैन बनने के बारे में – जब निर्देशक मनीष शर्मा यह स्क्रिप्ट मेरे पास लेकर आये तो मुझे यही ठीक लगा कि यंग फैन का किरदार भी निभाऊँ क्यूंकि आज भी शारीरिक तौर पर मैं एक, यंग “ब्वॉय” ही लगता हूँ!! (हंस कर बोले) किंग खान

पेश है लिपिका वर्मा के साथ एक अनूठी भेंटवार्ता –

फैन की परिभाषा क्या है आप के मुताबिक ?

“फैन” का मतलब – योकिक… हठधार्मिक जैसे शब्दों से जोड़ा जा सकता है। यही फिल्म, “फैन” में भी दिखाया गया है। क्योंकि कोई भी ‘फैन’ दरअसल में पागलपन की हद को पार ही कर जाता है। वो अपने पसंदीदा हीरो के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार होता है। दरअसल में जो भी आप से दूर से प्यार जतलाते हैं वह सही मायने में बिना किसी शर्त के प्यार होता है। किन्तु जो आपके आसपास – जैसे आपकी पत्नी वह फिर आपसे यह उम्मीद करेगी कि आप उसे हर दोपहर को फोन करके यह पूछे कि आपने खाना खा लिया है न। आपके नियर और डियर बन्दों के साथ आपका समीकरण अलग हो जाता है। वह शर्तों पर प्यार होने लगता है। फैन आपकी अच्छाई या  बुराई दोनों ही स्थिति में आप से बहुत प्यार करता है। अंग्रेज़ी में उसे अनकंडीशनल लव कहते हैं और अपनों के प्यार को कंडीशनल लव कह सकते हैं।

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फिल्म, “फैन” में क्या है – कुछ बताएं ?

फिल्म “फैन” की कहानी कुछ ऐसी ही है जिस में डबल रोल की आवश्यकता थी और यह मुझे जरुरी लगा कि मैं ही वह दोनों किरदार निभाऊं क्योंकि ऐसा करना बतौर अभिनेता मुझे चैलेंजिंग लगा। दरअसल में जिसका बॉडी ऑफ़ वर्क फिल्मी दुनिया में लगभग 15/20 वर्ष का हो वही हीरो बन सकता है – जैसे अमिताभ बच्चन, सलमान खान, आमिर खान और अक्षय कुमार है और मेरा भी अच्छा खासा बॉडी ऑफ़ वर्क है। तो हमें एक हीरो को इश्टेब्लिश करने की जरूरत नहीं थी। यदि दोनों किरदारों को एक ही हीरो निभाये तो ही कहानी का मजा है। यदि मैं दोनों किरदार नहीं निभाता तो शायद में यह फिल्म नहीं कर पाता।

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आपके हिसाब से यंग किरदार निभाना या फिर उम्रदरज का किरदार निभाना आसान या मुश्किल क्या है ?

मुझे यह पूरी तरह से ज्ञात है कि मेरी शारीरिक बनावट, आदतें, ऊंचाई एक यंग ब्वॉय की तरह ही हैं। मेरे मनररिसमस किसी, “अल्फा मेल” की तरह नहीं है और जो कुछ मैं करता हूँ यंग लोग भी वैसा करते हैं। मुझे आज भी याद है, फिल्म “वीरजारा” में रानी मुख़र्जी को, “बेटी” बोलने में मुझे बहुत दिक्कत का सामना करना पड़ा था। यशजी को बहुत गुस्सा भी आ गया था क्योंकि इस सीन को पूर्ण करने हेतु हमने करीब दस दिन लगा दिए थे। अपने से किरदार करने में अच्छी खासी परेशानी होती है मुझे। रानी को अपनी बेटी समझ पाने में मैं असमर्थ हो रहा था मेंटली।

फिल्म, “फैन” आपकी दूसरी फिल्मों से कम प्रोमोट की जा रही है – क्यों ?

वह इसलिए क्यूंकि फिल्म “फैन” में प्रमोशन हेतु कुछ ज्यादा नहीं है। अक्सर फिल्मों में – पोस्टर, टीज़र,  थिएट्रिकल ट्रेलर वग़ैरा होता है और हमारी फिल्म में केवल एक प्रमोशनल सांग, “जबरा” है जिसे हमने बहुभाषी बनाया है। इससे यह इम्प्रेशन पड़ता है कि यह फिल्म मेरी बायोपिक हो सकती है। इस फिल्म में निगेटिव एलिमेंट भी देखने को मिलेगा। यदि कुछ और प्रोमोशनल वीडियोज बनते तो वो उसी चीज़ पर केंद्रित रहते, दरअसल में हमने जितना भी ‘फैन’ फिल्म के लिए प्रोमोशन किया है वह ज्यादा ही है।

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आपके हिसाब से एक, “फैन” को कौन सी लाइन पार नहीं करनी चाहिए ?

किसी भी फैन को अपने हीरो की रील चरित्र से प्रेरित नहीं होना चाहिए – मैंने फिल्म, “डर” में अपनी छाती पर खून से किरण नाम गूंद दिया था तो एक फैन ने वैसा ही किया। मेरे हिसाब से किसी को भी अपने आप को तकलीफ नहीं देनी चाहिए क्यूंकि जो कुछ भी हम करते है वह रियल नहीं होता है वह केवल रील के लिए होता है। मुझे बहुत दुःख होता है जब मेरे फैन कुछ उल्टा सीधा रील पर देख उसे निजी ज़िन्दगी में करते हैं और अपने आप का नुकसान करते हैं। बस यही कहना है भगवान के लिए अपने आप को हानि न पहुंचाएं।”

 


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